कभी सोचा है दुनिया का पहला पब्लिक फ्लशिंग टॉयलेट कब और कैसे बना? दिलचस्प है कहानी
एक समय था जब सार्वजनिक शौचालय एक अजूबा थे। प्लंबर जॉर्ज जेनिंग्स ने 1851 में ग्रेट एक्जिबिशन में पहला सार्वजनिक फ्लशिंग टॉयलेट पेश करके स्वच्छता क्रां ...और पढ़ें
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क्या आप जानते हैं दुनिया के पहले पब्लिक टॉयलेट की कहानी? (Picture Courtesy: Getty Images)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज हमारे लिए सार्वजनिक शौचालय यानी पब्लिक टॉयलेट एक सामान्य सुविधा है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब यह पूरी दुनिया के लिए एक अजूबा था। जी हां, एक समय ऐसा भी था जब सड़कों पर पब्लिक टॉयलेट्स नहीं हुआ करते थे।
जाहिर सी बात है इससे लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ती होगी, खासकर महिलाओं को और स्वच्छता के लिहाज से भी यह काफी मुसीबत भरा रहा होगा।
लेकिन एक प्लंबर ने यह तस्वीर बदली और दुनिया के सबसे पहले सार्वजनिक फ्लशिंग टॉयलेट की शुरुआत की। आइए जानते हैं लंदन की सड़कों से शुरू हुई स्वच्छता क्रांति की यह अनोखी कहानी।
एक प्लंबर की दूरदर्शी सोच
सार्वजनिक स्वच्छता की दिशा में यह ऐतिहासिक कदम उठाया था जॉर्ज जेनिंग्स ने, जो पेशे से एक प्लंबर और सैनिटरी इंजीनियर थे। इसकी नींव 1851 की 'ग्रेट एक्जिबिशन' में पड़ी थी। वहां जेनिंग्स ने पहली बार लोगों को फ्लश टॉयलेट की सुविधा से परिचित कराया।
उनका यह प्रयोग इतना सफल रहा कि करीब 8.27 लाख लोगों ने एक पेनी देकर इन टॉयलेट्स का इस्तेमाल किया। खास बात यह थी कि एक पेनी के बदले लोगों को केवल टॉयलेट ही नहीं, बल्कि साफ सीट, तौलिया, कंघी और जूते पॉलिश जैसी प्रीमियम सुविधाएं भी दी गईं।

(Picture Courtesy: Facebook)
2 फरवरी स्वच्छता के इतिहास का बड़ा दिन
प्रदर्शनी की जबरदस्त सफलता के बाद, 2 फरवरी 1852 को लंदन की सड़कों पर आम लोगों के लिए स्थायी रूप से पब्लिक फ्लशिंग टॉयलेट खोले गए। इन्हें उस समय पब्लिक वेटिंग रूम्स कहा जाता था। पुरुषों के लिए पहला टॉयलेट '95 फ्लीट स्ट्रीट' पर बनाया गया, जबकि कुछ दिनों बाद महिलाओं के लिए '51 बेडफोर्ड स्ट्रीट' पर यह सुविधा शुरू हुई। इन वेटिंग रूम्स में वॉटर क्लोसेट लगे थे। यहां प्रवेश शुल्क 2 पेनी रखा गया था, जबकि ब्रश या हाथ धोने जैसी सेवाओं के लिए अलग से शुल्क लिया जाता था।

(Picture Courtesy: Facebook)
'ग्रेट स्टिंक' और लंदन का संकट
उस दौर में लंदन की स्थिति आज जैसी नहीं थी। विक्टोरियन युग के दौरान शहर की सारी गंदगी सीधे टेम्स नदी में बहा दी जाती थी। इसके कारण 1858 में शहर में इतनी भयानक बदबू फैली कि इसे ग्रेट स्टिंक के नाम से जाना गया। हालात इस कदर बिगड़ गए कि सरकार को मजबूरन बड़े कदम उठाने पड़े।
आधुनिक सीवर सिस्टम का उदय
इस संकट को हल करने के लिए इंजीनियर जोसेफ बेजलजेट ने एक आधुनिक अंडरग्राउंड सीवर सिस्टम का निर्माण किया। इस सिस्टम ने गंदगी को शहर से दूर पहुंचाया, जिससे बीमारियों के प्रसार पर काबू पाया जा सका। हैरानी की बात यह है कि जोसेफ का बनाया गया वह सीवर सिस्टम आज भी लंदन में सफलतापूर्वक काम कर रहा है।
जॉर्ज जेनिंग्स के फ्लश टॉयलेट और जोसेफ बेजलजेट के सीवर सिस्टम ने मिलकर न केवल लंदन की तस्वीर बदली, बल्कि पूरी दुनिया को सार्वजनिक स्वच्छता का एक नया मॉडल दिया।
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