क्या आप जानते हैं दुनिया की पहली महिला डॉक्टर कौन थी? एक मजाक के कारण मिला था मेडिकल कॉलेज में दाखिला
एलिजाबेथ ब्लैकवेल, जिनका जन्म 3 फरवरी 1821 को हुआ था, आधुनिक युग की पहली महिला डॉक्टर थीं। एक दोस्त की अंतिम इच्छा से प्रेरित होकर, उन्होंने मेडिकल की ...और पढ़ें

पढ़ें एलिजाबेथ ब्लैकवेल की कहानी (Picture Courtesy: wams.nyhistory.org/ hws.edu/)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। "किसी नए विचार को स्वीकार कराने के लिए अकेले खड़े होने का साहस चाहिए।" एलिजाबेथ ब्लैकवेल के ये शब्द केवल एक विचार नहीं, बल्कि उनके संघर्षमयी जीवन का निचोड़ हैं।
19वीं सदी के उस दौर में, जब महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे, एलिजाबेथ ने न केवल मेडिकल साइंस की डिग्री हासिल की, बल्कि भविष्य की करोड़ों महिलाओं के लिए डॉक्टर बनने का रास्ता भी खोला।
दोस्त की आखिरी इच्छा ने बदला जीवन का रास्ता
एलिजाबेथ के जीवन के संघर्ष की कहानी सुनाने के लिए हमने आज का दिन इसलिए चुना, क्योंकि आज ही यानी 3 फरवरी 1821 को उनका जन्म हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि इंग्लैंड के ब्रिस्टल में जन्मी एलिजाबेथ का शुरुआती सपना डॉक्टर बनना नहीं था, बल्कि वे एक शिक्षिका के रूप में अपना जीवन बिता रही थीं। लेकिन एक घटना ने उनका पूरा जीवन बदल दिया।
उनकी एक करीबी दोस्त गंभीर रूप से बीमार थीं। मृत्यु से पहले उस दोस्त ने एलिजाबेथ से कहा, “अगर मेरा इलाज किसी महिला डॉक्टर ने किया होता, तो शायद मुझे इतनी तकलीफ नहीं होती।” दोस्त की यह पीड़ा एलिजाबेथ के दिल में उतर गई और उन्होंने उसी पल ठान लिया कि वे डॉक्टर बनकर रहेंगी।
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(Picture Courtesy: hws.edu/)
एडमिशन के पीछे की दिलचस्प कहानी
एलिजाबेथ को मेडिकल कॉलेज में कैसे एडमिशन मिला, यह भी एक दिलचस्प किस्सा है। बात साल 1847 की है, जब उन्होंने न्यूयॉर्क के जेनेवा मेडिकल कॉलेज (अब होबर्ट विलियम) में एडमिशन के लिए आवेदन किया। उस समय महिलाओं का मेडिकल कॉलेज में जाना असंभव माना जाता था।
कॉलेज प्रशासन खुद दुविधा में था, इसलिए उन्होंने छात्रों के बीच वोटिंग कराई। छात्रों ने इसे एक मजाक समझकर हां में वोट दे दिया और कॉलेडज प्रशासन ने एलिजाबेथ को एडमिशन दे दिया। लेकिन जब एलिजाबेथ वास्तव में कॉलेज पहुंचीं, तो इस बात को मजाक समझ रहे छात्र दंग रह गए।
विरोध के बीच सफलता
कॉलेज में एलिजाबेथ एकमात्र महिला थीं। इसलिए कदम-कदम पर उनका विरोध हुआ, लेकिन उन्होंने अपनी बुद्धि से सभी के मुंह पर ताला लगा दिया। 1849 में उन्होंने अपनी क्लास में टॉप किया और एमडी की डिग्री हासिल कर आधुनिक दौर की पहली महिला डॉक्टर बनीं।
आंख की रोशनी चली गई
मेडिकल डिग्री हासिल करने के बाद भी एलिजाबेथ का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। मेडिकल डिग्री होने के बावजूद होने अमेरिका में कहीं भी नौकरी नहीं मिली। इसलिए वे लंदन चली गईं और वहां मिडफाइफरी की ट्रेनिंग शुरू कर दी। लेकिन एक नवजात का इलाज करते समय उनकी आंख में संक्रमित तरल चला गया। इलाज में देरी की वजह से उन्होंने अपनी एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए खो दी। लेकिन इस बाधा ने भी उनके हौसलों को कम नहीं किया।
गरीबों का सहारा और महिला शिक्षा की जननी
एक आंख की रोशनी पूरी तरह खो देने के बावजूद एलिजाबेथ ने हार नहीं मानी और अपनी बहन एमिली के साथ मिलकर 1853 में अमेरिका में एक क्लीनिक खोला। इस क्लीनिक का नाम 'न्यूयॉर्क डिस्पेंसरी फॉर वुमन एंड चिल्ड्रन' रखा। यह दुनिया की पहली ऐसी जगह थी जहां गरीब महिलाओं और बच्चों का इलाज महिला डॉक्टरों द्वारा किया जाता था। आगे चलकर 1867 में उन्होंने महिला चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना की, ताकि दूसरी महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के मेडिकल की पढ़ाई करने का अवसर मिले।
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(Picture Courtesy: hws.edu/)
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