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    इस देश के पास है दुनिया के सभी पांडा का मालिकाना हक, जानिए क्या है 'पांडा डिप्लोमेसी' और इसके नियम

    Updated: Thu, 29 Jan 2026 04:16 PM (IST)

    जापान ने अपने दो आखिरी जायंट पांडा चीन वापस भेज दिए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हुआ है? इसका जवाब चीन की पांडा डिप्लोमेसी में छिपा है। दरअस ...और पढ़ें

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    क्या है पांडा डिप्लोमेसी? (Picture Courtesy: Freepik)

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हाल ही में आपने खबर देखी होगी की जापान के आखिरी दो पांडा (Panda) चीन वापस आ गए हैं। इसके बाद कई लोगों के मन में सवाल आया होगा कि ऐसा क्यों? आपको बता दें कि ये दोनों पांडा चीन के ही थे और अब 50 साल बाद फिर से अपने घर लौटे हैं। 

    सिर्फ जापान ही नहीं, अगर आपने दुनिया के किसी भी चिड़ियाघर में पांडा देखा होगा, तो हो सकता है उस देश ने उसे चीन से ही उधार लिया हो। जी हां, दुनिया के सभी पांडा पर चीन का ही मालिकाना हक है। लेकिन ऐसा क्यों? दरअसल, इसके पीछे की वजह है चीन की पांडा डिप्लोमेसी। दरअसल, ये प्यारे और मासूम जीव अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का बेहद अहम हिस्सा हैं। आइए जानें इस बारे में। 

    Panda (1)

    (Picture Courtesy: Freepik)

    क्या है पांडा डिप्लोमेसी?

    पांडा डिप्लोमेसी (Panda Diplomacy) चीन की सॉफ्ट पावर रणनीति का एक हिस्सा है। इसके तहत चीन दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने, विश्वास बढ़ाने और दोस्ती का संकेत देने के लिए पांडा को उपहार या लोन के रूप में भेजता है।

    इसकी शुरुआत सदियों पहले हुई थी। माना जाता है कि 7वीं शताब्दी में तांग राजवंश ने जापान को दो पांडा दिए थे। आधुनिक दौर में भी चीन पांडा का इस्तेमाल अपनी कूटनीति के लिए करता आया है। 1957 में चीन ने अपने पहले ‘पांडा राजदूत’ सोवियत यूनियन को तोहफे में दिए। सोवियत यूनियन के अलावा, चीन ने और भी सोशलिस्ट देशों को पांडा तोहफे के रूप में दिए थे। 

    हालांकि, यह चर्चा में 1972 में आया जब चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की यात्रा के बाद अमेरिका को भी दो पांडा उपहार में दिए और तब से, चीन पांडा का इस्तेमाल उन देशों के साथ व्यापारिक समझौते या रणनीतिक साझेदारी को सील करने के लिए करता है जिनसे वह बेहतर संबंध चाहता है।

    Panda

    (Picture Courtesy: Freepik)

    सभी पांडा चीन के क्यों हैं?

    तकनीकी और कानूनी रूप से, दुनिया के लगभग हर पांडा का मालिक चीन है। 

    • उपहार से लोन तक का सफर- 1984 तक चीन पांडा को उपहार के रूप में देता था। लेकिन पांडा की घटती संख्या को देखते हुए चीन ने अपनी नीति बदल दी। अब, पांडा उपहार में नहीं दिए जाते, बल्कि लोन पर दिए जाते हैं।
    • सख्त रेंटल एग्रीमेंट- जब चीन किसी देश को पांडा भेजता है, तो वह एक रेंटल एग्रीमेंट साइन करता है। एक पांडा के लिए विदेशी चिड़ियाघरों को चीन को सालाना 5 लाख से 10 लाख डॉलर तक की फीस देनी पड़ती है। यह पैसा चीन में पांडा संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास को बचाने के काम आता है।
    • जन्म से ही चीनी नागरिक- इस डिप्लोमेसी की सबसे हैरान करने वाली शर्त यह है कि अगर विदेश में रह रहे पांडा के जोड़े से कोई शावक पैदा होता है, तो वह भी चीन की संपत्ति माना जाता है। एग्रीमेंट के अनुसार, शावक के कुछ साल का होते ही (आमतौर पर 2 से 4 साल के बीच) उसे चीन वापस भेजना जरूरी होता है।
    Panda (2)
    (Picture Courtesy: Freepik)

    पांडा डिप्लोमेसी का महत्व

    चीन हर किसी को पांडा नहीं देता। पांडा का मिलना इस बात का संकेत होता है कि चीन उस देश के साथ अपने रिश्तों को बहुत महत्व दे रहा है। पांडा डिप्लोमेसी दुनिया की सबसे सफल और आकर्षक कूटनीतिक रणनीतियों में से एक है। यह चीन को एक दोस्ताना छवि बनाने में मदद करती है और साथ ही इन दुर्लभ जानवरों के संरक्षण के लिए पैसा भी जुटाती है।

    हालांकि, यह एक महंगा सौदा है लेकिन दुनिया भर के चिड़ियाघर इन बांस खाने वाले जानवरों को अपने यहां रखने के लिए कतार में रहते हैं, क्योंकि ये पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र होते हैं।

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