48 साल पहले 2 बच्चों की खौफनाक मौत..., Prime Video की नई सीरीज 'Raakh' के पीछे की Real Story
Ranga Billa Case History: प्राइम वीडियो की सीरीज 'Raakh' 1978 के कुख्यात रंगा-बिल्ला कांड से प्रेरित है, जिसमें दिल्ली के भाई-बहन गीता और संजय चोपड़ा ...और पढ़ें

प्राइम वीडियो की सीरीज राख के पीछे की असल कहानी। फोटो: जागरण
HighLights
वेब सीरीज 'Raakh' की असली कहानी
1978 का वो बदनाम रंगा-बिल्ला कांड
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम होने जा रही वेब सीरीज 'Raakh' भारत के सबसे चर्चित और भयावह अपराध में से एक, रंगा-बिल्ला कांड से प्रेरित है। जिसने 1978 में पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और जिसकी गूंज आज भी थमी नहीं है।
करीब पांच दशक बाद भी यह वारदात रूह कंपा देती है। इसकी वजह केवल अपराध की क्रूरता नहीं, बल्कि यह भी है कि इस मामले ने भारत में बच्चों की सुरक्षा को लेकर लोगों की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया था।
रंगा और बिल्ला, ये दो नाम भारत के आपराधिक इतिहास में उस दौर के सबसे खौफनाक नामों में शुमार हैं। दो किशोर बच्चों का अपहरण, एक की निर्मम हत्या, दूसरे के साथ दरिंदगी और फिर चार साल बाद तिहाड़ जेल में फांसी। यही है 'राख' की असली कहानी...

गीता और संजय चोपड़ा। फोटो: आर्काइव
आकाशवाणी में शो करने जा रहे थे दोनों बच्चे
26 अगस्त, 1978 की शाम। नई दिल्ली के धौला कुआं ऑफिसर्स क्वार्टर्स से शाम सवा 6 बजे दो बच्चे घर से निकले। 16 साल की गीता चोपड़ा जीजस एंड मैरी कॉलेज में पढ़ती थी और उसका 14 साल का भाई संजय चोपड़ा दसवीं कक्षा का छात्र था। दोनों को उस शाम संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी स्टूडियो में युववाणी के 'इन द ग्रूव' कार्यक्रम में भाग लेना था।
खबरें और भी
बाहर बादल छाए हुए थे और सुबह से ही रह-रहकर बारिश हो रही थी। तय यह हुआ था कि शो के बाद उनके पिता नौसेना अधिकारी कैप्टेन एमएम चोपड़ा, उन्हें आकाशवाणी भवन के गेट से ले लेंगे। जब वो 9 बजे वहां पहुंचे तो बच्चों का कोई अता-पता नहीं था। अंदर पूछताछ की तो पता चला कि गीता और संजय चोपड़ा वहाँ रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचे ही नहीं थे।
तेज रफ्तार कार में चाकू से वार
गोल डाकखाने के पास दोनों बच्चे लिफ्ट लेने की कोशिश कर रहे थे। तभी एक चोरी की फिएट कार उनके पास रुकी और उन्हें लिफ्ट का झांसा देकर उन्हें अगवा कर लिया गया। कार में सवार थे रंगा और बिल्ला, जिनका मकसद महज फिरौती वसूल करना था।
एक प्रत्यक्षदर्शी ने पुलिस को बताया, 'करीब साढ़े 6 बजे लोहिया अस्पताल के पास एक तेज रफ्तार फिएट मेरे स्कूटर के बगल से निकली। मुझे एक लड़की की चीख सुनाई दी। मैं अपने स्कूटर को भगाता हुआ कार के नज़दीक ले गया। आगे की सीट पर दो लोग बैठे हुए थे। पीछे की सीट पर एक लड़का और एक लड़की थे।'
'लाल बत्ती के पास जब कार धीमी हुई तो चिल्लाकर कहा, 'क्यों भाई क्या हो रहा है?' लड़के ने शीशे से अपना मुंह सटा कर अपनी टी-शर्ट की तरफ इशारा किया, जो खून से सनी हुई थी।
लड़की पीछे से ड्राइवर के बाल खींच रही थी। ड्राइवर एक हाथ से गाड़ी चला रहा था और दूसरे हाथ से लड़की पर लगातार वार कर रहा था। मंदिर मार्ग और पार्क स्ट्रीट की क्रॉसिंग पर कार ने रफ्तार पकड़ ली और लाल बत्ती जंप कर आगे निकल गई।'

जब फिरौती का इरादा बदल गया कत्ल में
रंगा और बिल्ला जब बच्चों को लेकर भागे, तो उन्हें पता चला कि बच्चों के पिता नौसेना में अधिकारी हैं। यह जानते ही उनका इरादा बदल गया। फिरौती वसूलने का मकसद एक झटके में गवाह बन चुके दोनों बच्चों को खत्म करने में बदल गया ।
रंगा और बिल्ला इन दोनों को बुद्धा गार्डन की तरफ रिज इलाके में ले गए। वहां एक सुनसान जगह कार रोककर पहले संजय चोपड़ा की बेरहमी से हत्या की गई। बिल्ला ने उसे झाड़ियों के पीछे ले जाकर चाकू से एक-दो नहीं, बल्कि 21 बार गोदा। उसकी तुरंत मौत हो गई।
