Economic Survey 2026: एमएसएमई भारत के विकास की रीढ़, लेकिन कर्ज और भुगतान में देरी बड़ी चुनौती
मैन्युफैक्चरिंग में 35.4 प्रतिशत, निर्यात में 48.58 प्रतिशत और जीडीपी में 31.1 प्रतिशत योगदान करने के बावजूद MSME के सामने कर्ज की बड़ी समस्या है। उन् ...और पढ़ें

मैन्युफैक्चरिंग में 35.4 प्रतिशत योगदान करते हैं एमएसएमई
सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (MSME) भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात तथा रोजगार में अहम योगदान दे रहे हैं। इसके बावजूद औपचारिक ऋण की सीमित उपलब्धता, भुगतान में देरी और कोलैटरल संबंधी बाधाएं अब भी इस क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। यह बात संसद में गुरुवार को पेश किए गए Economic Survey 2025-26 में कही गई है।
मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और रोजगार की रीढ़
सर्वेक्षण के अनुसार, एमएसएमई भारत के कुल मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन का लगभग 35.4 प्रतिशत, निर्यात का 48.58 प्रतिशत और जीडीपी का 31.1 प्रतिशत योगदान करते हैं। 7.47 करोड़ से अधिक उद्यमों में 32.82 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देकर एमएसएमई कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता बना हुआ है।
वैश्विक स्तर पर, एमएसएमई कुल बिजनेस का लगभग 90 प्रतिशत और 50 प्रतिशत से अधिक रोजगार का सृजन करते हैं। भारत का मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र दूसरे देशों के साथ जुड़ रहा है, ऐसे में सर्वेक्षण ने सप्लाई चेन में भागीदारी, स्थानीय स्तर पर वैल्यू एडिशन और समावेशी क्षेत्रीय विकास में एमएसएमई की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है।
सूक्ष्म उद्यमों के लिए ऋण की पहुंच अब भी बड़ी बाधा
डिजिटल एकीकरण और कर्ज में प्रगति के बावजूद, औपचारिक ऋण तक पहुंच अब भी सूक्ष्म उद्यमों के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। इसका कारण कोलैटरल और दस्तावेजों का अभाव है। सर्वेक्षण ने विश्व बैंक की वित्तीय क्षेत्र आकलन रिपोर्ट (2025) का हवाला देते हुए बताया कि 27 प्रतिशत एमएसएमई वित्त को अपनी सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।
महिला स्वामित्व वाले एमएसएमई को अब भी कॉमर्शियल ऋण का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही मिल रहा है। हालांकि, उद्यम पंजीकरण और लक्षित ऋण दिशानिर्देशों के जरिए इस अंतर को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है। कुल मिलाकर, सरकारी हस्तक्षेपों के चलते हाल के वर्षों में एमएसएमई ऋण में सकारात्मक रुझान बना है।
पहली छमाही में औद्योगिक ऋण वृद्धि का मुख्य आधार बने MSME
सर्वेक्षण में कहा गया कि वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में औद्योगिक ऋण वृद्धि सबसे अधिक एमएसएमई क्षेत्र में रही। हाल के वर्षों में एमएसएमई ऋण की साल-दर-साल वृद्धि दर, बड़े उद्योगों को दिए जाने वाले ऋण की तुलना में काफी अधिक रही है। मार्च 2025 में एमएसएमई क्रेडिट 11.7 प्रतिशत बढ़ा, जबकि बड़ी इंडस्ट्री के कर्ज में सिर्फ 6.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
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इस तेजी को अप्रैल 2025 में लागू संशोधित एमएसएमई वर्गीकरण, प्राथमिकता क्षेत्र वाले ऋण के दायरे में विस्तार, ज्वैलरी वाले छोटे बिजनेस को ऋण और लक्षित बजटीय योजनाओं से बल मिला है। एनबीएफसी ने अंतिम छोर तक ऋण पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई और उनका एमएसएमई ऋण दहाई अंकों में बढ़ा।
एसएमई आईपीओ बाजार में तेज उछाल
