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    पर्दे पर बने 'विष्णु-राम', घरों में पूजते थे लोग! 21 साल तक रहे नजरबंद; सिनेमा के पहले 'धार्मिक सुपरस्टार' की कहानी

    Updated: Fri, 15 May 2026 06:54 PM (IST)

    50 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा में एक ऐसे एक्टर भी आए जिन्हें 'धार्मिक सुपरस्टार' कहा जाता था लोग उन्हें असल में भगवान मानते थे। ...और पढ़ें

    वो एक्टर जो बना 'धार्मिक सुपरस्टार'         (फोटो- एक्स)

    वो एक्टर जो बना 'धार्मिक सुपरस्टार' (फोटो- एक्स)

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    एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग वो था जब पर्दे पर कलाकार जिस किरदार में ढलते थे, लोग उसे ही सच मान लेते थे। उस दौर में ना तो इंटरनेट की भागदौड़ थी और ना ही सोशल मीडिया का शोर था। यह वो दौर था जब सिनेमाई कहानियां आम जीवन से जुड़ाव रखती थीं।

    उस दौर में जब लोग पर्दे पर भगवान को देखते तो हाथ जोड़ लेते थे, उसी दौर में सिनेमा का एक ऐसा स्टार आया जिसे आम सुपरस्टार नहीं बल्कि 'धार्मिक सुपरस्टार' कहा गया। आज कहानी उसी स्टार की जिसने पर्दे पर भगवान के किरदारों को जीवंत कर हर किसी का दिल जीता...

    कौन थे सिनेमा के पहले धार्मिक सुपरस्टार?

    आज जिस सुपरस्टार की हम बात कर रहे हैं, असल में वह कोई और नहीं बल्कि 50 और 60 के दशक के मशहूर अभिनेता महिपाल थे, जिनका पूरा नाम था महिपाल सिंह भंडारी। इनका जन्म 24 नवम्बर 1919 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ। बचपन में ही इनकी मां का निधन हो गया था और इसके बाद इन्हें इनके दादाजी ने पाला।

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    महिपाल के दादाजी खूब कविताएं लिखा करते थे, तो ऐसे में उन्हीं से इसकी शिक्षा महिपाल ने प्राप्त की। महिपाल बचपन से ही साहित्य और अभिनय का शौक था। वह एक पढ़े-लिखे कलाकार थे और अपनी उर्दू-हिंदी की शुद्धता के लिए जाने जाते थे।

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    40 के दशक में सिनेमा में रखा कदम

    जब महिपाल बड़े हुए तो उन्होंने सिनेमा का रुख किया और वह 1940 के दशक में मुंबई आए। उनकी पहली फिल्म 1942 में नजराना थी। दरअसल ये देश की पहली मारवाड़ी फिल्म थी और इस फिल्म को बनाया जा रहा था तो उस दौर में ऐसी फिल्में कम बनती थीं। अलग-अलग भाषाओं पर तब फिल्में बनना शुरू ही हुई थीं। इसी बीच जब फिल्म के लिए महिपाल को चुना गया तो उनका परिवार इसके खिलाफ था।

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    परिवार ने कहा कि अब भंडारी खानदान के लड़के तवायफों के साथ नाचेंगे मगर महिपाल ने दादाजी को मना लिया और दादाजी मान गए। इस तरह से देश की पहली मारवाड़ी फिल्म नजराना में महिपाल ने काम किया, जो हिंदी में भी बनी। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्म कंपनी ने 125 रुपए प्रति महीना पर रख लिया।

    हालांकि उस दौर में ये रकम बड़ी थी। इसके बाद उन्होंने वी.शांताराम की फिल्म के लिए टाइटल गाना भी लिखा। इसके बाद वह कई स्टंट फिल्मों में नजर आए। हालांकि इन स्टंट फिल्मों से उन्हें वो स्टारडम नहीं मिला।

