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    ननेरा से नरेला बनने की कहानी: युद्ध, व्यापार और विकास के उतार-चढ़ाव का साक्षी; राजाओं से लेकर अंग्रेजों तक का देखा राज

    Updated: Sat, 25 Apr 2026 02:58 PM (IST)

    दिल्ली के नरेला का इतिहास युद्धों, व्यापार और विकास के उतार-चढ़ावों से भरा है, जो कभी दिल्ली के चार प्रमुख कस्बों में से एक था। इसका नाम ननेरा से नरेल ...और पढ़ें

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    ननेरा से नरेला बनने की रोचक है कहानी मगर आज यह 'कल चमन थे, आज इक सहरा हुए' की नज्म को दोहराती नजर आती है। ग्राफिक्स

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    प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। आज दिल्ली की शान भले ही कनाॅट प्लेस के शानदार आर्किटेक्चर से हो, साउथ दिल्ली की आधुनिकता की चमक से हो, मेट्रो के विस्तार से या फिर एनसीआर के विकास से हो लेकिन एक दौर था जब दिल्ली के कस्बे इसकी पहचान हुआ करते थे।

    दिल्ली के चारों कोनों पर चार प्रमुख कस्बे नरेला, नजफगढ़, नांगलोई और महरौली का जिक्र हर काल खंड के इतिहास के पन्नों मिल जाता है। यह बात अलग है कि ये इन इलाकों की प्रतिष्ठा आज अनदेखी के अभाव में अपने अस्तित्व को बचाने की हर कोशिश करती है।

    'कल चमन थे, आज इक सहरा हुए' की नज्म को दोहराती नजर आती है। आज जब सरकार ने इनमें से कुछ इलाकों, कुछ ऐतिहासिक सुगंध समेटे गांवों की सुध लेने की सोची है तो एक बार फिर से यह नाम चर्चा में आए हैं।

    नरेला की धरती पर हुए कई युद्ध

    जब दिल्ली के इतिहास के श्याम-श्वेत पन्नों में डूबकर देखेंगे तो पाएंगे कि एक स्थान जो कई राज्यों का प्रवेश द्वार था, जिस पर बड़े राजाओं, जमींदारों से लेकर अंग्रेज अधिकारियों तक ने उस शीतलता को महसूस किया जो प्रकृति के सघन धानी आंचल के अलावा कहीं महसूस नहीं होता।

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    शायद यही वजह है कि चार कस्बों में नरेला सबसे अधिक प्रतिष्ठित हुआ, ट्रांसपोर्ट से लेकर काॅमर्स तक के लिए प्रसिद्ध हुआ और जहां एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी बनी। यहां की धरती पर कई युद्ध हुए, दिल्ली के शुरुआत शिक्षण संस्थानों की नींव यहां पड़ी। कुछ तो खास होगा ऐसी जगह में, तो इस स्थान के इतिहास को समझने के लिए पहले उसके नाम की कहानी जानते हैं।

    अंग्रेजों के उच्चारण ने बना दिया ननेरा से नरेला

    दिल्ली सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी रहे एवं 42 किताबों के लेखक आचार्य हरि भारद्वाज के मुताबिक नरेला इतिहास के हर वक्त का साक्षी रहा है। हर दौर में यह एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सबसे पहली बात तो ये कि नरेला अपने आप में तमाम जगहों और मानों की तरह अंग्रेजों की नासमझी का शिकार हुआ और ननेरा से नरेलाह बना और फिर नरेला हो गया। आचार्य हरिराम भारद्वाज ने अपनी पुस्तक 'ननेरा से नरेला' में लिखा है कि पहले यहां एक बस्ती भज्जूखेड़ा हुआ करती थी क्योंकि यहां भारद्वाज परिवार आकर बसे थे।

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    पहले नाम था ननेरा

    एक बार लाहौर से एक जमींदार अखंड प्रताप सिंह का बेटा नरबीर सिंह (नोना) यहां आया। वह फौजियों के साथ युद्धाभ्यास करता था। एक बार वह वहां के तालाब में स्नान करने गया वहां उसकी मुलाकात एक कन्या नानकी से हुई। बस्ती के प्रधान नानू ने देखा कि नोना वीर पराक्रमी हैं तो उन्होंने नानकी और नोना का विवाह करवा दिया। नानू, नोना और नानकी तीनों नामों को मिलाकर इस इलाके का नाम 980 ईस्वी में ननेरा कर दिया गया।

