‘सस्ता कच्चा माल और फाइनेंस उपलब्ध कराने, सरकारी खरीद में पेमेंट में सुधार की जरूरत’
Budget 2026 MSME Expectation: भारत की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले MSME कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। FISME के अनिल भारद्वाज ने बजट में ...और पढ़ें
भारत की जीडीपी में करीब एक-तिहाई योगदान एमएसएमई का है। ये मैन्युफैक्चरिंग में करीब 35% योगदान करते हैं। देश का 40% से 50% एक्सपोर्ट एमएसएमई के जरिए होता है। इनमें करीब 33 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है। इन छोटी-मझोली इकाइयों की दिक्कतें क्या हैं और बजट में उनका क्या समाधान हो सकता है, इस पर जागरण ने बात की एमएसएमई संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज से। भारद्वाज का कहना है कि बजट में MSME को कच्चे माल की उचित कीमत पर उपलब्ध कराने, बैंकों से कर्ज में सुधार करने और सरकारी खरीद में समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के कदम उठाए जाने चाहिए। बातचीत के मुख्य अंश-
-अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कहा है कि 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाएंगे। भारत पहले ही 50% टैरिफ झेल रहा है। टैरिफ से निपटने के लिए बजट में क्या किया जाना चाहिए?
देखिए, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इतना बड़ा संकट कभी सामने नहीं आया। उस समय जनरल एग्रीमेंट ऑन टेररिफ्स एंड ट्रेड (GATT) की स्थापना हुई थी, जिसने आने वाले कई दशकों तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रूल बेस्ड सिस्टम की स्थापना की। 1995 में डब्ल्यूटीओ के रूप में उसको और सुदृढ़ किया गया। 2025 में जो हुआ वैसा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं हुआ। एक देश ने सभी तरह के एग्रीमेंट्स को नकारते हुए एकतरफा टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी।
भारत पर इसका नुकसान स्पष्ट है। हमारे ऊपर 50% टैरिफ है। हमारे बहुत से प्रतिस्पर्धी देशों- वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, चाइना पर उतना टैरिफ नहीं लगा। हमारे प्रोडक्ट्स जो पहले ही कंपटीशन में पिछड़ रहे थे, वे टैरिफ के बाद तो बिल्कुल कॉस्ट कंपिटिटिव नहीं रहे। टेक्सटाइल एंड गारमेंट, जेम्स एंड ज्वेलरी है, लेदर सेक्टर के निर्यात में 30% से 60% कमी आई है।
-इस टैरिफ के बाद द्विपक्षीय व्यापार समझौते बढ़ गए हैं। भारत भी दूसरे देशों के साथ एफटीए कर रहा है। पिछले साल हमने यूके, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ समझौता किया। यूरोपियन यूनियन के साथ भी जल्दी होने वाला है। एफटीए का कितना फायदा देखते हैं?
एफटीए की तरफ रुझान बढ़ने का मतलब है कि हमारा विश्वास मल्टीलैटरल रिजीम से हटा है। यानी डब्ल्यूटीओ जैसे इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशन पर हमारा विश्वास कम हुआ है। इसी कारण हम दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं।
एफटीए निश्चित रूप से वस्तु निर्यात में नई संभावना पैदा करता है क्योंकि आप टैरिफ को जीरो कर देते हैं। लेकिन इस संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए बहुत काम करने की जरूरत होती है। जैसे, क्या दोनों देशों के बीच में म्यूचुअल रिकॉग्निशन एग्रीमेंट हैं, क्या हम एक दूसरे की टेस्टिंग फैसिलिटी को मानते हैं, टेक्नोलॉजी संबंधित मानकों में सामंजस्य है? यदि ऐसा नहीं है तो हम उस संभावना को भुना नहीं पाएंगे। आसियान के साथ एफटीए का फायदा भारत को नहीं हुआ। आयात ज्यादा बढ़ा, हमारा एक्सपोर्ट ज्यादा नहीं बढ़ पाया। मेरे ख्याल से रॉ मैटेरियल का अंतरराष्ट्रीय मूल्यों पर उपलब्ध होना, उस तरह की टेक्नोलॉजी और स्केल होना और स्टैंडर्ड का हार्मोनाइजेशन, ये जरूरी हैं।
-उद्यम पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ा बताता है कि करीब 7.5 करोड़ एमएसएमई रजिस्टर्ड हैं। लेकिन उनमें से 99% से ज्यादा माइक्रो कैटेगरी में, 0.65% स्मॉल और 0.05% मीडियम कैटेगरी में हैं। नीति आयोग का कहना है कि 90% से ज्यादा एमएसएमई इनफॉर्मल सेक्टर में हैं। ये इकाइयां फॉर्मलाइज क्यों नहीं हो रही हैं? उसमें क्या अड़चनें आ रही हैं?
