जब सोने से भी ज्यादा थी नीले रंग की कीमत, इस खास पत्थर ने बनाया इसे दुनिया का सबसे महंगा कलर
नीला रंग कभी सोने से भी महंगा था, जिसे 'अल्ट्रामरीन ब्लू' कहा जाता था। यह अफगानिस्तान के लैपिस लाजुली पत्थर से बनता था। इसकी निर्माण प्रक्रिया और दुर् ...और पढ़ें
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सोने से भी महंगा रंग, अफगानिस्तान से आया शाही इतिहास (Picture Credit- AI Generated)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नीला रंग, जिसे आज आप अपने पसंदीदा कपड़ों, समंदर और आसमान में देखते हैं, अगर उसे खरीदने के लिए आपको सोना (Gold) बेचना पड़े तो? सुनकर हैरान हो रहे हैं, तो आपको बता दें कि हम सच कह रहे हैं।
जी हां, रंगों की दुनिया में नीले रंग का इतिहास न सिर्फ शाही, बल्कि चौंकाने वाला भी रहा है। एक दौर ऐसा भी था, जब यह रंग दुनिया का सबसे महंगा पदार्थ हुआ करता था। आज अपने इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उसी दौर की सैर पर ले चलेंगे, जब नीला रंग सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि रईसी की पहचान था।
दुनिया का सबसे महंगा रंग
नीले रंग का इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प है। एक समय ऐसा भी था, जब इसे खरीदना सोना खरीदने से भी ज्यादा महंगा होता था। उस समय इसे 'अल्ट्रामरीन ब्लू' कहा जाता था और यह दुनिया का सबसे महंगा रंग माना जाता है। इसके महंगा होने का सबसे बड़ा कारण इसे बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पत्थर था।
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(Picture Credit- AI Generated)
अफगानिस्तान से आया 'नीला सोना'
नीले रंग की कहानी करीब 6,000 साल पहले पुरानी है, जिसकी शुरुआत अफगानिस्तान की 'सर-ए-संग' खानों से शुरू होती है। वहां लैपिस लाजुली (Lapis Lazuli) नाम का एक पत्थर मिलता था, जिसमें सोने जैसे कण होते थे। उस समय रंग बनाने का प्रोसेस बहुत मुश्किल होता था। रंग बनाने के लिए पत्थरों को तोड़ना, पीसना और फिर तेल के साथ साफ करना पड़ता था। इतनी मेहनत के बाद जो नीला रंग निकलता था, उसकी कीमत आसमान छूती थी।
क्यों कहलाया अल्ट्रामरीन ब्लू?
ये तो हुई नीले रंग के महंगे होने की कहानी, अब बात आती है इसके नाम की। इसके नाम अल्ट्रामरीन ब्लू का एक खास मतलब होता था। समुद्र के पार जब यह रंग व्यापार के जरिए यूरोप के वेनिस पहुंचा, तो वहां के लोगों ने इसे 'ओल्ट्रेमारे' (Oltremare) नाम दिया। इसका मतलब 'समुद्र के पार' होता है। चूंकि यह रंग बहुत दूर से आता था और रास्ते में कई जगह टैक्स लगता था, इसलिए वहां पहुंचते-पहुंचते भी इसकी कीमत काफी बढ़ जाती थी।
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(Picture Credit- AI Generated)
रईसी की पहचान बन गया ब्लू
सोने से भी ज्यादा महंगा होने की वजह से यह रंग रईसी की पहचान बन गया था। अपने बनने की प्रोसेस के अलावा यह रंग अपनी खासियत की वजह से भी महंगा था। दरअसल, इस रंग की खासियत थी कि बाकी रंग की तुलना में अल्ट्रामरीन हमेशा चमकदार रहता था। माना जाता है कि इसकी ऊंची कीमत की वजह से माइकलएंजेलो जैसे बड़े कलाकार भी अपनी पेंटिंग अधूरी छोड़ देते थे, क्योंकि उनके पास इतना महंगा रंग खरीदने के पैसे नहीं थे।
बाद में ढूंढा गया सस्ता विकल्प
19वीं सदी तक आते-आते यह रंग इतना महंगा हो गया कि कलाकारों के लिए इसे खरीदना मुश्किल हो गया था। ऐसे में साल 1826 में फ्रांस के एक केमिस्ट जीन-बैप्टिस्ट गुइमेट ने इसका हल निकाला। उन्होंने लैब में केमिकल को मिलाकर बिल्कुल वैसा ही नीला रंग तैयार कर लिया और इसे 'फ्रेंच अल्ट्रामरीन' नाम दिया गया। अच्छी बात यह थी यह रंग असली पत्थर वाले रंग के मुकाबले हजारों गुना सस्ता था।

(Picture Credit- AI Generated)
आज भी सबसे महंगा है यह रंग
आप सोच रहे होंगे कि आज तो ब्लू रंग सस्ते दामों में मिल जाता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज बाजार में हम जो ब्लू पेंट खरीदते हैं, वह लैब में बना सिंथेटिक रंग होता है। अगर आज भी आप असली 'लैपिस लाजुली' पत्थर से बना पेंट खरीदेंगे, तो वह दुनिया के सबसे महंगे पेंट्स में से एक है। इसके असली रंग की एक छोटी ट्यूब (37ml) की कीमत करीब 25,000 रुपये तक होती है, जबकि सिंथेटिक वाली सिर्फ कुछ सौ रुपए में मिल जाती है।
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