    गलत उच्चारण से बन गया नरेलाह

    जब यहां पर रेलवे स्टेशन बना तो उत्तर रेलवे के सुप्रिंटेंडेंट जान क्रिस्टोफर इसका उच्चारण समझ नहीं पाए और इसका नाम नरेलाह रख दिया, हरि राम आचार्य कहते हैं मुझे याद है कि बचपन में स्टेशन पर यही नाम लिखा था। धीरे-धीरे उस नाम से 'ह' अक्षर विलुप्त हो गया और रह गया नरेला। नरेला 944 ईं में संवत दशोदस, कार्तिक बदी नौमी शुक्रवार के दिन बना था।

    नजीबुद्दौला का विश्वासघात का गवाह

    एडवांस स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया (1707-1713) में जसवंत लाल मेहता ने लिखा है कि नरेला कई युद्धों का साक्षी रहा है। जब अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली 20 दिसंबर 1756 को लाहौर पहुंचा और दिल्ली पर चौथा आक्रमण करने की तैयारी करने लगा तो लाल किले की मजबूत किलेबंदी कर दी गई थी। सम्राट का दाहिना हाथ माने जाने वाले नजीबुद्दौला ने आक्रमणकारी का सामना करने के लिए अपनी सेनाओं को दिल्ली के बाहरी क्षेत्र में एकत्र किया, वह क्षेत्र नरेला ही था।

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    विशाल सेना ने घेर लिया

    मराठा सेनापति अंताजी मानकेश्वर भी राजधानी की रक्षा में उनकी सहायता के लिए वहां उपस्थित थे। मराठों ने 16 जनवरी 1757 को नरेला में अब्दाली की अग्रिम टुकड़ी का सामना किया लेकिन जब मराठा सरदार अंताजी मानकेश्वर नरेला से लौट रहे थे तब उनकी सेना को 16-17 जनवरी की रात दिल्ली के बाहरी क्षेत्र में एक विशाल सेना द्वारा घेर लिया गया।

    आक्रमणकारी कोई और नहीं सबसे करीबी था 

    मराठे पूरी तरह अनजान थे, फिर भी उन्होंने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और भारी क्षति के साथ फरीदाबाद की ओर पीछे हट गए। अगले दिन पता चला कि जिस अज्ञात शत्रु ने पिछली रात मराठों पर अचानक हमला किया था, वह कोई और नहीं बल्कि सहारनपुर का नजीबुद्दौला था, जो मुगल सम्राट का सेवक और साम्राज्य का दूसरा सबसे विश्वसनीय सरदार था।

    नजीब ने सबसे निर्णायक समय पर सम्राट और उसके वजीर के साथ विश्वासघात किया और अपनी बीस हजार की सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से निकलकर आक्रमणकारी के शिविर में जा मिला।

    सीमेंट की छतों से मल्टीस्टोरी कोठियों तक का सफर

    नरेला ने इतिहास के युद्ध देखे, देश-विदेश से आए लोग, आक्रमणकारी और राजा-महाराजा सब डेरा डाल लेते थे। इसलिए यहां पर बहुत सी सराय बनीं। यहां पर अनाजमंडी बनीं और यहां 1948 में आए शरणार्थियों को विस्थापित किया गया। इलाके के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि उस दौरान नरेला में पंजाबी काॅलोनी बसाई गई।

    उस समय सीमेंट की चादरों की अस्थाई छत डालकर जमीन अलाट कर दी गई थी लेकिन आज स्थिति यह है कि सबने बहुत अच्छे मकान बना लिए हैं। आज इलाका पूरी तरह से बदल गया है। लोगों ने मल्टीस्टोरी घर बना लिए हैं, जीवनस्तर में जमीन आसमान का अंतर आ गया है।

