कहने को फुटपाथ लेकिन..., NCR में अतिक्रमण, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार में फंसा पैदल चलने का मानवीय अधिकार
दिल्ली-एनसीआर में फुटपाथों की बदहाली और अतिक्रमण के कारण पैदल चलना मुश्किल हो गया है, जिससे राहगीरों की सुरक्षा खतरे में है। ...और पढ़ें

फुटपाथ पर अतिक्रमण से परेशान होते हैं लोग। जागरण

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
कहने के लिए फुटपाथ पर पैदल चलना मानवीय अधिकार है। लेकिन आप देश की राजधानी में यदि कहीं पैदल चलना चाहते हैं तो ये किसी जटिल टास्क से कम नहीं है।
कहीं तो फुटपाथ ही नहीं हैं या जहां बनें हैं वहां चलने लायक नहीं है। इतना ही नहीं जिन एजेंसी, विभागों पर इनके रखरखाव का जिम्मा है उन्हें इसकी परवाह नहीं है।
हाल ही में शीर्ष अदालत ने फुटपाथ पर चलने के मौलिक अधिकार को बेहतर बनाने के लिए एक नियामक निकाय बनाने पर भी जोर दिया है। और ये भी सर्वविदित है कि शीर्ष अदालत ने या दिल्ली हाई कोर्ट ने फुटपाथ की अव्यवस्था का पूर्व में भी कई बार संज्ञान लिया है। एजेंसियों को निर्देशित भी किया है।
लेकिन प्रश्न यही उठता है कि दिल्ली समेत एनसीआर में पैदल चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फुटपाथ पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? ये सुविधाजनक क्यों नहीं बनाए जाते और इनपर से अतिक्रमण स्थायी रूप से क्यों नहीं हटाया जाता? सबसे अहम प्रश्न इसके लिए जिम्मेदार शहरी विकास प्राधिकरण, नगर पालिकाओं के अधिकारियों पर कभी कार्रवाई क्यों नहीं होती? आखिर इसका क्या हो निदान इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है :
क्या दिल्ली समेत एनसीआर में सड़कों पर बने फुटपाथों के सुविधाजनक न होने या इनपर अतिक्रमण को लेकर संबंधित विभाग गंभीर नहीं हैं?
- हां : 92
- नहीं : 8
क्या दिल्ली समेत एनसीआर में फुटपाथों को चलने के योग्य बनाकर सड़क हादसों में राहगीरों की मौतों की संख्या कम की जा सकती है?
- हां : 89
- नहीं : 11
आंकड़ों में कैसी है दिल्ली-एनसीआर में फुटपाथ की स्थिति
सड़क नेटवर्क एक नजर में
- 32,000 किलोमीटर है दिल्ली में सड़कों का नेटवर्क।
- 44% सड़कों पर कोई फुटपाथ ही नहीं।
- 26% फुटपाथ ही भारतीय सड़क कांग्रेस (आइआरसी) के मानकों पर खरे उतरते हैं।
- 200 किलोमीटर तक के फुटपाथों की मरम्मत के लिए काम चल रहा है।

फुटपाथ से हटाया गया अतिक्रमण (वर्ग किमी. में)
एजेंसी : 2024 : 2025 : 2026 (जनवरी-मई)
एमसीडी : 5030.95 : 2000.20 : 828.80
एनडीएमसी : 1620.83: 1504.2 : 9 .226
डीडीए : 248.28 : 73.86 :9.96
पीडब्ल्यूडी : 16.01 : 37.35 : 21.30

वाहन चालकों के खिलाफ किए गए चालान
एजेंसी : 2024-2025-2026 (जनवरी-मई)
एमसीडी : 2,277: 1,053 : 570
एनडीएमसी : 6497 : 2,615 : 683
दिल्ली पुलिस : 17,344 : 29,758 : 19,855