भारत के परिप्रेक्ष्यक्ष में यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। यदि हम एशिया, मिडिल ईस्ट या लैटिन अमेरिका के प्रतिस्पर्धी देशों के साथ तुलना करें, तो बड़ी इकोनॉमी में इतना बड़ा इनफॉर्मल सेक्टर कहीं नहीं है। इसकी तीन-चार बुनियादी वजहें हैं।
पहली बात, भारत एक पुरातन देश है और यहां कुछ शहर तो 2000 साल से भी पुराने हैं। उत्तर प्रदेश में कम से कम 20-25 शहर 1000 साल पुराने हैं। 1950 में फोर्ड फाउंडेशन ने अर्बन डेवलपमेंट का एक प्लान दिया, जिसे पुराने शहरों पर चस्पा कर दिया गया। यह तय हो गया कि शहर में यहां इकोनॉमिक एक्टिविटी होगी और यहां नहीं होगी।
अमेरिका के लिए तो यह सही था जिसने अपने शहरों को जीरो से शुरू किया। वहां सभी शहर नए बने। लेकिन जहां इतनी पुरानी सभ्यता हो, पुराने शहर हों, वहां ऊपर से इस तरह की प्लानिंग थोपने का नतीजा यह हुआ कि घरों से काम करने वाले, पुराने बाजारों में काम करने वाले अधिकतर लोग एक तरह से अनऑथराइज्ड हो गए या नॉन कन्फर्मिंग एरिया में आ गए। वे इनफॉर्मल सेक्टर बन गए क्योंकि उस बिजनेस को आप रजिस्टर नहीं करा सकते। अपने नाम में प्रॉपर्टी ट्रांसफर नहीं करा सकते क्योंकि वह जगह कमर्शियल नहीं है। यदि कमर्शियली डिक्लेअर्ड नहीं है तो बैंक लोन नहीं देता है। बैंक लोन नहीं देगा तो वे अपग्रेड और स्केल नहीं कर सकेंगे।
दूसरी वजह, बहुत सारे कानून ऐसे हैं कि जिनका कॉस्ट ऑफ कंप्लायंस ज्यादा है। तीसरी बड़ी दिक्कत लेबर की है। पिछले दिनों एमएसएमई राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने बताया कि 7.5 करोड़ तो पोर्टल पर दिख रहा है। वास्तव में यह संख्या 8 करोड़ है।
अब देखिए, 8 करोड़ एमएसएमई में से महज 30 लाख के पास बिजली का इंडस्ट्रियल कनेक्शन है। यानी फैक्ट्री जैसी स्थिति तो 30 लाख के आसपास हुई। उस 30 लाख में भी 10 से ज्यादा कर्मचारी वाले ढाई लाख हैं। दस से कम कर्मचारी रखने की एक बड़ी वजह है सोशल सिक्योरिटी कॉस्ट। प्रोविडेंट फंड, ईएसआई, ग्रेच्युटी यह सब वेज बिल का 50 से 60% हो जाता है, जो विकासशील देश के हिसाब से बहुत ज्यादा है। इस कॉस्ट को बचाने के लिए एंप्लॉयर या तो ज्यादा आदमी नहीं रखते, अगर हायर करते हैं तो अलग-अलग कंपनी में। इससे स्केल नहीं बन पाता और स्केल न बन पाने से आप कंपिटिटिव नहीं हो पाते।
-इसका समाधान क्या है?