    शिक्षा की लौ से रोशन हुआ नरेला

    ए हिस्ट्री ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में लिखा है कि यहां कन्या गुरुकुल भी बनाया गया था। इसके अलावा आज का एमएल स्कूल भी बेहद पुराना है। 1914 में एक बड़े जमींदार लाला मुसद्दीलाल यहां आए। वे शिक्षा प्रेमी थे। जैसा कि नरेला की आबोहवा सबको आकर्षित करती थी तो वे भी यहीं रह गए।

    यहां के तालाब के पास दो कमरे के मकान में स्कूल चलाना शुरू किया था। बाद में इस स्कूल का नाम दिल्ली के चीफ कमिश्नर रहे डब्ल्यू एम हेली के नाम पर हेली रिफाए आम हाई स्कूल नरेला हो गया। हालांकि वर्तमान में इसे मुसद्दीलाल सीनियर सेकंडरी स्कूल (एमएल स्कूल) के नाम से ही जाना जाता है।

    तालाब की गहराइयों में इतिहास की जड़ें

    नरेला का जिक्र आए और इसके विशाल ऐतिहासिक तालाब का नाम न हो तो चर्चा अधूरी है। तालाब भले अब उजाड़ सूखा है, लेकिन इतिहास से लबालब भरा है। यहां के जानकारों और किताबों में मिलता है कि इसकी गहराइयों में कई राज दफन हैं, इसके अवशेषों में भी उतनी ही किंवदंतियां भी लिपटी हैं। कोई कहता है कि तालाब का निर्माण मराठा शासक ने करवाया था तो कोई इसे अपने आप ही बन जाने की बात करता है।

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    समय के साथ सूख गया तालाब

    तालाब को तोमर वंश के शासक राजा चंद ने बनवाया

    नरेला के इतिहास पर लिखी किताब में आचार्य हरि भारद्वाज ने बताया है कि 84 बीघा जमीन में बने, दस गज गहरे, 16 पौड़ियों और 24 चबूतरों वाले पक्की ईंटों के इस तालाब को तोमर वंश के शासक राजा चंद ने बनवाया था। जानकार बताते हैं कि राजा चंद और रानियां यमुना में स्नान के लिए आते जाते थे, इस इलाके में उन्होंने तालाब बनवा लिया और इससे एक नहर से यमुना से जोड़ दिया गया। इस खोदाई में पत्थर की मूर्ति मिली जिसे स्थापित करवा दिया गया और मंसा देवी मंदिर बन गया। इस सूखे तालाब की जमीन पर अक्सर बच्चे क्रिकेट खेला करते थे।

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    बच्चों को मिल गए थे चांदी के सिक्के

    1998 की बात है जब एक बार कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे तो उनकी गेंद एक मटकी से टकराई, बच्चों ने पास जाकर देखा तो उसमें चांदी के सिक्के थे। फिर क्या था बच्चे वो सिक्के लेकर भाग गए और बाद में जब पुरातत्व विभाग को इसकी सूचना मिली तो उसमें से 23 सिक्के जमा करवा लिए। इन सिक्कों से हर दौर के इतिहास के साक्ष्य मिलते हैं। सिक्के अकबर, हुमायूं, बाबर, से मोहम्मद शाह रंगीला तक के थे। बताया जाता है कि मुगलों के आक्रमणों, मांसाहार और उनके कुकृत्यों से तालाब गंदा होता गया और सूख गया।

    एक थैली की लड़ाई न होती तो बदहाली न होती

    नरेला में हर दौर में देशभक्ति का जज्बा दिखा है। यही वजह है कि चाहे महात्मा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक यहां बार-बार आते रहे। महात्मा गांधी 1936 में नरेला आए और कई दिनों तक वहां रहे, उस दौर में अछूतों के साथ खाया और यहां गांधी आश्रम बना दिया। 1949-53 में दो बार पंडित जवाहर लाल नेहरु नरेला आए। 1965 में पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. सर्वपल्ली के अलावा कई नेता और राजनेता आए।

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    दो हिस्सों की नियति पलटकर रख दी

    एक बड़ी ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि अगर एक थैली की लड़ाई न होती तो आज नरेला का विकास दक्षिणी दिल्ली की तर्ज पर होता। असल में विकास के काम वहीं किए जाने थे यहां तक कि एम्स का निर्माण भी इसी इलाके में होना था लेकिन जानकार बताते हैं कि एक ऐसी घटना हुई जिसने दिल्ली के दो हिस्सों की नियति पलटकर रख दी।

