डूसू चुनाव में एक लाख के बांड की शर्त को दिल्ली विश्वविद्यालय ने हटाया, उम्मीदवारों को देना होगा हलफनामा
दिल्ली विश्वविद्यालय ने छात्र संघ चुनाव में उम्मीदवारों से बांड जमा कराने की शर्त वापस ले ली है। अब छात्रों को सिक्योरिटी बांड के साथ हलफनामा देना होगा कोई धनराशि नहीं। आइसा की याचिका पर हाई कोर्ट में डीयू ने हलफनामा दाखिल कर यह जानकारी दी। अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया छात्रों ने फैसले का स्वागत किया।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में नामांकन दाखिल करने वाले उम्मीदवारों से एक लाख रुपये का बांड जमा कराने की शर्त को दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने वापस ले लिया है।
शुक्रवार को न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ के समक्ष दाखिल हालफनामा में डीयू ने कहा कि बांड के बजाय अब छात्रों को सिक्योरिटी बांड के साथ हलफनामा देना होगा, हालांकि, कोई धनराशि नहीं जमा करनी होगी।
अदालत ने डीयू के हलफनामा को रिकार्ड पर लेते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। पिछली सुनवाई पर अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि छात्रों को बांड देने के लिए न कहा जाए।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि डीयू की नई अधिसूचना में डूसू चुनाव लड़ने के लिए एक लाख रुपये के सुरक्षा बांड को पूर्व शर्त के रूप में अनिवार्य कर दिया गया।
डीयू के वकील ने कहा कि विश्वविद्यालय को सुरक्षा बांड के साथ एक हलफनामा प्राप्त होगा और कोई धनराशि जमा करने की आवश्यकता नहीं है।
याचिका दायर कर आइसा ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया है। याचिका के अनुसार अधिसूचना में चुनाव उम्मीदवारों को स्वयं या उनके समर्थकों द्वारा किसी भी प्रकार के संभावित संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए बांड भरने का निर्देश दिया गया था।
आइसा ने याचिका में दावा किया है कि यह लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अधिकारों के बाहर है। डूसू चुनाव लड़ने की तैयार कर रही छात्रा अंजलि और अभिषेक कुमार ने याचिका दायर कर कहा कि वित्तीय अधिरोपण ने धन के आधार पर मनमाना वर्गीकरण किया है।
छात्रों ने फैसले का किया स्वागत
याचिकाकर्ता और डीयू की छात्रा अंजलि ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय में समावेशिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने कहा कि अगर यह शर्त बनी रहती तो मेरे जैसे साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र-छात्राओं और महिलाओं के लिए चुनावी प्रक्रिया में शामिल होना और अपने साथियों की आवाज बनना लगभग असंभव हो जाता।
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