300 फिल्में, पंजाबी सिनेमा का 'अमिताभ', पाई-पाई को हुआ मोहताज; कलेजा चीर देगी महाभारत के 'इंद्रदेव' की कहानी
'पंजाबी सिनेमा का अमिताभ' कहे जाने वाले सतीश कौल ने 'महाभारत' में इंद्र का किरदार निभाया, लेकिन उनका अंत ऐसा होगा, ये किसी ने नहीं सोचा था। ...और पढ़ें

रुला देगी 'महाभारत' के इंद्र की कहानी (फोटो- यूट्यूब/सोशल मीडिया)

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। कहते हैं कि सिनेमा शौहरत का सिक्का ज्यादा दिनों तक नहीं चलता है। यहां आज कोई अर्श पर है तो कोई फर्श पर है। हालांकि जितना स्टारडम और पैसा आज के सितारों के पास है, ऐसा नहीं है कि 70 और 80, 90 के दशक में वैसी चमक-दमक उस दौर में सितारों के पास नहीं थी।
हालांकि बदलते दौर में ये सितारे नहीं बदल पाए और किस्मत की ठोकर ऐसी लगी कि अंतिम समय में पाई-पाई को भी मोहताज हो गए। आज कहानी ऐसे ही एक सितारे की...
सिनेमा में आए सतीश कौल
आज सितारे का जिक्र हम कर रहे हैं, वह कोई और नहीं बल्कि सतीश कौल थे। सतीश कौल का जन्म 8 सितंबर 1946 को कश्मीर में हुआ था। बचपन से ही सतीश को कला के प्रति लगाव था। उनके पति कश्मीर के जाने-माने कवि थे। ऐसे में उन्हें कला की परख से अच्छे से थी।
उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए FTII में दाखिला लिया, जहां वो जया बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और डैनी जैसे दिग्गजों के बैचमेट रहे। इसके बाद धीरे-धीरे वो सिनेमा की तरफ बढ़ने लगे और आखिरकार उन्होंने पंजाबी फिल्मों में काम करना शुरू किया।
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पंजाबी सिनेमा के 'अमिताभ बच्चन' कहे जाते थे सतीश
जिस स्टारडम को पाने के लिए अच्छे-अच्छे लोग तरस जाते हैं, वह स्टारडम सतीश कौल के पास था। सतीश कौल पंजाबी सिनेमा के बड़े सुपरस्टार थे। सतीश कौल ने 1970 के दशक में बॉलीवुड में कदम रखा।
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उन्होंने 'कर्मा', 'राम लखन', 'प्यार तो होना ही था' और 'आंटी नंबर 1' जैसी लगभग 300 फिल्मों में काम किया, लेकिन उनकी असली पहचान बनी पंजाबी सिनेमा से।
उन्होंने पंजाबी फिल्मों को एक नया आयाम दिया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें 'पंजाब का अमिताभ बच्चन' कहा जाने लगा। उन्होंने 'जट पंजाबी', 'शेरा दे पुत्त शेर', 'मौला जट' और 'सस्सी पुन्नू' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं।
'महाभारत' से मिली पहचान
बी.आर. चोपड़ा (B.R. Chopra) की महाभारत (Mahabharat) में यूं तो कई किरदार रहे, लेकिन इस शो में 'इंद्र' का किरदार निभाकर मशहूर हुए थे सतीश कौल (Satish Kaul)। जी हां, वही सतीश कौल जिन्हें आपने इंद्र के किरदार में इस शो में देखा होगा।
हालांकि नाम से भले ही उन्हें कम लोग जान पाए हों, लेकिन उन्होंने अपने काम से बड़ी पहचान बनाई। सतीश कौल ने महाभारत में इंद्र देव का किरदार निभाया था और इस शो के बाद उन्हें बड़ी लोकप्रियता हासिल हुई। हालांकि सतीश कौल का स्टारडम महज महाभारत तक ही सीमित नहीं था बल्कि वो पंजाबी सिनेमा के भी बड़े स्टार रहे।
पत्नी ने साथ छोड़ा फिर आई आर्थिक तंगी
सतीश कौल ने मुश्किलों का सफर काफी पहले से देखा था। सतीश कौल की पत्नी शादी के कुछ साल बाद उनसे अलग हो गई। पत्नी बेटे को लेकर उन्हें छोड़कर चली गईं। इसके बाद सतीश कौल ने सालों तक अकेले ही अपना जीवन काटा। साल 2011 में सतीश कौल मुंबई छोड़कर लुधियाना चले गए और यहां आकर उन्होंने एक एक्टिंग स्कूल शुरू किया।
उन्हें लगा शायद ये स्कूल चल जाएगा पर अफसोस जो बची-कुची रकम थी वो इसमें डूब गई। सबकुछ घाटे में चला गया और सतीश कौल आर्थिक तंगी का शिकार हो गए। इसके बाद साल 2015 में उनका कूल्हा टूट गया। वक्त की ऐसी मार कि अब तो वो बिस्तर पर आ गए और ढाई साल बिस्तर पर ही रहे।
पाई-पाई को हुए मोहताज
सतीश कौल की जिंदगी में अब सबकुछ बिखर गया। शरीर ने साथ देना छोड़ दिया। बीमारियों से वह घिरते चले गए। करीब ढाई साल तक वह बिस्तर पर रहे। आर्थिक स्थित इतनी खराब हुई कि उन्हें अपना घर बेचना पड़ा। उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे। इसके बाद वह लुधियाना के एक वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हुए।
सोशल मीडिया पर उनकी बदहाली की तस्वीरें वायरल हुईं। जिसके बाद कुछ स्थानीय कलाकारों ने उनकी मदद भी की। एक इंटरव्यू में खुद आकर उन्होंने अपनी इस स्थित का जिक्र किया और सोशल मीडिया के जरिए लोगों से मदद मांगी। इसके बाद कोरोना काल ने उनसे सब छीन लिया।
ना तो दवाईयों के लिए पैसे रहे और ना ही राशन खरीदने के लिए कुछ था। जैसे-तैसे गुजर-बसर करते रहे। आखिरकार कोरोना काल में 10 अप्रैल 2021 को 74 वर्ष की उम्र में सतीश कौल का निधन हो गया।
सिनेमा में जो सितारा कभी स्टारडम के शिखर पर रहा, अंतिम वक्त में उनकी हालत ऐसी हो गई कि वो पाई-पाई को मोहताज हो गए। एक वक्त शाह रुख खान ने उनकी तारीफ की और कहा था कि उन्होंने सतीश कौल की फिल्म की शूटिंग देखते थे और वह उनके लिए प्रेरणा थे।
सतीश कौल की कहानी ग्लैमर की दुनिया के उस स्याह सच को दिखाती है, जहां उगते सूरज को तो हर कोई सलाम करता है, लेकिन ढलती शाम में अक्सर लोग अकेले ही रह जाते हैं।
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