पिछले दो वर्षों में एसएमई आईपीओ में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के दौरान एसएमई आईपीओ की संख्या में 87.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि उनकी तरफ से इश्यू राशि में 52.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस उछाल को यूपीआई आधारित एएसबीए (ASBA) प्रणाली के जरिए बढ़ी खुदरा निवेशकों की भागीदारी और लिस्टिंग के बाद अच्छे लाभ ने गति दी।
ऋण गारंटी और इक्विटी सपोर्ट
सर्वेक्षण में MSME की मदद के लिए उठाए कदमों और उनसे मिले लाभों के बारे में भी बताया गया है। क्रेडिट लिंकेज को मजबूत करने के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (सीजीएस) को 1 अप्रैल 2023 से पुनर्गठित किया गया। इसके तहत सीजीटीएमएसई (CGTMSE) में 9,000 करोड़ का कोष बनाया गया। गारंटी सीमा 2 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई और वार्षिक गारंटी शुल्क घटाकर 0.37 प्रतिशत तक किया गया। महिला स्वामित्व वाले एमएसई के लिए गारंटी कवरेज 85 प्रतिशत से बढ़ाकर 90 प्रतिशत कर दी गई। इसके बाद 1 अप्रैल 2025 से गारंटी सीमा को 10 करोड़ रुपये तक दोगुना किया गया।
सेल्फ रिलायंट इंडिया (एसआरआई) फंड के तहत 50,000 करोड़ रुपये की इक्विटी सहायता का लक्ष्य है। इससे 30 नवंबर 2025 तक 682 एमएसएमई में 15,442 करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत भी सूक्ष्म उद्यमियों को मार्जिन मनी सब्सिडी के जरिए सहायता दी जा रही है।
प्रतिस्पर्धा और इनोवेशन को बढ़ावा
एमएसएमई चैंपियंस योजना के तहत जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट (ZED) सर्टिफिकेशन और लीन योजना के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। एमएसएमई-इनोवेटिव कंपोनेंट के जरिए इनक्यूबेशन, डिजाइन सहायता और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा को संस्थागत रूप दिया गया है।
भुगतान में देरी की समस्या डिजिटल माध्यम से दूर करने की कोशिश
भुगतान में देरी माइक्रो सप्लायर्स के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। इसे दूर करने के लिए टीआरईडीएस (TReDS) प्लेटफॉर्म का विस्तार किया गया है और कॉरपोरेट व सरकारी उपक्रमों के लिए अनिवार्य ऑनबोर्डिंग की सीमा 500 करोड़ से घटाकर 250 करोड़ रुपये (टर्नओवर) कर दी गई है। इसके अलावा, ओएनडीसी और टीम (ट्रेड एनेबलमेंट एंड मार्केटिंग) पहल, जिसके तहत 5 लाख एमएसएमई को जोड़ने का लक्ष्य है, कम लागत पर ई-कॉमर्स और आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण का रास्ता खोलती हैं।
ऑनलाइन विवाद समाधान से वर्किंग कैपिटल पूंजी को राहत
सर्वेक्षण के अनुसार, 8.1 लाख करोड़ रुपये की राशि भुगतान में देरी के कारण फंसी हुई है, जिससे एमएसएमई की कार्यशील पूंजी पर गंभीर असर पड़ता है। कारोबारी रिश्ते खराब होने के डर से कई एमएसएमई कानूनी कार्रवाई से बचते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन विवाद समाधान (ओडीआर) योजना और एमएसएमई ओडीआर पोर्टल शुरू किया गया है, जो एमएसएमईडी अधिनियम, 2006 के तहत औपचारिक प्रक्रिया से पहले आपसी सहमति से समाधान को प्रोत्साहित करता है। यह पोर्टल पूरी तरह डिजिटल, कम लागत वाला, बहु-स्तरीय और बहुभाषी है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि एमएसएमई क्षेत्र मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग गति का लाभ उठाने के लिए अच्छी स्थिति में है। इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए कैश-फ्लो आधारित ऋण व्यवस्था का विस्तार और डिजिटल ऋण साझेदारियों को तेज करने की जरूरत है, ताकि सूक्ष्म और नए उद्यमियों को समय पर और किफायती कर्ज मिल सके।
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