गीता ने अपनी जान बचाने के लिए भरपूर संघर्ष किया। यहां तक कि उसने चाकू से रंगा पर वार भी किया, लेकिन आख़िरकार दोनों बच्चों को सबूत मिटाने के लिए मार डाला गया।
बाद में रंगा ने अपने इकबालिया बयान में कहा, 'मैं लड़की को उस तरफ ले जा रहा था, जहां उसके भाई की लाश पड़ी हुई थी। बिल्ला ने पूरी ताकत से लड़की की गर्दन पर तलवार से वार किया। इस वार के तुरंत बाद उसकी मौत हो गई। हमने उसकी लाश उठाकर झाड़ी में फेंक दी।'
दो दिन बाद मिले शव, पूरा देश सदमे में
हत्या के दो दिन बाद 28 अगस्त को एक चरवाहे को रिज क्षेत्र में दोनों बच्चों के शव मिले। बच्चों के घर से करीब 4 किलोमीटर दूर। गीता का शव सड़क से करीब 5 मीटर अंदर था, जबकि संजय का शव बहन से 50 मीटर की दूरी पर मिला।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने क्रूरता की तस्दीक की। संजय के शरीर पर कुल 21 घाव थे। गीता के शरीर पर पांच घाव थे। गीता की पैंट की जेब में उसका आइडेंटिटी कार्ड सही-सलामत था। उनके पास से एक बटुआ भी बरामद हुआ, जिसमें 17 रुपये रखे थे।
वारदात की खबर फैलते ही लोगों का गुस्सा भड़क गया। बोट क्लब पर जीजस एंड मैरी कॉलेज की लड़कियों ने प्रदर्शन किया। जब उस समय के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेई उनसे बात करने वहां पहुंचे तो छात्रों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। एक पत्थर वाजपेई के सिर में लगा और उनके सिर से खून बहने लगा।
उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई अपना शोक प्रकट करने गीता और संजय के घर गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री के इस्तीफे तक की मांग उठने लगी। यह मामला संसद तक में गूंजा था।
कालका मेल में सैनिकों ने दबोचा
वारदात के बाद रंगा और बिल्ला दिल्ली से भागकर पहले मुंबई गए और फिर वहां से आगरा। आगरा से दिल्ली आते हुए वे गलती से कालका मेल के उस डिब्बे में चढ़ गए, जिसमें सेना के जवान सवार थे।
रंगा और बिल्ला को देखकर सैनिकों को अंदाजा हो गया कि दाल में कुछ काला है। उन्होंने उन्हें बांध दिया और जब दिल्ली स्टेशन आया तो उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। 8 सितंबर, 1978 को उनकी तलाश खत्म हुई।
पुलिस ने रंगा और बिल्ला से अलग-अलग पूछताछ की। रंगा ने दुष्कर्म और हत्या के लिए बिल्ला को दोषी ठहराया। बिल्ला ने रंगा पर आरोप लगाया। जेल में भी यह तकरार जारी रही। रंगा कहता था कि बिल्ला ने उसे फंसाया, बिल्ला कहता था कि रंगा ने फंसाया।
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हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
अदालत में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दोनों को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। 26 नवंबर, 1979 को दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि फांसी से कम कोई सजा नहीं होगी। आखिरी उम्मीद के तौर पर राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को दया याचिका भेजी गई। वह भी ठुकरा दी गई।
जेल में खेलते थे बैडमिंटन और फुटबॉल
किताब 'ब्लैक वॉरंट: कनफेशंस ऑफ अ तिहाड़ जेलर' में जेल अधिकारी सुनील गुप्ता ने लिखा है, 'जब मैं उस जेल में गया तो इनकी कानूनी प्रक्रिया चल रही थी। मैं देखता था कि ये दोनों कभी बैडमिंटन खेलते देखे जाते थे तो कभी फ़ुटबॉल।'
'रंगा बहुत जॉली किस्म का इंसान था। उसका कद था करीब 5 फीट 10 इंच। वो हमेशा खुश रहता था। उसको इस बात की चिंता नहीं थी कि उसे फांसी होनी है। बिल्ला पेशे से टैक्सी चलाता था। उसका कद था करीब साढ़े 5 फीट। वो हमेशा सीरियस रहता था और रोता रहता था।'
जेल का कानून यह है कि किसी फांसी के सजा पाए व्यक्ति को तब तक साधारण अभियुक्त माना जाएगा, जब तक राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका अस्वीकार न कर दी हो। इसके बाद ही उसे काल कोठरी में ले जाकर बेड़ियां पहनाई जाती हैं।
