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    बेड नहीं मिला, फर्श पर पति को संभालती रही पत्नी... बिहार में ₹5.75 करोड़ का अस्पताल बना तमाशा

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 04:19 PM (IST)

    5.75 करोड़ की लागत से बना झाझा का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दो उद्घाटन के बाद भी अनुपयोगी है, जिसके कारण एक मरीज को पुराने भवन में बेड न मिलने पर फर् ...और पढ़ें

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    फर्श पर लेटकर बेड खाली होने का इंतजार करते मरीज। जागरण

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    संक्षेप में पढ़ें

    सोनू कुमार सिंह, बोड़वा (जमुई)। सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और ढुलमुल रवैये का इससे वीभत्स उदाहरण और क्या होगा कि 5.75 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बना 30 बेड का आलिशान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आज महज एक शो-पिस बनकर रह गया है।

    इस आधुनिक भवन का एक नहीं, बल्कि दो-दो बार भव्य उद्घाटन किया जा चुका है, लेकिन विडंबना देखिए कि इलाके की जनता के नसीब में आज भी पुराने जर्जर भवन के पांच तंग कमरे और धूल भरी जमीन ही है।

    मंगलवार को मानवता को झकझोर देने वाली तस्वीर तब सामने आई, जब झाझा प्रखंड के चर्घरा मोहल्ला निवासी प्रदीप साह फूड प्वाइजनिंग के कारण गंभीर स्थिति में इलाज कराने पहुंचे। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच मरीज का शरीर टूट रहा था, लेकिन पुराने भवन में बेड फुल थे।

    मजबूरन, असहनीय दर्द से तड़पते प्रदीप को अस्पताल के तपते हुए फर्श पर लेटकर अपनी बारी और बेड खाली होने का इंतजार करना पड़ा।

    उनकी पत्नी निर्मला देवी की बेबसी चीख-चीखकर सिस्टम से सवाल पूछ रही थी कि आखिर पौने छह करोड़ की लागत से बना वह नया भवन किस काम का, जहां गरीब को सिर छिपाने की जगह और एक बेड तक मयस्सर नहीं?

    कैमरा देख जागी सरकारी संवेदना

    हैरानी की बात यह है कि करीब आधे घंटे तक मरीज फर्श की गर्मी सहते हुए पड़ा रहा, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। जैसे ही दैनिक जागरण की टीम का कैमरा चमका और फ्लैश पड़ा, अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया।

    आनन-फानन में अपनी गर्दन बचाने के लिए कर्मियों ने मरीज को उठाया और ड्रेसिंग रूम में शिफ्ट कर उपचार शुरू किया। यह घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता और जनता के पैसे की बर्बादी पर तीखा प्रहार है।

    सवाल उठता है कि जब इलाज पुराने पांच कमरों में ही करना था तो करोड़ों का नया भवन खड़ा ही क्यों किया गया? क्या वीआइपी उद्घाटन सिर्फ नेताओं की फोटो खिंचवाने के लिए थे?

    फर्श पर लेटा वह असहाय मरीज

    दरअसल, हमारी बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था का असली चेहरा है। प्रशासन की यह सुस्ती और संवेदनहीनता किसी बड़े हादसे को दावत दे रही है। आखिर कब तक फाइलें जनता की जान पर भारी पड़ती रहेंगी?

    मेरे संज्ञान में मामला नहीं है। पुरानी भवन में थोड़ा परेशानी है। नए भवन में शिफ्ट होते ही सारी परेशानी दूर हो जाएगी।- डॉ. नवाब, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, झाझा