    दक्षिणी दिल्ली में शिफ्ट कर दिया गया

    हुआ यूं था कि एक बार जब पंडित जवाहर लाल नेहरु यहां के धारणी रोड पर आए तो उनके स्वागत में लोगों ने विकास के लिए उस समय 11 हजार रुपये की थैली बना भेंट करनी चाही। अब इस थैली को देने को लेकर दो गुटों में विवाद हो गया और उधर पंडित नेहरु कुछ देर इंतजार करते रहे लेकिन यह नजारा थमने का नाम नहीं ले रहा था तो वे नाराज होकर वहां से चले गए और जो विकास और इन्फ्रा यहां के लिए डिजाइन होना था वह दक्षिणी दिल्ली में शिफ्ट कर दिया गया।

    धीराणी से धराणी हुआ

    नरेला इलाके में धराणी रोड का इतिहास भी रोचक है। कई कहानियां हैं लेकिन इतिहासकार बताते हैं कि राजा राम सिंह के बेटे नाहर सिंह के साथ यहां की बेटी रत्ना की शादी हुई थी। अंग्रेजों ने नाहर सिंह को देशद्रोह का इल्जाम लगाकर चांदनी चौक में फांसी लगा दी। मुगलों के अत्याचारों से बचने के लिए रत्ना वापस अपने गांव नरेला आ गईं।

    अब पुरानी परंपरा के अनुसार ब्याही बेटी वापस अपने घर की दहलीज पर सदा के लिए नहीं आ सकती थी। ऐसे में उसे खेत में जगह दे दी गई, वहीं मकान, मंदिर और एक जोहड़ बना दिया। नाम दिया गया धीरानी। धी का अर्थ बेटी और रानी वो पहले से थी। ऐसे में धीराणी और फिर धराणी का जोहड़ बन गया।

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    बन गई सबसे बड़ी अनाज मंडी

    एक समय पर बनी नरेला की अनाज मंडी आज भी बहुत बड़ी है। पुस्तक ननेरा से नरेला तक में लिखा है कि जब अंग्रेज व्यापार बढ़ाने और अपना रिवेन्यू बढ़ाने के लिए आवागमन को तेज करना चाहते थे। तब उन्होंने दिल्ली से अंबाला-कालका, अमृतसर-लाहौर तक रेलवे लाइन बिछाई। इसी शृंखला में उत्तरी रेलवे मंडल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट जान क्रिस्टोफर ननेरा आए और प्रधान से मामूरपुर की जमीन पर एक अनाज मंडी बनाने का फैसला लिया।

    चहारदीवारी का निर्माण करवा दिया

    चीफ कमिश्नर क्लाउड अलेक्जेंडर बैरन ने दिल्ली डिस्ट्रिक्ट बोर्ड को भूमि अधिग्रहीत करने और दुकानदारों को प्लाट अलाट करने का आदेश दे दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इसकी घोषणा सार्वजनिक रूप से होनी चाहिए ताकि इच्छुक व्यापारी इसके लिए आवेदन कर सकें। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने इसके लिए 51.14 बीघे जमीन एक्वायर कर ली। दुकानों के प्लाॅट दिए गए और मंडी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने चहारदीवारी का निर्माण करवा दिया।

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    डरकर कुछ लोगों ने दुकानें बना लीं

    दोनों तरफ दो-दो गेट बना दिए गए। उसके बाद लोगों ने अपनी मनमानी शुरू कर दी और मंडी वीरान हो गई। दिल्ली के चीफ कमिश्नर जान नेस्बिट गार्डन जब दिल्ली आए तो सन् 1935 में मंडी से संबंधित पुरानी फाइल देखी और निरीक्षण किया तो उसकी बदहाली देखकर लोगों को आदेश दिया कि दुकानें बनानी शुरू करें अन्यथा उनकी अलाॅटमेंट कैंसिल कर दिया जाएगा। इससे डरकर कुछ लोगों ने दुकानें बना लीं। जिस मंडी की शुरुआत 1919 में हुई थी उसका विकास 1940 में जाकर हुआ।

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