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    Dhadak 2 में दिखाया जाएगा जातिवाद का मुद्दा! सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी ने बताई अंदर की बात

    Updated: Sun, 27 Jul 2025 07:29 AM (IST)

    सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी ने धड़क 2 में जातिवाद के मुद्दे को उठाने की बात की। सिद्धांत ने कहा कि यह फिल्म जड़ों से जुड़ी है और उन्हें कुछ अलग करने का मौका मिला। तृप्ति ने कहा कि फिल्मों के जरिए लोगों को शिक्षित किया जा सकता है और जातिवाद के खिलाफ जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

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    धड़क 2 फिल्म का पोस्टर (Photo Credit- Instagram)

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। करीब आठ साल पहले आई मराठी फिल्म ‘सैराट’ की रीमेक ‘धड़क’ अंतरजातीय विवाह और सामाजिक भेदभाव पर आधारित थी। अब इस फ्रेंचाइज की अगली फिल्म ‘धड़क 2’ है। इस फिल्म में केंद्रीय भूमिका में सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी हैं। दोनों कलाकारों ने फिल्म को लेकर खास बातचीत की स्मिता श्रीवास्तव के साथ...

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    आपने कहा था कि छोटे शहरों की कहानियां नहीं मिलतीं?

    सिद्धांत: हमारा गांवों का देश है। हर गांव की अपनी विशिष्टता है। भाषा, संस्कृति अलग है, लेकिन कहीं न कहीं एक तार से जुड़े हुए हैं। वो जो तार है, उसे सिनेमा के जरिए ऊपर लाना, वो मुझे कहीं न कहीं लग रहा था कि काफी समय से नहीं हो पा रहा था। जबकि दक्षिण भारतीय सिनेमा बखूबी कर रहा था। ‘कांतारा’ समेत कई सफल दक्षिण भारतीय फिल्में इसका उदाहरण हैं। कहीं न कहीं मुझे लग रहा था कि ऐसी फिल्में यहां भी हो सकती हैं। उस किस्म की स्क्रिप्ट भी नहीं आ रही थी। अब शायद वो फिल्में बन रही हैं, जो जड़ों से ज्यादा जुड़ी हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि मेरे पास ऐसी स्क्रिप्ट आई। मुझे इस फिल्म में कुछ अलग करने का मौका मिला है।

    यह फिल्म जातिवाद के मुद्दे को उठा रही है

    तृप्ति: बहुत जरूरी है। फिल्मों के जरिए आप बहुत सारे लोगों को शिक्षित कर सकते हैं। फिल्म में एक लाइन भी है जो मेरी पात्र कहती है कि ‘मुझे लगता था कि यह सब सालों पहले या किसी गांव में होता था। पता ही नहीं है कि ऐसी चीजें होती हैं।’ मुझे यकीन है कि मेरी तरह बहुत से लोग हैं जिन्हें पता ही नहीं है कि आम तौर पर लोग किन चीजों से गुजरते हैं या उनके साथ कैसा भेदभाव होता है। मुझे लगता है कि जो लोग इस चीज में यकीन रखते हैं, वो इसे देखें और कुछ सीख पाएं तो वहां पर हमारी जीत होगी।

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    सिद्धांत: मुझे लगता है कि ऐसी कहानियां बनती आई हैं और बनती रहनी चाहिए क्योंकि याद दिलाना जरूरी है। ऐसी फिल्म का चलना या उसे पसंद करना सिर्फ हमारे लिए नहीं बल्कि जिनके बारे में है, जो इससे जुड़े हैं या गुजरे हैं, उनके लिए भी जरूरी है।

    इस इंडस्ट्री में टिके रहने की सबसे बड़ी चुनौती क्या लगती है?

    तृप्ति: (सोचते हुए) मुझे लगता है सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आप स्वयं को आस-पास से डिस्कनेक्ट मत करो क्योंकि यह बहुत आसानी से हो जाता है। आपके चारों तरफ कैमरा और लोग होते हैं। एक मौके पर वह काफी अच्छा लगता है कि यहीं जिंदगी है, लेकिन जब आप वापस कमरे में सोने जाते हैं तो लगता है कि वो जिंदगी नहीं है। इसके अलावा मुझे लगता है कि आप बहुत आसानी से लोकप्रियता में डूब जाते हैं। सफलता को हैंडल करना आसान नहीं। यह बतौर इंसान आपको बहुत आसानी से बदल भी देती है। इसकी समझ आपको होनी चाहिए कि कोई भी चीज लंबे समय तक नहीं टिकती है। बस आपको पता होना चाहिए कि आपकी जड़ें कहां से जुड़ी हैं।

    सिद्धांत: इस इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है हर प्रोजेक्ट के साथ खुद को डिस्कवर करते रहना। अगर आप एक तरह की चीजें करने लगते हैं तो वो आपका मार्केट बन जाता है। फिर आप दबाव में आते हैं कि उस तरह की चीजें ही आपको डिलिवर करनी हैं। उसके अलावा आने वाली पीढ़ी को उम्मीद दीजिए। मेरे लिए यह सारी चीजें महत्व रखती हैं, इसलिए मैं यहां हूं। जैसा कि तृप्ति ने कहा कि प्रसिद्धि के चक्कर में आप अपने आप को खो देते हैं। यह रहेगा या नहीं रहेगा, उसकी गारंटी नहीं है, लेकिन आप जो करने आए थे, वो करते रहिए।

    आस-पास कभी इस तरह का अन्याय होते देखा?

    तृप्ति: मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि आस-पास ऐसी चीजें नहीं देखीं। जब हमें यह फिल्म आफर हुई थी तो शाजिया (फिल्म की निर्देशक) और हम उस दौरान सामने आने वाली ऐसी ही खबरों के बारे में बात करते थे। बचपन में थोड़ा-बहुत दोस्तों से सुना था कि पड़ोस में किसी की शादी है मगर परिवार नहीं गया क्योंकि अंतरजातीय विवाह है, लेकिन पांच-छह साल बाद सब स्वीकार कर लेते हैं। कई मामलों में स्वीकृति नहीं भी होती। उसके परिणाम अलग ही निकलते हैं। हमें नहीं लगता कि प्यार करना कोई गुनाह है।

    सिद्धांत: मुझे लगता है कि रोजमर्रा की जिंदगी में हर इंसान किसी न किसी भेदभाव से गुजरता है, चाहे रंग को लेकर हो या पैसे, जाति, भाषा या कपड़ों को लेकर हो। किसी न किसी किस्म का भेदभाव सबने अपनी जिंदगी में देखा है। मैंने भी अपने आस-पास देखा है। मैं बलिया से हूं, मैं जब इंडस्ट्री में आया था तो हिंदी सीख ही रहा था, अंग्रेजी तो दूर की बात थी। तब एक हीनभावना कहीं न कहीं अंदर आती थी कि यार मैं अंग्रेजी नहीं बोल पा रहा हूं तो जिंदगी में आगे कैसे बढूंगा। फिर समझ आया कि ऐसा नहीं है। ऐसे कई अनुभवों को लेकर अपने पात्रों में डालने की कोशिश की है। फिल्म का मुद्दा भी यही है कि डरिए मत, लड़िए।

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