क्या सच में इस झील का पानी छूते ही पत्थर बन जाते हैं जीव? जानिए लेक नेट्रॉन की डरावनी सच्चाई
अफ्रीका के लेक नेट्रॉन का पानी जीवों को ममी बनाने की क्षमता रखता है। इसलिए यह झील बेहद घातक मानी जाती है। ...और पढ़ें
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लेक नेट्रॉन का पानी क्यों है जानलेवा? (Picture Courtesy: Instagram)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। प्रकृति अपने आप में कई अजूबों और रहस्यों को समेटे हुए है। तंजानिया के उत्तरी भाग में, केन्या की सीमा के पास स्थित नेट्रॉन झील एक ऐसा ही रहस्य है। इस झील के बारे में सबसे डरावनी और हैरान करने वाली बात यह है कि इसके संपर्क में आने वाले जीव-जंतु पत्थर जैसे बन जाते हैं।
सुनने में हैरान करने वाला है, लेकिन यह सच है। ऐसे में सवाल आता है कि आखिर इस झील के पानी में ऐसा क्या है जो मौत के बाद भी शरीर को पत्थर जैसा बना देता है? आइए जानें इस सवाल का जवाब।
ज्वालामुखी से संबंध
नेट्रॉन झील न्गोरोंगोरो क्रेटर के उत्तर-पूर्व में स्थित है। इस झील की लंबाई लगभग 56 किमी और चौड़ाई 22 किमी है। इसे मुख्य रूप से दक्षिणी इवासो एनगिरो नदी और मिनरल्स से भरपूर गर्म झरनों से पानी मिलता है। लेकिन इस झील को घातक बनाने में सबसे बड़ा हाथ पास के ज्वालामुखी का है। इस क्षेत्र में ओल्डोइन्यो लेंगाई नाम का सक्रिय ज्वालामुखी है, जो झील के ठीक दक्षिण में है।
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(Picture Courtesy: Instagram)
झील के पानी का घातक केमिस्ट्री
नेट्रॉन झील के पानी के इतना खतरनाक होने के पीछे वैज्ञानिक कारण छिपा है। ओल्डोइन्यो लेंगाई ज्वालामुखी से सोडियम कार्बोनेट और कैल्शियम कार्बोनेट का मिश्रण निकलता है। यह मिश्रण जमीन के अंदर से होता हुआ गर्म झरनों के जरिए झील में पहुंचता है।
इसके अलावा, इस झील का पानी किसी दूसरी नदी या समुद्र में नहीं मिलता। साथ ही, तेज इवापोरेशन के कारण नदी का पानी सूखता है और पीछे रह जाता है नेट्रॉन (सोडियम कार्बोनेट डेकाहाइड्रेट) और ट्रोना (सोडियम सेस्क्विकार्बोनेट डाइहाइड्रेट)।
इन वजहों से झील के पानी का pH स्तर 10.5 तक पहुंच जाता है, जो लगभग अमोनिया जितना ही बसिक है। कभी-कभी इस झील का pH स्तर 12 तक भी पहुंच जाता है। इसके कारण जीवों की त्वचा और आंखे झुलस सकती हैं।
जीव पत्थर क्यों बन जाते हैं?
सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी तस्वीरें वायरल होती हैं जिनमें पक्षी और चमगादड़ पत्थर की मूर्ति जैसे दिखाई देते हैं। दरअसल, झील के पानी में मौजूद सोडियम कार्बोनेट वही केमिकल है जिसका इस्तेमाल प्राचीन मिस्र में ममी बनाने के लिए किया जाता था। यह एक बेहतरीन प्रिजर्वेटिव का काम करता है।
जब कोई जानवर झील के पानी के संपर्क में आता है या उसमें गिर जाता है, तो पानी उसके शरीर की नमी और फैट को पूरी तरह सोख लेता है। ज्यादा बेसिक होने के कारण शरीर को सड़ाने वाले बैक्टीरिया पनप नहीं पाते और धीरे-धीरे वह जीव डिहाइड्रेटेड होकर अकड़ जाता है और सोडियम कार्बोनेट की परत उस पर जमा हो जाती है, जिससे वह पत्थर जैसा सख्त दिखने लगता है।
हालांकि, ऐसा नहीं होता कि जीव पानी छूते ही तुरंत पत्थर बन जाते हैं। यह एक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर धीरे-धीरे ममी में तब्दील होता है।
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(Picture Courtesy: Instagram)
प्रकृति का खेल
इतनी घातक परिस्थितियों के बावजूद, नेट्रॉन झील पूरी तरह निर्जीव नहीं है। यहां का नजारा तब और भी अद्भुत हो जाता है जब झील का पानी लाल रंग का दिखाई देता है। यह रंग साइनोबैक्टीरिया की वजह से होता है। हैरानी की बात यह है कि यह झील लेसर फ्लेमिंगो का मुख्य प्रजनन स्थल है। इन पक्षियों की टांगों पर सख्त सुरक्षात्मक परत होती है, जो उन्हें इस पानी से बचाती है। साथ ही, तिलापिया मछली की कुछ प्रजातियां भी इस पानी के अनुसार खुद को ढाल चुकी हैं।

(Picture Courtesy: Brilliant Africa)
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