60 साल पहले बिहार की 'नौटंकी' पर बनी फिल्म, ब्लॉकबस्टर थे गाने; Raj Kapoor की फ्लॉप मूवी को मिला था नेशनल अवॉर्ड
साल 1966 में आई राज कपूर और वहीदा रहमान की एक फिल्म नौटंकी पर बनी थी। बड़ी बात यह है कि ये फिल्म फ्लॉप हुई थी पर फिर भी इसने इतिहास रचा था। ...और पढ़ें

'नौटंकी' पर बनी थी राज कपूर की वो फिल्म

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई ऐसी फिल्में बनी जिनके बनने के पीछे की कहानी दिलचस्प रही है। भले ही आज फिल्मों में सीक्वल, प्रीक्वल या फिर रीमेक जैसी फिल्में आती हों, लेकिन एक वक्त था जब गांव-कस्बों से कहानियां निकलती थीं और पर्दे पर पहुंचती थीं। आज बात एक ऐसी नौटंकी की, जिस पर फिल्म बनी और हिट हुई।
नौटंकी पर बनी थी वो फिल्म
दरअसल आज जिस फिल्म की हम बात कर रहे हैं, उस फिल्म का नाम है तीसरी कसम। जी हां, साल 1966 में आई फिल्म 'तीसरी कसम' (Teesri Kasam) आई और इस फिल्म में मुख्य किरदारों में राज कपूर (Raj Kapoor) और वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) नजर आए थे। फिल्म की चर्चा असल में इसलिए भी ज्यादा हुई, क्योंकि यह फिल्म एक नौटंकी पर बनी थी।
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जी हां, फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर यह फिल्म आधारित थी। इस फिल्म को महान गीतकार शैलेंद्र ने अपनी जिंदगी की जमापूंजी लगाकर बनाया था। गीतकार शैलेंद्र ने अपनी जिंदगी की सारी कमाई इस फिल्म को बनाने में लगा दी थी। हालांकि फिल्म वह कमाल करके नहीं जिसकी उम्मीद थी।
क्या थी फिल्म की कहानी?
असल में फणीश्वरनाथ रेणु की जिस किताब पर यह फिल्म बनी थी, उसी की कहानी को फिल्म में पिरोया गया था। फिल्म की कहानी उन तीन कसमों पर होती थी, जो राज कपूर लेते हैं। फिल्म की कहानी बिहार के एक बेहद सीधे-सादे और मासूम बैलगाड़ी चलाने वाले हीरामन (Raj Kapoor) और नौटंकी में डांस करने वाली हीराबाई (Wahida Rehman) के ऊपर बेस्ड थी।
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जब हीरामन हीराबाई को अपनी बैलगाड़ी में ले जाता है तो दोनों को प्यार हो जाता है। यह प्यार बेहद पवित्र होता है, हीरामन के लिए हीराबाई उसी पवित्रता के समान थीं।
हालांकि लोग हीराबाई में नौटंकी में नाचने वाली तवायफ के समान समझते हैं। इसके बाद हीरामन का दिल दुखी हो जाता है और वह कसम खाता है कि, कालाबाजारी का सामान अपनी बैलगाड़ी में नहीं लादेगा, गाड़ी में बांस नहीं ले जाएगा जिसके चलते उसे पहले नुकसान हुआ था और तीसरी कसम यह कि वो नौटंकी में नाचने-गाने वाली को वो अपनी बैलगाड़ी में नहीं बिठाएगा। बस इसके बाद फिर क्या होता है, इसी कहानी फिल्म में दिखाई गई है।
फ्लॉप फिल्म, हिट गाने और मिला नेशनल अवॉर्ड
यह पहली बार था जब राज कपूर और वहीदा रहमान ने एक साथ काम किया था। फिल्म को बासु भट्टाचार्य ने डायरेक्ट किया था और गीतकार शैलेंद्र ने इसे बनाया था।
इस फिल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने तैयार किया था। सजन रे झूठ मत बोलो, पान खाये सैंया हमारो.. ऐसे कई गाने थे जो हिट रहे। फिल्म के गानों को मुकेश, मन्ना डे और आशा भोसले ने आवाज दी थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रही थी।
दरअसल उस दौर के दर्शकों को राज कपूर की 'लार्जर दैन लाइफ' वाली फिल्मों में देखने की आदत थी। वो राज कपूर को ऐसे किसी गांव वाले लड़के के किरदार में देखना ही नहीं चाहते थे। हालांकि फिल्म को क्रिटिक्स ने काफी पसंद किया और बाद में फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Award for Best Feature Film) मिला।
फिल्म की शूटिंग बिहार समेत कई दूसरे इलाकों में हुई। यहां तक कि फिल्म कुछ हिस्से मध्यप्रदेश में भी शूट किए गए थे। भले ही फिल्म फ्लॉप रही हो, लेकिन फिल्म को कल्ट क्लासिक फिल्मों में शुमार किया जाता है।