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    इंसानी खून को 'ब्लड ग्रुप' में बांटने वाले महान वैज्ञानिक की कहानी, जिनकी खोज आज भी दे रही जीवनदान

    Updated: Sun, 14 Jun 2026 01:22 PM (IST)

    हर साल 14 जून को दुनिया भर में 'विश्व रक्तदाता दिवस' मनाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन का इतिहास क्या है? ...और पढ़ें

    रक्तदान को जीवनदान बनाने वाले सर कार्ल लैंडस्टैनर (Image Source: X & Magnific)

    रक्तदान को जीवनदान बनाने वाले सर कार्ल लैंडस्टैनर (Image Source: X & Magnific)

    HighLights

    1. ब्लड ग्रुप प्रणाली की खोज कर रक्त आधान सुरक्षित बनाया

    2. पोलियो वायरस की पहचान कर वैक्सीन का मार्ग प्रशस्त किया

    3. आरएच फैक्टर खोजकर नवजात शिशुओं के इलाज में मदद की

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि हर साल 14 जून को ही 'विश्व रक्तदाता दिवस' क्यों मनाया जाता है? दरअसल, यह दिन चिकित्सा जगत के एक असली नायक- ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक सर कार्ल लैंडस्टैनर का जन्मदिन (14 जून 1868) है।

    वह कार्ल ही थे जिन्होंने इंसानी खून के रहस्य को सुलझाया और ब्लड ग्रुप प्रणाली की खोज करके ब्लड ट्रांसफ्यूजन को एक सुरक्षित प्रक्रिया बना दिया। आइए जानते हैं 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित इस महान वैज्ञानिक की प्रेरणादायक कहानी।

    Karl Landsteiner

    (Image Source: X)

    मां के साये में बीता संघर्ष भरा बचपन

    वियना में जन्मे कार्ल के पिता, लियोपोल्ड लैंडस्टैनर एक जाने-माने पत्रकार और प्रकाशक थे। जब कार्ल महज 6 साल के थे, तब उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। इसके बाद उनकी मां फैनी लैंडस्टैनर ने ही उन्हें अकेले पाल-पोस कर बड़ा किया। बचपन से ही कार्ल के भीतर गजब की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी, जिसने आगे चलकर उनके लिए सफलता के दरवाजे खोले।

    वियना से लेकर स्विट्जरलैंड तक

    कार्ल की प्रारंभिक शिक्षा वियना में हुई। विज्ञान में गहरी रुचि होने के कारण 1891 में उन्होंने 'यूनिवर्सिटी ऑफ वियना' से अपनी मेडिकल डिग्री पूरी की। पढ़ाई के ही दौरान उनका मन रसायन विज्ञान में भी रमने लगा। अपनी इसी लगन के चलते उन्होंने जर्मनी और स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित संस्थानों से कार्बनिक रसायन का गहरा अध्ययन किया। दवा और रसायन का यही अनूठा संगम उनके भविष्य के चमत्कारी शोधों का आधार बना।

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    जब खून चढ़ाना नहीं रहा जानलेवा

    19वीं सदी के अंत तक मरीजों को खून चढ़ाना किसी जुए से कम नहीं था, क्योंकि यह प्रक्रिया बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं थी।

    • थक्के जमने का रहस्य: 1900 में एक पैथोलॉजिस्ट के तौर पर काम करते हुए कार्ल ने पहली बार यह गौर किया कि जब दो अलग-अलग इंसानों के खून को मिलाया जाता है, तो उसमें थक्के बन जाते हैं।
    • ब्लड ग्रुप की खोज: इसी पर गहन शोध करते हुए 1900-1901 में उन्होंने दुनिया को 'A', 'B' और 'O' ब्लड ग्रुप के बारे में बताया।
    • AB ग्रुप की पहचान: इसके ठीक बाद 1902 में उनके सहयोगियों ने 'AB' ब्लड ग्रुप को भी खोज निकाला।

    इस कामयाबी ने हमेशा के लिए मेडिकल साइंस का चेहरा बदल दिया और सुरक्षित रक्त चढ़ाने का रास्ता साफ हो गया।

    पोलियो के वायरस का किया पर्दाफाश

    कार्ल का दिमाग सिर्फ खून तक सीमित नहीं था। 1908 के दौर में जब यूरोप में पोलियो नाम की बीमारी बच्चों को अपाहिज बना रही थी, तब डॉक्टर इसके कारण को लेकर पूरी तरह भ्रम में थे।

    ऐसे समय में कार्ल ने वियना में एक मृत पोलियो मरीज के मेरुदंड पर परीक्षण किए। उन्होंने दुनिया के सामने यह साबित किया कि पोलियो किसी आम बैक्टीरिया का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे 'पोलियो वायरस' का हाथ है। कार्ल की इसी शानदार खोज ने आगे चलकर साल्क और साबिन जैसे दिग्गजों के लिए पोलियो की असरदार वैक्सीन बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।

    कठिनाइयों से हार न मानने का जज्बा

    प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ऑस्ट्रिया में भयंकर आर्थिक तंगी आ गई। वैज्ञानिक शोधों के लिए संसाधनों का अकाल पड़ गया, लेकिन कार्ल ने हार नहीं मानी। विज्ञान के प्रति अपने जुनून के चलते वे पहले नीदरलैंड्स गए और फिर अमेरिका का रुख किया। वहां न्यूयॉर्क के 'रॉकफेलर इंस्टीट्यूट' में उन्हें बेहतरीन सुविधाएं मिलीं और उन्होंने अपना काम बिना रुके जारी रखा।

    नवजात बच्चों के लिए एक संजीवनी

    उम्र के सातवें दशक में भी उनका शोध जारी था। 1940 में कार्ल ने अमेरिकी वैज्ञानिक एलेक्जेंडर वीनर के साथ मिलकर एक और ऐतिहासिक खोज की- आरएच फैक्टर।

    इस खोज से डॉक्टरों को यह गुत्थी सुलझाने में मदद मिली कि गर्भवती मां और उसके बच्चे के खून में अगर तालमेल न हो, तो गंभीर दिक्कतें क्यों आती हैं। इसी आधार पर आगे चलकर नवजात शिशुओं में होने वाली कई जानलेवा ब्लड बीमारियों का इलाज संभव हो पाया।

    26 जून 1943 को सर कार्ल लैंडस्टैनर का निधन हो गया। आज हम सुरक्षित रूप से जो रक्तदान कर पाते हैं, वह सीधे तौर पर उनके इसी समर्पण और अथक प्रयासों का नतीजा है।

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