दिल्ली के आसपास इन चार 'ग्लोबल सिटी' के माथे असुरक्षा का धब्बा
एनसीआरबी रिपोर्ट दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को उजागर करती है, जहाँ केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि त्वरित न्याय व्यवस्था की भी आवश्य ...और पढ़ें

तस्वीर एआई जनरेटेड।
HighLights
त्वरित न्याय व्यवस्था महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सहायक।
दिल्ली पुलिस सक्रिय, पर सामाजिक बदलाव भी अत्यंत आवश्यक।
शिक्षा, जागरूकता, आत्मरक्षा महिलाओं को सशक्त बनाती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट ने एक बार फिर देश की धड़कन कहे जाने वाले दिल्ली सहित एनसीआर को आईना दिखाया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट महज संख्या नहीं है, बल्कि हमारे समाज के खोखले होते नैतिक मूल्यों का सुबूत है।
कोई भी शहर केवल फ्लाईओवरों, ऊंची इमारतों और कार्पोरेट दफ्तरों से 'ग्लोबल' नहीं बनता। उसकी असल प्रगति इस बात से आंकी जाती है कि वहां के नागरिक कितने सुरक्षित हैं। महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित महसूस करती हैं।
सरकार, पुलिस और सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाने तथा सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत करने के बावजूद महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाएं नहीं रुक रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह अदालतों में मामलों का लंबे समय तक लंबित रहना और न्याय मिलने में होने वाली देरी भी मानी जाती है।
ऐसे में यही सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली समेत एनसीआर में महिला सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रही? कौन है इसके लिए जिम्मेदार? साथ ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिला सुरक्षा को पुख्ता बनाने और महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध में कमी लाने के लिए क्या किए जाने चाहिए ठोस उपाय। इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है :


महिलाओं के खिलाफ अपराध

सख्त कानून के साथ त्वरित न्याय भी जरूरी
विमला मेहरा, दिल्ली पुलिस से सेवानिवृत्त पूर्व विशेष आयुक्त व तिहाड़ जेल की महानिदेशक ने जागरण से बातचीत में बताया, महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए केवल सख्त कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि त्वरित न्याय व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है।
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कई मामलों में पीड़ित महिलाओं और उनके परिवारों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लंबी कानूनी प्रक्रिया से पीड़िता मानसिक रूप से टूट जाती हैं और कई बार गवाह भी प्रभावित हो जाते हैं।
ऐसे में अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। यदि महिलाओं से जुड़े मामलों में अदालतें तय समय सीमा के भीतर फैसला सुनाएं और दोषियों को शीघ्र सजा मिले, तो इससे समाज में स्पष्ट संदेश जाएगा कि अपराध करने वालों को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाएगा।
दिल्ली पुलिस महिलाओं की सुरक्षा को लेकर लगातार सक्रिय भूमिका निभा रही है। राजधानी के अधिकांश थानों में महिला हेल्प डेस्क स्थापित की गई हैं और बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। पुलिस द्वारा महिलाओं और युवतियों के लिए हेल्पलाइन नंबर, पेट्रोलिंग व्यवस्था, पिंक बूथ और विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
खासतौर पर आपातकालीन काल मिलने पर पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया कई मामलों में राहत पहुंचाने का काम करती है। साइबर अपराधों से निपटने के लिए भी विशेष इकाइयों को मजबूत किया गया है, क्योंकि अब महिलाओं के खिलाफ आनलाइन उत्पीड़न के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
हालांकि, केवल पुलिस व्यवस्था मजबूत होने से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। महिलाओं की सुरक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की आवश्यकता है। परिवार और समाज के सोच में बदलाव भी बेहद जरूरी है।
दिल्ली जैसे महानगर में अब बड़ी संख्या में माता-पिता अपनी बेटियों के समर्थन में खुलकर सामने आते हैं। वे शिकायत दर्ज कराने और न्याय की लड़ाई लड़ने में बच्चियों का साथ देते हैं। यही कारण है कि राजधानी में कई मामलों में पीड़िताएं खुलकर आवाज उठा पा रही हैं।
इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में आज भी सामाजिक बदनामी के डर से कई घटनाओं को दबा दिया जाता है। परिवार अक्सर समझौते का दबाव बनाते हैं और पीड़िताओं को चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे अपराधियों के हौसले और बढ़ जाते हैं।
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शिक्षा और जागरूकता भी अहम भूमिका निभाती है। स्कूलों और कालेजों में लड़कियों को उनके अधिकारों, कानूनी सहायता और आत्मरक्षा के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही लड़कों को भी महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार और संवेदनशीलता की शिक्षा देना आवश्यक है।
समाज में लैंगिक समानता की भावना मजबूत किए बिना महिलाओं के खिलाफ अपराधों को पूरी तरह नियंत्रित करना कठिन होगा। तकनीक का इस्तेमाल भी महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने में सहायक साबित हो सकता है।
मोबाइल एप, लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल निगरानी अपराध रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्याय व्यवस्था की ही है। जब तक अपराधियों को समय पर सजा नहीं मिलेगी, तब तक कानून का भय पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस, न्यायपालिका, सरकार और समाज मिलकर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के खिलाफ मजबूत माहौल तैयार करें।
पीड़िताओं को न्याय मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए और दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सभ्य और संवेदनशील समाज की पहचान भी है।
फरीदाबाद में महिला सुरक्षा की स्थिति