सड़क से पैदल जाते समय दुर्घटना के शिकार हुए लोग
| वर्ष | घायल राहगीर | मौत |
|---|---|---|
| 2022 | 1777 | 629 |
| 2023 | 1941 | 622 |
| 2024 | 1700 | 624 |
| 2025 | 1738 | 649 |
सुरक्षित और उपयोगी फुटपाथ के लिए तय हो जवाबदेही
आरके कंसल, सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता, पीडब्ल्यूडी ने जागरण संवाददाता संदीप रतन इस मुद्दे पर लंबी बातचीत की। उनकी बातचीत के अंश निम्न हैं...
एनसीआर के शहरों में विकास का पैमाना अक्सर चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे से मापा जाता है, लेकिन किसी भी शहर की वास्तविक गुणवत्ता इस बात से तय होती है कि वहां पैदल चलने वाले लोग कितने सुरक्षित और सहज महसूस करते हैं।
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दुर्भाग्य से एनसीआर के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो अधूरे हैं, या फिर अतिक्रमण और अव्यवस्था के कारण उपयोग के योग्य नहीं रह गए हैं। ऐसे में लाखों लोगों को मजबूरन सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
फुटपाथों पर दोबारा अतिक्रमण न हो, इसके लिए नगर निगम, विकास प्राधिकरण और पुलिस की संयुक्त जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। केवल अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना पर्याप्त नहीं है। नियमित निगरानी, सीसीटीवी आधारित मानीटरिंग और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है।