सबसे पहले तो यह कि इस वस्तुस्थिति को स्वीकारें कि भारत एक अलग, पुराना देश है। हम ऐसा नहीं कर सकते कि सभी पुराने शहरों को बुलडोज करके नया शहर बनाएं। इसलिए हमें एक एमनेस्टी स्कीम लानी पड़ेगी और कुछ इलाकों में घर से काम करने की अनुमति देनी पड़ेगी। अभी एक तरफ तो हम कह रहे हैं कि महिलाएं घर से काम करें और दूसरी तरफ यदि घर से काम करते हुए पकड़ लें तो उसका बिजली का बिल डबल हो जाएगा, कॉमर्शियल किराया होगा, पानी का बिल दिल्ली में तो 11 गुना है। पॉलिसी में इस विरोधाभास को हमें स्वीकारना होगा, उनके लिए एमनेस्टी स्कीम लाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना होगा।
दूसरा, एमएसएमई के लिए हमें लेबर कानूनों को हल्का बनाना पड़ेगा। कोई किसी को एंप्लॉय कर रहा है और तनख्वाह दे रहा है, उतना ही काफी है। बाकी सोशल सिक्योरिटी की जिम्मेदारी सरकार ले ले। एंप्लॉयर पर बोझ कम हो ताकि वह रजिस्टर पर उन लोगों को दिखा सके।
-छोटी यूनिट्स के लिए पेमेंट की समस्या है। समाधान पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका लगभग 29,000 करोड़ का बकाया है। इसके लिए सरकार की तरफ से कई पॉलिसी आई हैं। उनका कितना असर हुआ है?
देखिए, इसे दो हिस्सों में तोड़ना पड़ेगा। एक तो जो एमएसएमई सरकार या सरकारी कंपनियों को सप्लाई करती हैं, उनको होने वाली देरी अलग किस्म की है और वहां दिक्कतें ज्यादा हैं। दूसरा है कॉर्पोरेट को सप्लाई करने वाली एमएसएमई। नए कानूनों से प्राइवेट सेक्टर के ऊपर इंपैक्ट काफी ज्यादा हुआ है। इन कदमों की वजह से बकाया 39,000 करोड़ से घटकर 29,000 करोड़ रुपये पर आया है।
लेकिन सरकारी एजेंसियों पर खास असर नहीं हुआ है। एक्ट में एक प्रोविजन है कि यदि 45 दिन से ज्यादा देरी हुई तो एमएसएमई उसकी शिकायत कर सकती है, उसे पेनल इंटरेस्ट रेट के साथ पैसा वापस मिलता है। दिक्कत यह है कि सरकारों में इस बात की कोई वैल्यू नहीं है। आप मुकदमा करते हैं तो किसी व्यक्ति के ऊपर तो मुकदमा हुआ नहीं। सरकार के वकील मुकदमा लड़ते रहते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आर्बिट्रेशन प्रोसेस को थोड़ा मजबूत करने की जरूरत है।
-आरबीआई का डेटा है कि एमएसएमई के लिए क्रेडिट गैप 25 से 30 लाख करोड़ रुपये का है। जाहिर है कि यह गैप अनौपचारिक क्षेत्र से पूरा हो रहा है। इसके लिए भी सरकार कई स्कीम लेकर आई। पिछले साल नवंबर में भी एक स्कीम घोषित की गई। इन स्कीमों का कितना फायदा मिला है और आगे क्या कदम उठाने की जरूरत है?
कुछ दिक्कतें तो बुनियादी हैं। पहला, बैंक रिस्क नहीं लेना चाहते और उसके कई कारण हैं। देश में 60-65% बैंकिंग सरकार के हाथ में है। बड़े प्राइवेट सेक्टर बैंक गिने-चुने हैं। दूसरा, यहां सरकार ओवरस्पेंड करती रही है। वह बांड के जरिए बैंकों से पैसे लेती है। बैंकों के फंड का बड़ा हिस्सा सरकार ले लेती है, जिसका इस्तेमाल बैंक कर्ज देने में कर सकते थे। यदि सरकार 6 से 7% ब्याज दे रही है तो बैंक को रिस्क लेने की क्या जरूरत है?
