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    200 साल पुराना गीत जो 'तवायफ' की नाकाम मोहब्बत का दर्द करता है बयां, रेडियो के जरिए घर-घर में उठी विरह की टीस

    Updated: Mon, 25 May 2026 10:19 PM (IST)

    200 साल पुराना वो गीत जो आज भी कल्ट बना हुआ है। यह गीत विरह, टीस और साहस को बयां करता था। इस गीत को हर दौर में जिंदा रखा गया। ...और पढ़ें

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    गीत में छुपी विरह की टीस। फोटो क्रेडिट- एक्स

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    एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। गीत-संगीत सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं होते हैं, हर गीत एक कहानी बयां करती है। गीत के हर बोल के पीछे दिल का हाल छुपा होता है। 200 साल पहले एक ऐसा ही लोकगीत बना था जिसमें विरह की टीस थी। इस गीत के पीछे एक इतिहास था जिसे अलग-अलग अंदाज में पेश किया गया।

    कभी युद्ध में भेजे जाने वाले पतियों की बीवियों के दर्द के रूप में तो कभी तवायफों की नाकाम मोहब्बत के रूप में। इस आर्टिकल में हम उस गीत के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे 200 साल बाद फिर से नए अंदाज में जिंदा कर दिया गया है।

    200 साल पुराना लोकगीत

    यह गीत है 'कचौड़ी गली सून कैला बलमू' (Kachauri Gali Soon Kaila Balamu) जिसे हाल ही में कोक स्टूडियो भारत ने जारी किया है और यह आते ही छा गया है। हालांकि, इस भोजपुरी लोकगीत का इतिहास 200 साल पुराना है।

    विरह की टीस में उपजा गीत

    'कचौड़ी गली' गीत बनारस क्षेत्र की लोक दादरा शैली की कजरी गीत है। इस गीत का कनेक्शन 1824-1826 के दौर में जबरन एंग्लो-बर्मी युद्ध में भैजे गए मजदूरों, सैनिकों और आम पुरुषों से जोड़ा जाता है। ज्यादातर पूर्वांचल से लोगों को युद्ध में भेजा गया जिनमें से कई लोग कभी वापस नहीं आए। पतियों की आस में बैठीं पत्नियों के दर्द से इस लोकगीत का निर्माण हुआ।

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    गीत से तवायफों ने बयां किया दर्द

    कहा जाता है कि इस लोकगीत का कनेक्शन बनारस की तवायफों से भी जुड़ा है। इस गीत में संगीत की संरक्षक माने जाने वालीं तवायफ की नाकाम मोहब्बत का दर्द भी छुपा था। इतना ही नहीं, तवायफ ने इस गीत को प्रतिरोध में भी गाया। इतिहासकारों के मुताबिक, तवायफों ने देश की आजादी के लिए आवाज उठाई। अपने काम के पैसे आंदोलन में लगाया। क्रांतिकारियों को पनाह भी दी गई और जब वो प्रेमी अंग्रेजों के द्वारा पकड़ कर ले जाए थे तो यह गीत प्रतिरोध की आवाज बन गई। 

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    Rasoolan Bai

    रेडियो के जरिए घर-घर में हुआ मशहूर

    समय के साथ गीत को घर-घर में पहुंचाया गया और इसका सबसे बड़ा योगदान रसूलन बाई, बड़ी मोतीबाई और सिद्धेश्वरी देवी को जाता है। उन्होंने ग्रामोफोन और रेडियो के जरिए इस गीत को घर-घर में पहचान दिलाई। इस गीत को बाद में भोजपुरी गायिकाओं मालिनी अवस्थी और मैथली ठाकुर ने भी गाया। आज भले ही यह गीत ज्यादा सुना न गया हो, लेकिन इसके नए वर्जन ने हर ओर गर्दा उड़ा दिया है।

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