महिला सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस द्वारा किए गए कार्य
- शहर के विभिन्न थाना क्षेत्रों में महिला हेल्प डेस्क बनाई गई है
- स्कूल, कालेज, मेट्रो स्टेशन, बाजार और भीड़भाड़ वाले इलाकों में दुर्गा शक्ति टीम गश्त करती है
- सादी वर्दी में पुलिस की तैनाती, मनचलों पर नजर
- स्कूल, कालेज, कंपनियों में महिलाओं को जागरूक किया जाता है
- मिशन शक्ति केंद्र, एंटी रोमियो स्क्वाड, पिंक बूथ
हर जिले में अलग से बने टास्क फोर्स, पुलिस की उपलब्धता जरूरी
शील मधुर, सेवानिृवत्त डीजीपी ने जैसा बातचीत में विनय त्रिवेदी को बताया, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को कम करने के लिए जरूरी है कि हर स्तर पर काम हो। सबसे जरूरी है कि हर जिले में स्पेशल टास्क फोर्स बननी चाहिए।
महिलाएं अपनी शिकायतें बिना संकोच पुलिस के सामने समय से रख सकें। इसके बाद पुलिस का काम है कि उस शिकायत पर जल्द से जल्द सही तरीके से जांच कर महिलाओं को न्याय दिलाया जाए।
अपराधी के खिलाफ सख्त एक्शन हो। कई बार महिलाएं शिकायत के लिए आगे नहीं आ पातीं। अगर महिलाओं की शिकायत पर न्याय जल्दी और दुरुस्त होगा तो अन्य महिलाएं भी निडर होंगी उनका विश्वास भी बढ़ेगा।
इसके लिए अलग से टास्क फोर्स जरूरी है। इसके बनने से यह होगा कि अलग से महिलाओं के मामले की जांच होगी और उसमें न्याय जल्द से जल्द मिल सकता है।
यह भी जरूरी है कि अब तक जो भी मामले लंबित हैं, उनमें कोर्ट में ट्रायल जल्दी होना चाहिए। कई बार कोर्ट में सालों तक ट्रायल चलता रहता और महिलाओं को देरी से न्याय मिलता है। आजकल सामाजिक परिवेश की खामियां भी कहीं न कहीं इस तरह के अपराधों को बढ़ा रही हैं।
महिलाओं के प्रति लोगों में सोच बदलने की जरूरत है। आज भी महिलाएं अकेले होने पर खुदको असुरक्षित महसूस करती हैं। अगर टास्क फोर्स होगी और उसका अलग सेंटर होगा तो पेट्रोलिंग भी बढ़ाई जा सकती है।
शहर में अलग-अलग जगहों पर पुलिस की उपलब्धता जरूरी है। यह तो रही पुलिस की बात। दूसरी ओर घरों से ही अपने बच्चों को अपराध के प्रति लड़ना सिखाना होगा। महिलाओं के सम्मान के प्रति जागरूक करना होगा। देखा जा रहा है कि एनसीआर में अपराध बढ़ रहे हैं।
बच्चे मिसिंग हो रहे हैं, गुंडागर्दी हो रही है, लूटपाट हो रही है। किडनैपिंग हो रही है। दुष्कर्म की घटनाएं हो रही हैं। हत्या, छेड़छाड़ हर तरह का अपराध बढ़ा है।
आसपास का वातावरण लोगों को प्रभावित करता है। अगर किसी भी क्षेत्र में क्राइम बढ़ रहा है तो उसका भी असर महिलाओं के मानसिक स्तर पर पड़ता है। घर के बाहर तो अपराध हो ही रहे हैं, घर के अंदर भी अपराध कम नहीं है।
कई विकृत मानसिकता के लोगों का सोच घर के बच्चों के प्रति भी ठीक नहीं है। सामाजिक संस्थाओं को इसके लिए आगे आना चाहिए। परिवारों में बच्चों को शुरू से ही बैड टच, गुड टच के बारे में बताना चाहिए। बच्चों को मजबूत बनाना होगा। उन्हें सभी चीजों के लिए जागरूक करना होगा।
लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दिलवानी चाहिए। कहीं भी कुछ उनके साथ गलत हो रहा है तो वह उसके लिए लड़ें, यह बताना चाहिए। आत्मरक्षा के लिए मजबूत बनाना होगा।
पुलिस अपना काम करे। घर के लोग अपना काम करें। न्यायपालिका अपना काम करे। इससे ही महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में कमी लाई जा सकती है। एनसीआर में सेल्फ डिफेंस के काफी ट्रेनिंग सेंटर हैं। बच्चों को वहां भेजने की जरूरत है। बच्चों को डराने की बजाए उनसे निपटने की ताकत दिलानी होगी।
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