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    New Labour Code: 1 अप्रैल से कम होगी इन-हैंड सैलरी? 4 दिन काम और 3 दिन छुट्टी का सच, 12 सवालों में जानें सब कुछ

    Updated: Wed, 01 Apr 2026 05:14 AM (IST)

    New Labour Codes 2026: नए लेबर कोड 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे, जो इन-हैंड सैलरी, काम के घंटे और रिटायरमेंट प्लानिंग को बदल देंगे। बेसिक वेतन कुल सैलर ...और पढ़ें

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    नई दिल्ली| देश में 1 अप्रैल 2026 से नया लेबर कोड (New Labour Codes) लागू होने जा रहा है। यह बदलाव केवल कागजी नहीं है, बल्कि आपकी इन-हैंड सैलरी, काम के घंटों और रिटायरमेंट प्लानिंग को पूरी तरह से री-सेट करने वाला है। सरकार ने 44 पुराने कानूनों को समेटकर 4 आसान कोड्स में बांट दिया है।

    ऐसे में लोगों के मन के मन में कंफ्यूजन है और कई सवाल हैं कि आखिर क्या इन हैंड सैलरी कम हो जाएगी? काम के घंटे बढ़ जाएंगे या फिर कम होंगे? क्या वाकई ग्रैच्युटी एक साल में मिलेगी? आपके ऐसे ही 12 सवालों के जवाब दिए कोर इंडीग्रा के एमडी महेश कृष्णमूर्ति ने और पूरा कंफ्यूजन दूर किया। 

    सवाल 1: नए लेबर कोड आने से मेरी लाइफ कितनी बदलेगी?

    जवाबः हमारे देश में अब तक जो श्रम कानून चल रहे थे, वे दशकों पुराने थे। आज की पीढ़ी की जरूरतें और काम करने का तरीका (जैसे वर्क फ्रॉम होम या गिग इकॉनमी) पूरी तरह बदल चुका है। नए कोड्स का मकसद 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के साथ-साथ 'ईज ऑफ लिविंग' भी है। यह सब कुछ डिजिटल और पारदर्शी बनाने की कोशिश है। अब नियम पूरे देश में एक समान (यूनिफॉर्म) होंगे, जिससे कर्मचारियों के लिए जटिलताएं कम होंगी।

    सवाल 2: क्या मेरी इन-हैंड सैलरी कम हो जाएगी?

    जवाबः यह सबसे बड़ा डर है, पर इसे थोड़ा गहराई से समझना होगा। नए नियमों के अनुसार, आपका 'बेसिक वेतन' आपकी कुल सैलरी (CTC) का कम से कम 50% होना चाहिए।

    • असर: जिन कंपनियों में बेसिक कम और भत्ते (Allowances) ज्यादा थे, वहां बेसिक बढ़ेगा।
    • नतीजा: बेसिक बढ़ने से पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी में आपका योगदान बढ़ जाएगा। इससे महीने में हाथ में आने वाली सैलरी थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन आपकी लॉन्ग टर्म सेविंग्स बहुत मजबूत हो जाएगी।

    सवाल 3: काम के घंटे कितने होंगे? क्या अब 5 दिन काम (5-Day Work) का सपना पूरा होगा?

    जवाब: नए कोड में हफ्ते में अधिकतम 48 घंटे काम का प्रावधान है। कंपनियां इसे दो तरह से लागू कर सकती हैं:

    • अगर आप दिन में 8 घंटे काम करते हैं, तो 6 दिन की वर्किंग होगी।
    • अगर कंपनी 12 घंटे की शिफ्ट रखती है, तो आपको हफ्ते में सिर्फ 4 दिन काम करना होगा और 3 दिन की छुट्टी मिलेगी।
    • यह पूरी तरह एम्प्लॉयर और एम्प्लॉई के बीच के एग्रीमेंट पर निर्भर करेगा, लेकिन नियमों में लचीलापन दिया गया है।

    सवाल 4: ओवरटाइम (Overtime) को लेकर क्या नियम हैं? क्या एक्स्ट्रा पैसे मिलेंगे?

    जवाब: बिल्कुल। नए लेबर कोड में ओवरटाइम के नियमों को बहुत सख्त और पारदर्शी बनाया गया है। अगर आप तय घंटों से ज्यादा काम करते हैं, तो कंपनी को आपको सामान्य मजदूरी से दोगुना भुगतान करना होगा। पहले राज्यों के हिसाब से नियम अलग थे, अब इनमें एकरूपता लाने की कोशिश की जा रही है।

    सवाल 5: छुट्टियों (Leaves) का क्या होगा? क्या बची हुई छुट्टियां अब पैसा बनेंगी?

    जवाब: यह एक बहुत ही सकारात्मक बदलाव है। पुराने कानूनों में छुट्टियों को भुनाने (Encashment) पर क्लेरिटी कम थी। अब नियम कहता है कि साल के अंत में आप एक निश्चित सीमा तक छुट्टियां कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं, लेकिन उसके ऊपर की छुट्टियों का पैसा देना (Encashment) अनिवार्य कर दिया गया है। यानी आपकी मेहनत की छुट्टियां अब बेकार नहीं जाएंगी।

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    सवाल 6: पीएफ (PF) के योगदान में क्या बदलाव है?