एक और समस्या है ब्याज में जुर्माने की। यदि किसी बैंक से आपने लोन लिया है और उससे संतुष्ट नहीं हैं, उसके चार्जेस ज्यादा हैं, सर्विस अच्छी नहीं है और आप बैंक बदलना चाहें तो ब्याज पर 2% से 4% का जुर्माना देना पड़ता है। वह एक तरह से प्रतिस्पर्धा को रोकता है।
इसके अलावा सिर्फ 3% एमएसएमई कंपनी हैं, बाकी 97% प्रोपराइटरशिप पार्टनरशिप फर्म ही हैं। उनके लिए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कानूनों का न होना बैंकों को हतोत्साहित करता है। चर्चा है कि इनसॉल्वेंसी कानून में संशोधन कर प्रोपराइटरशिप-पार्टनरशिप फर्म या इंडिविजुअल लोगों को भी उसमें शामिल किया जाएगा। मेरे ख्याल से उसके बाद परिस्थितियां बदलेंगी।
-फाइनेंस की समस्या के कारण एमएसएमई अपनी मशीनरी को अपग्रेड नहीं कर पाती हैं, उसका उनको कॉस्ट में नुकसान होता है।
देखिए, टेक्नोलॉजिकल अपग्रेडेशन के लिए सबसे जरूरी फाइनेंस और कॉस्ट ऑफ फाइनेंस है। यदि 20-22% ब्याज पर आपको पूंजी मिलेगी तो आप बड़ा निवेश नहीं कर पाएंगे। उसका ब्रेक इवन टाइम भी लंबा होगा, जबकि बिजनेस साइकिल छोटे हो गए हैं। यदि आपको कम इंटरेस्ट पर पर्याप्त फाइनेंस मिल जाता है तो टेक्नोलॉजिकल अपग्रेडेशन होगा। एमएसएमई स्केलिंग कर सकेंगे और उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी।
-यूरोपियन यूनियन ने 1 जनवरी से कार्बन टैक्स लगाया है, सीबीएएम। इसका कितना इंपैक्ट देखते हैं?
सीबीएएम भी यह बताता है कि मल्टीलैटरल इंस्टीट्यूशंस पर हमारा विश्वास कम हुआ है। पर्यावरण के नियम तो डब्ल्यूटीओ के तहत आते हैं क्योंकि ट्रेड को प्रभावित करते हैं। पर ईयू ने डब्ल्यूटीओ का इस्तेमाल न करके अपना एक कानून बनाया। इसका ज्यादा प्रभाव कार्बन या एनर्जी इंटेंसिव सेक्टर आयरन स्टील और एलुमिनियम पर होगा। इनमें एमएसएमई की कम भागीदारी है। सिर्फ री-रोलिंग मिल एमएसएमई के दायरे में हैं। इसलिए अभी एमएसएमई पर थोड़ा प्रभाव ही पड़ेगा। लेकिन यह शुरुआत है। ईयू जब इसका दायरा बढ़ाएगा तो स्टील और एल्युमिनियम से बनने वाले प्रोडक्ट, पैकेजिंग आदि भी इसकी जद में आएंगे। इसलिए ईयू के दूसरे-तीसरे चरण में बड़ी दिक्कत एमएसएमई के सामने होगी।
इसका दूसरा पक्ष भी है। भारत के नजरिए से देखें तो ईयू जो करने की कोशिश कर रहा है, वह अपने देश के लिए भी जरूरी है। हमें कम कार्बन इंटेंसिटी वाले सौर या पवन ऊर्जा का इस्तेमाल करना होगा। भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। चीन ने अपने ऊर्जा स्रोतों को धीरे-धीरे अपग्रेड किया। यूरोप को निर्यात करने वाली चाइनीज कंपनियों को ऐसे ग्रिड से जोड़ा गया जो रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि उनके प्रोडक्ट में कार्बन इंटेंसिटी कम हो।
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