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    मीना कुमारी के साथ फिल्म, बने भगवान गणेश

    'पारसमणि', 'जबक', 'कोबरा गर्ल', 'जंतर मंतर' इन स्टंट फिल्मों में वह दिखे। महिपाल का करियर उस दौर में चल तो रहा था, लेकिन कुछ बड़ा नहीं हो रहा था। इस दौर में वो काफी महीनों तक घर पर ही रहे। आखिरकार उन्हें मीना कुमारी के साथ एक फिल्म में काम करने का मौका मिला।

    श्री गणेश महिमा नाम की फिल्म में महिपाल ने काम किया तो उन्हें लगा नहीं था कि उनकी किस्मत बदल जाएगी। इस फिल्म में वह मीना कुमारी के अपोजिट भगवान श्री गणेश के किरदार में नजर आए। फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और उनका करियर चल पड़ा। इसके बाद वह साल 1959 में वी. शांताराम की नवरंग में दिखे।

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    ये फिल्म उनके करियर की सबसे बड़ी हिट रही। फिल्म के गाने 'आधा है चंद्रमा रात आधी' और 'अरे जा रे हट नटखट' आज भी कल्ट गाने हैं। 50 और 60 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। इसके बाद तो उन्होंने 'सम्पूर्ण रामायण', वीर हनुमान, जय संतोषी मां, 'गणेश चतुर्थी', और 'महाभारत' जैसी अनगिनत फिल्मों में उन्होंने देवी-देवताओं के किरदार निभाए।

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    सच में भगवान समझने लगे लोग

    महिपाल ने पर्दे पर अपनी यूएसपी ऐसे ही किरदारों में बना ली। वह ज्यादातर फिल्मों में या तो भगवान या भक्त के किरदार में नजर आए। उन्होंने करीब 30-35 ऐसी फिल्में की, जिनमें उनके ऐसे ही किरदार थे। उस दौर में महिपाल और अनीता गुहा की जोड़ी को परदे पर 'राम-सीता' का साक्षात रूप माना जाता था।

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    महिपाल (Actor Mahipal) ने इतनी ज्यादा धार्मिक फिल्मों में काम किया कि लोग उन्हें सच में भगवान मानने लगे थे। लोग जब उन्हें देखते तो चप्पल-जूते उतारकर फिल्में देखते। यहां तक कि लोग उनके सामने माथा टेक लिया करते थे। उनके किरदारों की छवि लोगों के दिलों में इस कदर बस गई थी।

    21 साल में सिर्फ एक बार आए सामने

    महिपाल ने अपने करियर में आखिरी फिल्म अमर ज्योति में काम किया जो साल 1986 में रिलीज हुई थी। इसके बाद वो सिनेमा से दूर हो गए। महिपाल की कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू उनका 'एकांतवास' था।

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    बताया जाता है कि 1984 से लेकर 2005 (उनकी मृत्यु तक) के बीच वह सार्वजनिक रूप से लगभग कभी नजर नहीं आए। बताया जाता है कि वह इन सालों के बीच सिर्फ एक इंटरव्यू और कार्यक्रम के लिए सामने आए थे। 15 मई 2005 को उनका निधन हो गया।

    अलीबाबा और 40 चोर, अलादीन और जादुई चिराग, अलीबाबा का बेटा, सुनहरी नागिन से लेकर स्टंट और धार्मिक फिल्मों में वो दिखे। करियर में उन्होंने करीब 120 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।

    मीना कुमारी, संध्या, माला सिन्हा, निरुपा रॉय जैसी बड़ी अभिनेत्रियों के साथ उन्होंने स्क्रीन शेयर किया। धार्मिक फिल्मों के वो पहले सुपरस्टार रहे, लेकिन जाने के बाद वह अपने पीछे महज यादें छोड़कर चले गए, जो हर सिनेप्रेमी के दिल में हमेशा के लिए बसी रहेंगीं।