क्या होता है हाथियों का गलियारा? बिहार में पहली बार गजराज के लिए 3 जगहों पर 46 KM लंबा बना ऐसा रास्ता
जमुई वन प्रक्षेत्र को बिहार का पहला प्राकृतिक हाथी गलियारा घोषित किया गया है, जिससे हाथियों के आवागमन में मदद मिलेगी। हालांकि, भोजन की कमी और मानव बस् ...और पढ़ें

जमुई में बना बिहार का पहला प्राकृतिक हाथी गलियारा
HighLights
जमुई वन क्षेत्र बिहार का पहला हाथी गलियारा बना।
भोजन-पानी की कमी से मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा।
हाथियों ने फसलों, घरों को नुकसान पहुंचाया, लोग घायल।
जागरण संवाददाता, जमुई। जमुई वन प्रक्षेत्र का गरही वन क्षेत्र, झाझा का चरकापत्थर और बटिया वन क्षेत्र तथा चकाई वन प्रक्षेत्र का मधवा उपवन क्षेत्र अब बिहार का पहला प्राकृतिक हाथी गलियारा बन गया है। यह खुलासा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, परियोजना हाथी और भारतीय वन्यजीव संस्थान की हालिया रिपोर्ट में हुआ है।
जिला वन पदाधिकारी ने बताया कि पिछले सात माह में हाथियों के झुंड ने पांच बार चकाई, सोनो, झाझा, खैरा और जमुई प्रखंड के विभिन्न गांवों में दस्तक दी। इस दौरान फसलें, कच्चे मकान और अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचा।
हाथियों का आवागमन और भोजन की चुनौती
इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के अनुसार हाथी भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं। एक हाथी को प्रतिदिन लगभग 200 किलो चारा की जरूरत होती है। जब जंगलों में प्राकृतिक चारा कम पड़ता है, तो हाथी खेतों की ओर रुख करते हैं। गेहूं, गन्ना और मक्का जैसी फसलें जंगली वनस्पति की तुलना में अधिक पोषण और कैलोरी देती हैं, यही कारण है कि झुंड जोखिम उठाकर खेतों में घुस जाता है।
वन क्षेत्रों के बीच पारंपरिक गलियारों में बाधा या विखंडन होने से हाथी रास्ता बदलने को मजबूर होते हैं। सड़कें, रेल लाइनें और मानव बस्तियों का विस्तार इनके प्राकृतिक आवास की निरंतरता तोड़ रहा है।
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फसलों और संपत्ति को पहुंचा नुकसान
हाथियों के झुंड ने जिले में कई बार उत्पात मचाया। 21 से 24 नवंबर, 2025 को चकाई प्रखंड के बरमोरिया, पोझा, बामदह और बोंगी पंचायत के 20 से अधिक गांवों में तथा सोनो प्रखंड के बटिया और कटहराटांड़ में फसलें और कच्चे मकान क्षतिग्रस्त हुए। इस दौरान आधा दर्जन लोग घायल भी हुए और एक बच्चे का हाथ टूट गया।
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28 फरवरी, 2026 को खैरा प्रखंड के ताराटांड गांव में आधा दर्जन से अधिक कच्चे मकान क्षतिग्रस्त हुए और 100 बीघा से अधिक फसल को नुकसान पहुंचा। 15-16 मार्च को जमुई प्रखंड के अड़सार, इकेरिया, खड़सारी, मंझवे और नवीनगर में 26 हाथियों के झुंड ने लगभग 500 बीघा फसल रौंद दी। इसके अलावा 15 मई से चकाई और गिरिडीह जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में हाथियों का एक जोड़ा भी मौजूद है, जिसने आधा दर्जन किसानों की मूंग की फसल को नुकसान पहुंचाया।
हाथियों का गलियारा क्या है?
हाथी गलियारा भूमि की संकरी पट्टी या रास्ता है, जो दो बड़े जंगली आवासों को जोड़ता है। हाथी भोजन, पानी और प्रजनन के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। यह उनके लिए हाईवे की तरह काम करता है। केंद्र की परियोजना हाथी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 15 राज्यों में लगभग 150 हाथी गलियारे चिह्नित किए गए हैं। जमुई-झाझा और चकाई वन प्रक्षेत्र का इलाका बिहार का पहला हाथी गलियारा है।
इसके अलावा झारखंड के रांची, खूंटी, गिरिडीह, दुमका, चाईबासा, हजारीबाग और पलामू क्षेत्र भी हाथी गलियारों के लिए प्रसिद्ध हैं। पश्चिम बंगाल में 26, पूर्वी-मध्य भारत में 52 और उत्तर-पूर्व भारत में 48 गलियारे हैं। तमिलनाडु के मुदुमलाई नेशनल पार्क और जिम कार्बेट नेशनल पार्क भी इस सूची में शामिल हैं।
वन विभाग और ग्रामीणों के बीच बेहतर तालमेल ही हाथियों और मनुष्यों के संघर्ष को कम कर सकता है। समस्या केवल हाथियों को रोकने में नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक गलियारों को बहाल करने में है। वन विभाग की कोशिश है कि हाथियों के आवागमन के लिए सुरक्षित गलियारों की व्यवस्था की जाए और नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।
तेजस जायसवाल, डीएफओ, जमुई
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