जहां मिले लापरवाही वहां हो कार्रवाई
जहां लापरवाही मिले, वहां संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। शहरों में जहां फुटपाथ बने भी हैं, वहां उनकी उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। कई स्थानों पर इन्हें पार्किंग स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
पुराने वाहन बेचने वालों ने फुटपाथों को प्रदर्शन स्थल बना रखा है। दुकानदार अपना सामान फुटपाथ तक फैला देते हैं। रेहड़ी-पटरी संचालकों का स्थायी कब्जा भी आम है। नियमित कार्रवाई की जरूरत है। लेकिन ऐसा होता नहीं है।
अब बात समाधान की, तो इसके लिए सभी प्रमुख सड़कों पर निरंतर और बाधारहित फुटपाथ विकसित किए जाएं। फुटपाथों पर अवरोधों को हटाकर अलग यूटिलिटी कारिडोर बनाया जाए।
वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रैंप और सुरक्षित पैदल पार मार्ग बनाए जाएं। देश में सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों की मौत का प्रतिशत चिंताजनक है।
सुरक्षित फुटपाथ, उचित स्ट्रीट लाइट, जेब्रा क्रासिंग और ट्रैफिक धीमा करने के उपाय दुर्घटनाओं को काफी हद तक कम कर सकते हैं। जब तक पैदल यात्रियों को शहर की यातायात व्यवस्था का केंद्र नहीं बनाया जाएगा, तब तक स्मार्ट सिटी और शहरी विकास के दावे अधूरे रहेंगे।
प्रशासनिक इच्छाशक्ति और भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसा है पैदल चलने का अधिकार
अनिल पंडित, पूर्व विशेष महानिदेशक, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने जागरण संवाददाता वीके शुक्ला से इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की और अपनी राय रखी। नीचे पढ़ें क्या बोले अनिल पंडित...
दिल्ली सहित एनसीआर में फुटपाथों की इस बदहाली और पैदल यात्रियों की अनदेखी के लिए कोई एक संस्था नहीं, बल्कि एक पूरा प्रशासनिक और संस्थागत ढांचा जिम्मेदार है। जवाबदेही के बिखराव के कारण एजेंसियां एक-दूसरे पर दोष मढ़ती हैं।
फुटपाथों का निर्माण केवल कंक्रीट की पटरी बिछाना नहीं है, बल्कि यह एक 'सिस्टम' है। सुविधाजनक फुटपाथों के न होने के पीछे तकनीकी और नियोजन स्तर की कई खामियां हैं।
सड़कों और फुटपाथों को बनाने तथा उनकी मरम्मत की सीधी जिम्मेदारी इन्हें बनाने वाले विभागों की होती है, वे सड़कों पर तो ध्यान देते हैं, मगर फुटपाथों पर उतना ध्यान नहीं देते हैं। गलत ढलान और उबड़-खाबड़ सतह इन्हें लेकर एक बड़ी समस्या है।
फुटपाथों पर पानी की निकासी की उचित व्यवस्था न होना और गलत ग्रेडिंग के कारण वर्षा में जलभराव होता है। फुटपाथों के बीच में बिजली के खंभे, ट्रांसफार्मर, मेट्रो के पिलर और टेलीकाम बाक्स भी बने हुए हैं।
रैंप नहीं हैं, स्लैब टूटे हुए हैं और टाइल्स के न होने से बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए इन पर चलना असंभव हो जाता है। फुटपाथों पर स्थायी अतिक्रमण का न हटना एक बहुआयामी समस्या है, जो प्रशासनिक इच्छाशक्ति, सामाजिक मजबूरी और भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसी है।
अवैध कब्जे और मिलीभगत के कारण यह समस्या बढ़ रही है। उदाहरण के लिए लोक निर्माण की सड़क पर यह विभाग अतिक्रमण इसलिए नहीं हटा सकता है क्योंकि उसके पास सुविधाएं नहीं है।
अतिक्रमण हटाने के लिए उसे नगर निगम और पुलिस चाहिए। स्थानीय स्तर पर अवैध रेहड़ी-पटरी वालों, दुकानदारों द्वारा दुकानों के आगे सामान रखने और अवैध पार्किंग से नगर निगम और पुलिस के कर्मचारियों की सांठगांठ एक खुला मामला है।
स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट 2014 के बावजूद टाउन वेंडिंग कमेटियों ने अभी तक दिल्ली सहित एनसीआर में वेंडिंग और नान-वेंडिंग क्षेत्रों का ठीक से चिह्नीकरण नहीं किया है। इससे रेहड़ी वालों की आजीविका का सवाल भी अतिक्रमण को संरक्षण देता है।
नगर निगम द्वारा की जाने वाली अतिक्रमण हटाओ मुहिम केवल खानापूरी ही है। इस बदहाली के लिए किसी एक व्यक्ति या विभाग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि यह ‘एजेंसी समन्वय’ की कमी है।
विभागों का टकराव भी सामने आता है। इस अंतर-विभागीय टकराव में कोई भी विभाग जिम्मेदारी लेने से बचता है। और ये भी सर्वविदित है कि फुटपाथों के अतिक्रमण को भी राजनीतिक संरक्षण है।
एक अभियंता के रूप में मेरा सुझाव है कि अब समय आ गया है कि दिल्ली सहित एनसीआर में रोड-इंजीनियरिंग को बदलना होगा। सड़कों के मल्टी-माडल ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन में पैदल यात्रियों को शीर्ष प्राथमिकता देनी होगी।
सभी सर्विस लेन, बाजारों और आवासीय क्षेत्रों में फुटपाथों को अतिक्रमण-मुक्त, समतल और निर्बाध बनाकर ही हम अपने शहरों को सुरक्षित और आधुनिक बना सकते हैं। इसके लिए इंफोर्समेंट व्यवस्था भी मजबूत और जवाबदेह बनानी होगी।
एनसीआर के बड़े शहरों के क्या हैं हालात
गौतमबुद्ध नगर
- सड़कों की लंबाई: 1500 किलोमीटर
- फुटपाथ: 200 किलोमीटर
- एक साल में पैदल यात्रियों की मौत: 64
- फुटपाथ से अतिक्रमण हटाया गया: ---
गुरुग्राम
- सड़कों की लंबाई: 1550 किलोमीटर
- फुटपाथ: 350 किलोमीटर
- एक साल में पैदल यात्रियों की मौत: 109
- फुटपाथ से अतिक्रमण हटाया गया: 254
गाजियाबाद
- सड़कों की लंबाई: ----- किलोमीटर
- फुटपाथ: ---- किलोमीटर
- एक साल में पैदल यात्रियों की मौत: 350
- तीन साल में फुटपाथ से अतिक्रमण हटाया गया: 131
फरीदाबाद
- सड़कों की लंबाई: 733 किलोमीटर
- फुटपाथ: 400 किलोमीटर
- एक साल में पैदल यात्रियों की मौत: 43
- तीन साल में फुटपाथ से अतिक्रमण हटाया गया: 343
