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    17 अगस्त को निकलेगी बाला लखेंद्र की बरात, CM सम्राट ने कहा- शामिल होने के आप आएं भागलपुर, बाएं हाथ से दें अर्घ्य

    Updated: Sat, 11 Jul 2026 09:15 AM (IST)

    बिहार सरकार ने भागलपुर की ऐतिहासिक बिहुला-विषहरी पूजा को राजकीय सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल कर लिया है। अब हर साल 17 अगस्त के आसपास भव्य 'बिहुला महोत ...और पढ़ें

    भागलपुर की प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी पूजा को मिला राजकीय दर्जा, अगस्त में मनेगा पहला बिहुला महोत्सव

    भागलपुर की प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी पूजा को मिला राजकीय दर्जा, अगस्त में मनेगा पहला बिहुला महोत्सव

    HighLights

    1. बिहुला-विषहरी पूजा को बिहार सरकार ने राजकीय महोत्सव घोषित किया।

    2. हर साल 17 अगस्त के आसपास भव्य 'बिहुला महोत्सव' आयोजित होगा।

    3. अंग क्षेत्र की लोक विरासत और पर्यटन को मिलेगी नई पहचान।

    जागरण संवाददाता, भागलपुर। अंग महाजनपद की ऐतिहासिक लोक परंपरा, संस्कृति और आस्था के प्रतीक 'बिहुला-विषहरी पूजा'। बिहार सरकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अंग महाजनपद की लोक आस्था के सबसे बड़े पर्व को लेकर ऐतिहासिक फैसला लिया है।

    राज्य सरकार ने भागलपुर की सदियों पुरानी और विश्व प्रसिद्ध 'बिहुला-विषहरी पूजा' को आधिकारिक रूप से 'राजकीय दर्जा' प्रदान करते हुए अपने सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल कर लिया है। इस बड़े फैसले के तहत अब हर वर्ष अगस्त महीने में विषहरी पूजा के पावन अवसर पर, 17 अगस्त के आसपास जिला प्रशासन की देखरेख में भव्य 'बिहुला महोत्सव' का आयोजन किया जाएगा।

    कला संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने दी जानकारी

    भागलपुर के जिला कला संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा भेजे गए विशेष प्रस्ताव को विभाग ने सहर्ष स्वीकृति देते हुए कैलेंडर में जगह दी है। इस कदम से अंग क्षेत्र की समृद्ध लोक विरासत, मंजूषा कला और सती बिहुला की गाथा को राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर एक नई और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना तय है। इस राजकीय महोत्सव में मां मनसा देवी से जुड़ी परंपराएं, बारी-कलश की संस्कृति, प्राचीन लोक अनुष्ठान और विषहरी गीतों की परंपरा को जीवित रखने वाले लोक कलाकारों को बड़ा मंच मिलेगा।

    भागलपुर के 182 स्थानों पर स्थापित होती हैं मां विषहरी की प्रतिमाएं

    भागलपुर और आसपास के सीमावर्ती जिलों में बिहुला-विषहरी पूजा को लोक आस्था का सबसे बड़ा और सबसे पवित्र वार्षिक त्योहार माना जाता है। इस वर्ष पूरे जिले में कुल 182 चिन्हित स्थानों पर मां विषहरी की भव्य पूजा आयोजित होगी, जिनमें से अकेले शहरी क्षेत्र के 96 स्थानों पर भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। महोत्सव और पूजा को लेकर सबसे व्यापक और ऐतिहासिक भीड़ चंपानगर स्थित पौराणिक मनसा देवी मंदिर में उमड़ती है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु मन्नत मांगने पहुंचते हैं।

    16 जुलाई की रात से शुरू होगी बाड़ी कलश पूजा की रस्म

    केंद्रीय विषहरी पूजा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार ने वर्ष 2026 की पूजा का पूरा आधिकारिक शेड्यूल (समय सारणी) जारी करते हुए तारीखों का ऐलान कर दिया है। उन्होंने बताया कि मां विषहरी की मुख्य बाड़ी पूजा की शुरुआत 16 जुलाई 2026 की देर रात्रि से बेहद कड़े और पवित्र अनुष्ठानों के साथ शुरू हो जाएगी। इसके बाद पूरे एक महीने तक सभी प्रमुख मंदिरों और पूजा स्थलों पर प्रतिदिन संध्या आरती, विशेष महाभोग, वैदिक पूजन और सांस्कृतिक भजनों का दौर लगातार चलता रहेगा।

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    17 अगस्त को निकलेगी बाला लखेंद्र की भव्य बारात

    आगामी 16 अगस्त 2026 को सिंह नक्षत्र के प्रवेश करते ही मुख्य पूजा बेदी पर मां विषहरी की भव्य प्रतिमाएं मंत्रोच्चार के साथ स्थापित कर दी जाएंगी। इसके अगले दिन 17 अगस्त को कुंवारी डालिया चढ़ाया जाएगा और संध्या काल में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ बाला लखेंद्र की अति भव्य बारात निकाली जाएगी। इसी रात को चंपानगर के मंदिर परिसर में प्रसिद्ध सर्पदंश (सांप काटने) और सती बिहुला के मंजूषा पर रवाना होने के दृश्यों का जीवंत लोक नाट्य मंचन किया जाएगा।

    18 अगस्त को सुहागिनें चढ़ाएंगी डालिया, 19 को होगा विसर्जन

    इसके बाद 18 अगस्त 2026 को क्षेत्र की हजारों सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सुहाग की रक्षा के लिए मां मनसा के चरणों में पारंपरिक डालिया और खोइछा अर्पित करेंगी। अंत में 19 अगस्त को भारी सुरक्षा व्यवस्था और पारंपरिक मंजूषा झांकियों के साथ मां विषहरी की प्रतिमाओं का भव्य विसर्जन जलाशयों में संपन्न कराया जाएगा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंपानगर के शिवभक्त चांदो सौदागर के अहंकार को तोड़ने के लिए सिंह नक्षत्र में नाग ने बाला लखेंद्र को डंसा था, जिसके बाद सती बिहुला यमलोक से पति के प्राण लाई थी।

    सौदागर ने गुस्से में बाएं हाथ से दी थी मां मनसा को पूजा

    सती बिहुला की घोर तपस्या के बाद ही चांदो सौदागर ने विषहरी की पूजा स्वीकार की थी, लेकिन उन्होंने क्रोध में आकर अपने बाएं हाथ से अर्घ्य दिया था। तभी से अंग क्षेत्र की इस प्राचीन परंपरा में आज भी मां विषहरी की पूजा और अर्घ्य हमेशा बाएं हाथ से ही समर्पित करने की अनूठी रस्म निभाई जाती है। अब इस पूरी लोक विरासत को राजकीय महोत्सव का रूप मिलने से न केवल स्थानीय कलाकारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि भागलपुर में सांस्कृतिक पर्यटन (टूरिज्म) को भी पंख लगेंगे।