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    चीन के सामने अकेला सीना तानकर खड़ा रहा भारत, नहीं पूरा होने दिया मंसूबा; तुर्किए-साउथ अफ्रीका छोड़ गए साथ

    Updated: Mon, 30 Mar 2026 02:37 PM (IST)

    भारत ने कैमरून में 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में चीन के नेतृत्व वाले 'इनवेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट' (IFD) समझौते को WTO के कानूनी ढांचे में श ...और पढ़ें

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    चीन के प्रस्ताव के खिलाफ भारत अड़ गया अकेला

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    संक्षेप में पढ़ें

    नई दिल्ली। भारत ने चीन की एक बड़ी योजना को ठेंगा दिया है। बता दें कि वैश्विक दबाव के सामने डटे रहते हुए, भारत ने अफ्रीकी देश कैमरून की राजधानी याउंडे में आयोजित 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में चीन के नेतृत्व वाले 'इनवेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट' (IFD) समझौते को WTO के लीगल फ्रेमवर्क में शामिल होने से रोक दिया है। अहम बात ये है कि अब इस लिस्ट में चीन का विरोध करने वाला भारत अकेला देश रह गया है। पहले तुर्किए भी इस लिस्ट में था, मगर अब उसने भी विरोध रोक दिया।
    भारत ने तर्क दिया कि यह समझौता इस बहुपक्षीय ग्रुप के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करेगा और इसके कार्यात्मक दायरे का उल्लंघन भी करेगा।

    'भारत ने दिखाया साहस'

    इस मामले पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार देर रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर कहा कि, “WTOMC14 में, महात्मा गांधी जी के इस दर्शन से प्रेरणा लेते हुए कि सत्य हमेशा परंपराओं पर भारी पड़ता है, भारत ने IFD समझौते के विवादास्पद मुद्दे पर अकेले खड़े होने का साहस दिखाया और इसे WTO के फ्रेमवर्क में ‘Annex 4 Agreement’ के तौर पर शामिल करने पर सहमति नहीं दी”।
    WTO में शामिल 128 देशों द्वारा समर्थित, IFD का मकसद ज्यादा पारदर्शिता और सही प्रोसेस के जरिए FDI को सुव्यवस्थित करना है। हालाँकि, भारत का यह मानना है कि WTO के पास निवेश से जुड़े मुद्दों के लिए कोई अधिकार-क्षेत्र (mandate) नहीं है।

    भारत ने क्यों दी चेतावनी?

    भारत ने चेतावनी दी है कि जिन समझौतों पर आम सहमति नहीं है, उन्हें शामिल करने से एक खतरनाक मिसाल कायम होगी। इससे फूड सेफ्टी और पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग जैसे महत्वपूर्ण और लंबे समय से लंबित मुद्दों को नजरअंदाज किए जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

    क्या है चीन का प्रयास?

    WTO के बुनियादी नियमों को दरकिनार करने की कोशिश के खिलाफ भारत का लगातार विरोध और भी ज्यादा गौर करने वाला है, क्योंकि दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए ने इस पर अपनी आपत्ति खत्म कर दी है। चीन की तरफ से कोशिश की जा रही है कि IFD समझौते को औपचारिक रूप दिया जाए। मगर ये एक ऐसा बहुपक्षीय समझौता है जिसे WTO के सभी सदस्यों का समर्थन प्राप्त नहीं है।
    2017 में ब्यूनस आयर्स में आयोजित WTO MC11 में, कई शक्तिशाली विकसित देशों समेत कुछ सदस्यों ने "जॉइंट स्टेटमेंट इनिशिएटिव्स" (JSI) के जरिए ई-कॉमर्स, निवेश और MSMEs जैसे क्षेत्रों पर नए नियम लागू करने पर जोर देना शुरू कर दिया था।

    भारत, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की का तर्क

    भारत, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की का तर्क रहा है कि WTO के संस्थापक 'माराकेश समझौते' के तहत JSI की कोई कानूनी वैधता नहीं है। निवेश सुविधा के मुद्दे पर, उन्होंने 2004 के 'जनरल काउंसिल' के उस फैसले का हवाला दिया, जिसने इस विषय को WTO के एजेंडे से स्पष्ट रूप से हटा दिया था।
    इन 3 देशों का कहना था कि सदस्यों का कोई छोटा समूह (subset) किसी ऐसे मुद्दे को एकतरफा रूप से दोबारा नहीं उठा सकता, जिसे पहले सर्वसम्मति से हटा दिया गया था।

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