मोहिंदर सिंह रंधावा: जिन्हें मिली 'पंजाब की छठी नदी' की उपाधि, हरित क्रांति से पहले बदली भारत की तस्वीर
मोहिंदर सिंह रंधावा, जिनका जन्म 2 फरवरी 1909 को हुआ था, एक दूरदर्शी प्रशासक, वैज्ञानिक और प्रकृति प्रेमी थे। उन्होंने विभाजन के दौरान लाखों शरणार्थियो ...और पढ़ें
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कौन थे मोहिंदर सिंह रंधावा? (Picture Courtesy: Instagram)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। "शहर सिर्फ इमारतों से नहीं, पेड़ों और फूलों से जीवित होता है।" यह विचार था मोहिंदर सिंह रंधावा का, एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक सोच और प्रकृति प्रेम से आधुनिक भारत की तस्वीर बदल दी।
20वीं सदी के इस महान प्रशासक ने भारत में हरित क्रांति आने से पहले ही कई ऐसे कृषि बदलाव किए, जिसके कारण इन्हें पंजाब की छठी नदी की उपाधि भी दी गई। अब आप सोच रहे होंगे कि आज हम अचानक से इनके बारे में क्यों बात कर रहे हैं। दरअसल, आज ही के दिन यानी 2 फरवरी 1909 में इनका जन्म हुआ था। इसी मौके पर चलिए जानते हैं इनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।
शिक्षा और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
पंजाब के जीरा गांव में जन्मे मोहिंदर सिंह रंधावा का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। एक किसान परिवार से होने के कारण मिट्टी और खेती से उनका जुड़ाव स्वाभाविक था। उन्होंने लाहौर से बॉटनी में एमएससी की शिक्षा हासिल की, जिसने उनकी वैज्ञानिक सोच को विकसित किया। 1934 में उन्होंने लंदन से भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की और करीब 9 वर्षों तक कलेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दीं।
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(Picture Courtesy: Instagram)
विभाजन के समय पुनर्वास में ऐतिहासिक भूमिका
1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब रंधावा दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर थे। 15 अगस्त को लाल किले पर स्वतंत्रता समारोह की व्यवस्था से लेकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। 1948-49 में उन्हें पुनर्वास महानिदेशक बनाया गया। पश्चिमी पंजाब से आए लाखों शरणार्थियों को पूर्वी पंजाब में बसाना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन रंधावा ने न केवल उन्हें घर और जमीन दिलाई, बल्कि बीज, खाद और रोजगार की व्यवस्था कर उन्हें दोबारा पैरों पर खड़ा किया। उनके इन निस्वार्थ प्रयासों के कारण उन्हें 'पंजाब की छठी नदी' के नाम से पुकारा गया।

(Picture Courtesy: theheritagelab.in)
कृषि सुधार और हरित क्रांति की नींव
रंधावा को हरित क्रांति से पहले देश में बड़े कृषि सुधारों के लिए जाना जाता है। 1945 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सेक्रेटरी रहते हुए उन्होंने एग्रीकल्चर रिसर्च की नींव रखी थी। उन्होंने सिंचाई परियोजनाओं, नहरों, ट्यूबवेल और ग्रामीण बिजली जैसी नीतियों को बढ़ावा दिया। उनकी कोशिशों का ही नतीजा था कि पंजाब में गेहूं का उत्पादन 1960-61 के 1.9 मिलियन टन से बढ़कर 1970-71 में 7 मिलियन टन से ज्यादा हो गया। इन कृषि सुधारों ने पंजाब को देश का अन्न भंडार बना दिया।
चंडीगढ़ को बनाया 'द सिटी ब्यूटीफुल'
आज हम चंडीगढ़ को जिस हरियाली और खूबसूरती के लिए जानते हैं, उसके पीछे भी रंधावा की कोशिशे ही हैं। 1955 में चंडीगढ़ प्लानिंग कमेटी के चेयरमैन और बाद में पहले चीफ कमिश्नर के रूप में उन्होंने आर्किटेक्ट ले कोर्बुजिए के मास्टर प्लान में प्रकृति का संतुलन बनाया। उन्होंने शहर में बड़े पैमाने पर पेड़-पौधे लगवाए। चंडीगढ़ के सेक्टर -6 में स्थित जाकिर हुसैन रोज गार्डन, जो आज एशिया का सबसे बड़ा रोज गार्डन है, रंधावा की ही देन है।
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(Picture Courtesy: Panjab Digital Library)
सम्मान और विरासत
मोहिंदर सिंह रंधावा के योगदान केवल प्रशासन तक सीमित नहीं थे। वे एक समर्पित वैज्ञानिक भी थे। 1955 में शैवाल पर शोध के लिए उन्हें 'डॉक्टर ऑफ साइंस' की उपाधि मिली। भारत सरकार ने उनके ऐतिहासिक कामों के लिए 1972 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। 3 मार्च 1986 को इस महान व्यक्ति ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके लगाए गए बाग और उनके किए गए कृषि सुधार आज भी देश को खुशहाली दे रहे हैं।
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