फांसी से एक दिन पहले पत्रकारों से मिला बिल्ला
फांसी से एक दिन पहले दिल्ली के पांच पत्रकारों ने रंगा और बिल्ला से मिलने की इच्छा प्रकट की। रंगा ने मिलने से इनकार कर दिया, लेकिन बिल्ला करीब 20 मिनट तक उनसे मिला। इस दौरान बिल्ला का पूरा शरीर कांप रहा था। वो आखिर तक कहता रहा कि रब जानता है कि उसने यह अपराध नहीं किया और उसे फंसाया गया है। लेकिन उसकी बॉडी लैंग्वेज से पता चलता था कि वो झूठ बोल रहा है।
फांसी की रात रंगा ने अपना खाना खाया और सामान्य ढंग से सोया। बिल्ला ने न तो खाना खाया, न एक मिनट के लिए सोया। वो पूरी रात अपनी कोठरी के चक्कर लगाते हुए बड़बड़ाता रहा।
फकीरा और कालू जल्लाद को बुलाया गया
दोनों को फांसी देने के लिए फ़रीदकोट से फकीरा और मेरठ से कालू जल्लाद को बुलाया गया। फांसी से पहले इन्हें 'ओल्ड मॉन्क' शराब दी गई, माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वो जल्लाद ही क्यों न हो, अपने होशोहवास में किसी की जान नहीं ले सकता। जेल मैनुअल में जल्लाद को सिर्फ 150 रुपये देने का जिक्र है।
फांसी के लिए बिहार की बक्सर जेल से खास रस्सी मंगाई गई। यह रस्सी बाजार से खरीदी नहीं जाती बल्कि बक्सर जेल में खासतौर से बनाई जाती है। इसे लचीला बनाने के लिए इस पर मोम या मक्खन का लेप किया जाता है। कुछ जल्लाद इसके लिए पके हुए केले को मसलकर रस्सी पर लगाते हैं। इस रस्सी की लंबाई 1.8 मीटर से 2.4 मीटर के बीच होती है।
31 जनवरी, 1982 की सुबह जब फंदा पड़ा
31 जनवरी, 1982 को तिहाड़ जेल में दोनों को फांसी देने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। सुबह 5 बजे जब वो उठे तो दोनों को चाय का एक-एक प्याला दिया गया। उनसे आखिरी बार पूछा गया कि क्या वो मजिस्ट्रेट के सामने अपनी वसीयत रिकॉर्ड कराना चाहते हैं। दोनों ने इनकार किया।
इन्हें 5 बजे जगाकर कहा कि नहा लो। रंगा तो नहाया था लेकिन बिल्ला ने नहाने से मना कर दिया। फांसी से पहले दोनों के चेहरे काले कपड़े की एक तरह की थैली से ढके गए ताकि वो देख न सकें कि बाहर क्या हो रहा है।"
दोनों के हाथ में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां पहनाई गईं। फांसी के दिए गए समय से 10 मिनट पहले उन्हें उस प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ने को कहा गया, जहां फांसी का फंदा लगा हुआ था। फांसी के समय बिल्ला सिसक रहा था। जबकि रंगा आखिर तक बहुत जोश में था। फांसी से पहले उसने जोर से नारा लगाया- 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल।'
पैर खींचकर निकाली गई आखिरी सांस
निर्धारित समय पर जेल के सुपरिंटेंडेंट ने लाल रुमाल हिलाया और कालू ने फकीरा की मदद से लीवर खींच दिया। दो घंटे बाद जब डॉक्टरों ने जांच की तो बिल्ला मृत पाया गया। लेकिन रंगा की नाड़ी अभी तक चल रही थी।
बताया जाता कि चूंकि वो लंबा था और उसने फांसी के समय अपनी सांस रोक ली थी, इसलिए उसकी जान तुरंत नहीं निकली। तब जेल के एक कर्मचारी को कुएं में उतारा गया। उसने उसके पैर खींचे। तब जाकर उसकी मौत हुई।
किताब में यह भी दर्ज है कि फांसी के इतिहास में ऐसा भी हुआ है जब लीवर इतनी जोर से खींचा गया कि शरीर के दो टुकड़े हो गए, गर्दन ऊपर रह गई और नीचे का शरीर टूटकर कुएं में गिर गया। रंगा और बिल्ला के शवों को न तो उनके परिजनों ने स्वीकार किया, न किसी रिश्तेदार ने। जेल की तरफ से ही उनका अंतिम संस्कार किया गया।
गीता और संजय के नाम पर हर साल दिया जाता है वीरता पुरस्कार
1978 में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए दो वीरता पुरस्कारों की घोषणा की। संजय चोपड़ा पुरस्कार और गीता चोपड़ा पुरस्कार। ये पुरस्कार हर साल राष्ट्रीय वीरता पुरस्कारों के साथ दिए जाते हैं।
करीब पांच दशक बाद भी रंगा और बिल्ला का नाम आतंक के पर्याय के तौर पर लिया जाता है। 'राख' उसी कहानी को नए अंदाज में पर्दे पर लाने की कोशिश है, लेकिन असली कहानी किसी भी स्क्रीनप्ले से कहीं ज्यादा दिल दहलाने वाली है।