Gold Monetisation Scheme: क्या है गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम, जिसे फिर लागू करने की मांग कर रहे देशभर के ज्वैलर्स?
Gold Monetisation Scheme Explained: देश में सोने की कीमतों में गिरावट और बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी के बीच गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम फिर चर्चा में है। ज्वैलर्स ...और पढ़ें

क्या है गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम, जिसे फिर लागू करने की मांग कर रहे देशभर के ज्वैलर्स?

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नई दिल्ली| देश में सोने की कीमतों में भारी गिरावट और गोल्ड इंपोर्ट पर बढ़ी ड्यूटी के बीच एक बार फिर गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम (Gold Monetization Scheme) चर्चा में आ गई है। जेम्स-ज्वैलरी इंडस्ट्री जुड़े कारोबारी और दिल्ली सराफा बाजार के अध्यक्ष योगेश सिंघल समेत देशभर के तमाम ज्वैलर्स सरकार से इस स्कीम को मजबूत तरीके से लागू करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे भारत का गोल्ड इंपोर्ट कम होगा और घरों में पड़ा निष्क्रिय सोना अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल हो सकेगा।
पिछले दिनों सरकार ने गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी को बढ़ाकर प्रभावी रूप से 15% कर दिया है। इसमें 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5% एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस शामिल है। सरकार का मकसद बढ़ते गोल्ड इंपोर्ट और करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव कम करना है।
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लोगों से सोने की खरीद कुछ समय टालने की अपील कर चुके हैं। ऐसे में इंडस्ट्री का मानना है कि गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम एक बेहतर विकल्प हो सकता है। ऐसे में अब समझते हैं कि आखिर गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम है क्या और इसके फायदे नुकसान क्या हो सकते हैं?
क्या है गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम?
RBI ने 2015 में गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम (GMS Scheme RBI) शुरू की थी। इसका मकसद घरों, मंदिरों और संस्थानों में पड़े निष्क्रिय सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाना है। सरल भाषा में समझें तो इस स्कीम के तहत कोई भी भारतीय अपने गोल्ड ज्वैलरी, कॉइन या बार को बैंक में जमा (Gold Deposit Scheme) कर सकता है। बदले में बैंक उस पर ब्याज देता है। मैच्योरिटी पर ग्राहक चाहे तो सोने की मौजूदा कीमत के हिसाब से पैसा ले सकता है या फिर फिजिकल गोल्ड भी ले सकता है।
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भारत में लोगों के पास करीब 25,000 टन सोना होने का अनुमान है, जबकि घरेलू मांग पूरी करने के लिए हर साल 700 टन से ज्यादा सोना आयात किया जाता है। सरकार चाहती है कि पुराने सोने का इस्तेमाल बढ़े ताकि इम्पोर्ट कम हो सके।
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कैसे काम करती है यह स्कीम?
सबसे पहले ग्राहक को किसी अधिकृत बैंक में गोल्ड डिपॉजिट अकाउंट खोलना होता है। इसके बाद बैंक द्वारा अधिकृत कलेक्शन एंड प्योरिटी टेस्टिंग सेंटर यानी सीपीटीसी (CPTC) पर सोने की जांच होती है। जांच के दौरान सोने की शुद्धता तय की जाती है और उसी आधार पर जमा राशि तय होती है। फिर बैंक ग्राहक के खाते में उतनी मात्रा का गोल्ड डिपॉजिट दर्ज करता है।
फिलहाल बैंक केवल शॉर्ट टर्म बैंक डिपॉजिट (Short Term Bank Deposit) के तहत 1 से 3 साल की अवधि के लिए जमा स्वीकार कर रहे हैं। मार्च 2025 से मीडियम टर्म और लॉन्ग टर्म डिपॉजिट विकल्प बंद कर दिए गए हैं।
स्कीम का सबसे बड़ा फायदा क्या है?
इस स्कीम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि घर या लॉकर में पड़ा सोना सिर्फ संपत्ति बनकर नहीं रहता, बल्कि उससे ब्याज कमाया जा सकता है। इसके और भी कई फायदे हैं। जैसे-
- सोना सुरक्षित रहता है
- लॉकर चार्ज का खर्च बच सकता है
- देश का गोल्ड इंपोर्ट घटाने में मदद मिलती है
- बैंकिंग सिस्टम में गोल्ड का इस्तेमाल बढ़ता है
ज्वैलर्स का कहना है कि अगर स्कीम को आसान बनाया जाए तो लोग ज्यादा हिस्सा ले सकते हैं।
लेकिन नुकसान भी कम नहीं!
भारतीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा भावनात्मक मुद्दा यही है कि जमा किया गया वही गहना वापस नहीं मिलता। दरअसल, बैंक सोने को पिघलाकर बार में बदल देते हैं। गहनों में लगे स्टोन या डिजाइन अलग कर दिए जाते हैं। यानी शादी, परिवार या भावनाओं से जुड़े गहने हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा- शुद्धता जांच में वजन कम हो सकता है। सभी बैंक समान ब्याज नहीं देते। समय से पहले निकासी के नियम अलग-अलग हैं।
मैच्योरिटी पर गोल्ड या कैश कैसे मिलेगा, यह पहले समझना जरूरी है। और इसी वजह से अभी तक यह स्कीम आम लोगों में ज्यादा लोकप्रिय नहीं बन पाई है। अब दिल्ली के ज्वैलर्स चाहते हैं कि सरकार बैंक, रिफाइनरी और ज्वैलरी इंडस्ट्री को जोड़कर इसका नया मॉडल लाए, ताकि ज्यादा लोग इस स्कीम से जुड़ सकें।
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