    जवाब: पीएफ अब आपके 'एक्चुअल बेसिक पे' पर आधारित होगा। सरकार ने विकल्प भी दिया है- अगर आप युवा हैं और हाथ में ज्यादा पैसा चाहते हैं, तो आप ₹15,000 की न्यूनतम थ्रेशहोल्ड पर योगदान कर सकते हैं। लेकिन अगर आपकी उम्र 35-40 साल है और आप रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड चाहते हैं, तो आप पूरी बेसिक सैलरी पर योगदान कर सकते हैं। विकल्प आपके हाथ में है।

    सवाल 7: ग्रेच्युटी (Gratuity) को लेकर क्या नया है? क्या 1 साल की नौकरी पर भी यह मिलेगी?

    जवाब: सामान्य कर्मचारियों के लिए तो नियम वही है, लेकिन फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट (FTC) वाले कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी है। पहले उन्हें ग्रेच्युटी नहीं मिलती थी, लेकिन अब अगर वे 1 साल का कॉन्ट्रैक्ट भी पूरा करते हैं, तो वे ग्रेच्युटी के हकदार होंगे। साथ ही, बेसिक सैलरी बढ़ने से आपकी कुल ग्रेच्युटी की रकम भी काफी बढ़ जाएगी।

    सवाल 8: जोमैटो-स्विगी जैसे गिग वर्कर्स (Gig Workers) के लिए इसमें क्या है?

    जवाब: पहली बार भारतीय श्रम कानूनों में गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को शामिल किया गया है। उनके लिए सोशल सिक्योरिटी फंड बनाया जाएगा। इसका मतलब है कि अब इन वर्कर्स को भी हेल्थ इंश्योरेंस और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सकेगा, जो पहले सिर्फ ऑफिस जाने वालों को मिलता था।

    सवाल 9: . महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट और सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं?

    जवाब: महिलाएं अब हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। नए कोड में प्रावधान है कि अगर महिला कर्मचारी चाहे, तो वह नाइट शिफ्ट में काम कर सकती है। हालांकि, इसके लिए एम्प्लॉयर को उनकी सुरक्षा, ट्रांसपोर्ट और लाइटिंग के पुख्ता इंतजाम करने होंगे। इसके अलावा, महिलाओं और 'थर्ड जेंडर' की भागीदारी बढ़ाने के लिए नियमों को सरल बनाया गया है।

    सवाल 10: क्या बच्चों के लिए 'क्रेच (Creche)' की सुविधा मिलेगी?

    जवाब: हां, यह बहुत व्यावहारिक बदलाव है। पहले कंपनियों के लिए क्रेच बनाना मुश्किल होता था और मां के लिए बच्चे को ऑफिस लाना भी कठिन था। अब नए नियमों में क्रेच अलाउंस (Compensation) का विकल्प दिया जा रहा है। कंपनी कर्मचारी को एक निश्चित रकम दे सकती है ताकि वह अपने घर के पास स्थित किसी भी क्रेच में बच्चे को रख सके।

    सवाल 11: हेल्थ इंश्योरेंस और ईएसआईसी (ESIC) के दायरे में क्या बदलाव है?

    जवाब: ईएसआईसी का कैलकुलेशन अब 'ग्रॉस सैलरी' की जगह 'वेजेस' (बेसिक+डीए) पर होगा। इससे कर्मचारियों का प्रीमियम कम होगा और कवरेज बढ़ेगी। चर्चा यह भी है कि ईएसआईसी की सैलरी लिमिट ₹21,000 से बढ़ाकर ₹30,000 की जा सकती है। अगर ऐसा होता है, तो एक बहुत बड़ी आबादी को सरकारी मेडिकल सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

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    सवाल 12: अंत में, नए लेबर कोड के फायदे और नुकसान क्या हैं?

    जवाब: इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी:

    • फायदे- सबसे बड़ा फायदा पारदर्शिता और रिटायरमेंट सिक्योरिटी का है। गिग वर्कर्स को पहचान मिली है और महिलाओं के लिए अवसर बढ़े हैं। डिजिटलाइजेशन से कागजी काम कम होगा।
    • नुकसान- तात्कालिक तौर पर एम्प्लॉयर पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा क्योंकि उन्हें ग्रेच्युटी और पीएफ में ज्यादा योगदान देना होगा। वहीं, कर्मचारियों के हाथ में आने वाली सैलरी (Take-home pay) में थोड़ी गिरावट आ सकती है।

    यानी यह साफ है कि 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले ये लेबर कोड भारत के वर्क कल्चर को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। शुरुआत में थोड़े तालमेल की जरूरत होगी, लेकिन लंबे समय में यह कर्मचारी और कंपनी दोनों के हित में है।