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    भारत के बाद अब इस मुस्लिम देश ने रेयर अर्थ को लेकर उठाया बड़ा कदम, US ने लगाया हाथ; चीन के उड़ेंगे होश!

    Updated: Fri, 06 Feb 2026 07:01 PM (IST)

    चीन के रेयर अर्थ मेटल पर एकाधिकार के खिलाफ वैश्विक स्तर पर मोर्चा खुल गया है। 2025 में चीन के प्रतिबंधों के बाद, अब संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका के स ...और पढ़ें

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    भारत के बाद अब इस मुस्लिम देश ने रेयर अर्थ को लेकर उठाया बड़ा कदम, US ने लगाया हाथ; चीन के उड़ेंगे होश!

    नई दिल्ली। रेयर अर्थ मेटल पर एकाधिपत्य राज करने वाले चीन के खिलाफ वैश्विक स्तर पर मोर्चा खुल चुका है। दुर्लभ खनिजों को लेकर जिस तरह से चीन ने 2025 में प्रतिबंध लगाए, उसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। ट्रंप टैरिफ के खिलाफ कदम उठाते हुए उसने रेयर अर्थ मेटल (rare earth metals) के निर्यात पर कई कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।

    इस प्रतिबंध ने पूरी दुनिया को कहीं न कहीं आईना दिखाने का काम किया कि किसी भी देश के ऊपर पूरे विश्व की निर्भरता के लिए कितना बड़ा खतरा साबित हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अधिकतर देशों ने रेयर अर्थ मेटल को लेकर कई बड़े कदम उठाए। भारत ने भी ऑस्ट्रेलिया के साथ रेयर अर्थ पर डील की थी। बजट में भारत ने रेयर अर्थ कॉरिडोर (India Rare Earth Cordier)  बनाने की बात कही। वहीं, अब मुस्लिम देश UAE ने भी अमेरिका के साथ समझौता किया है।

    संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के बीच समझौता

    संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE ने रेयर अर्थ मेटल को लेकर अमेरिका के साथ समझौता किया है। दोनों देशों ने तेजी से बढ़ती वैश्विक मांग के बीच महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति को सुरक्षित करने पर केंद्रित एक नए फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए हैं।  

    महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ धातुओं के खनन और प्रसंस्करण (Mining and processing) में आपूर्ति को सुरक्षित करने पर फ्रेमवर्क पर वाशिंगटन, डीसी में अमेरिकी महत्वपूर्ण खनिज मंत्रिस्तरीय बैठक के मौके पर हस्ताक्षर किए गए।

    दोनों पक्ष फाइनेंसिंग, गारंटी, इक्विटी इन्वेस्टमेंट, ऑफटेक अरेंजमेंट, इंश्योरेंस और रेगुलेटरी सुविधा सहित कई तरीकों से इन्वेस्टमेंट को सपोर्ट करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे मिलकर ऐसे प्रायोरिटी प्रोजेक्ट्स की पहचान करने की भी योजना बना रहे हैं जो सप्लाई चेन की कमियों को दूर करें। साइन करने के छह महीने के अंदर, दोनों देशों में मौजूद प्रोजेक्ट्स को फाइनेंसिंग देने के लिए कदम उठाए जाने की उम्मीद है, जिनके फाइनल प्रोडक्ट्स UAE और US मार्केट में खरीदारों को डिलीवर किए जाएंगे।

    रेयर अर्थ मेटल पर भारत भी कई देशों से कर चुका है समझौता

    भारत ने सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, जाम्बिया, पेरू, जिम्बाब्वे, मोजाम्बिक, मलावी और कोटे डी'आइवर सहित कम से कम आठ प्रमुख देशों के साथ महत्वपूर्ण खनिजों और रेयर अर्थ के लिए द्विपक्षीय समझौते और MoU पर साइन किए हैं। ब्राजील, UAE और मध्य एशियाई देशों जैसे देशों के साथ आगे की पार्टनरशिप और बातचीत चल रही है।

    कौन है रेयर अर्थ मेटल का राजा?

    चीन के पास 44 मिलियन मीट्रिक टन के साथ रेयर अर्थ का सबसे ज्यादा भंडार है। यह देश 2024 में दुनिया का सबसे बड़ा रेयर अर्थ प्रोड्यूसर भी था, जिसने 270,000 मीट्रिक टन का प्रोडक्शन किया।

    पहले से ही टॉप पोजीशन पर होने के बावजूद, चीन यह पक्का करने पर ध्यान दे रहा है कि उसके रेयर अर्थ के भंडार ज्यादा बने रहें। 2012 में, इस एशियाई देश ने घोषणा की थी कि इन मटीरियल का भंडार कम हो रहा है; फिर 2016 में उसने घोषणा की कि वह कमर्शियल और नेशनल स्टॉकपाइल बनाकर घरेलू भंडार बढ़ाएगा।

    ब्राजील के पास 21 मिलियन मीट्रिक टन के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ्स रिजर्व है। तीसरे नंबर पर भारत है। भारत के रेयर अर्थ्स रिजर्व 6.9 मिलियन मीट्रिक टन हैं, और इसने 2024 में 2,900 मीट्रिक टन रेयर अर्थ्स का प्रोडक्शन किया, जो पिछले कुछ सालों के बराबर है। भारत के पास दुनिया के लगभग 35 प्रतिशत बीच और रेत मिनरल डिपॉजिट हैं, जो रेयर अर्थ्स के महत्वपूर्ण सोर्स हैं। देश के एटॉमिक एनर्जी डिपार्टमेंट ने दिसंबर 2022 में एक बयान जारी किया था जिसमें उसने अपने रेयर अर्थ्स प्रोडक्शन और रिफाइनिंग कैपेसिटी के बारे में बताया था।

    चीन को घेरने की कोशिश

    भले ही भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ रिजर्व है, लेकिन हमारे पास इसे प्रोसेस करने की तकनीक नहीं है। हालांकि, अब सरकार इस पर मजबूती से काम कर रही है।

    भारत के अलावा हर एक देश जो चीन पर डिपेंडेंट है वह खुद को रेयर अर्थ मेटल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में लगा हुआ है। इस कड़ी में अमेरिका भी आगे है। वह यह नहीं चाहता कि चीन की वजह से उसके देश में होने वाली रेयर अर्थ मेटल की खपत प्रभावित हो और इंडस्ट्री बाहरी देशों में जाकर कारोबार करें। यही कारण है कि अमेरिका अलग-अलग देशों के साथ समझौता कर रहा है।

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