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    पाकिस्तान था इनके संगीत का मुरीद, लता दीदी ने मांगी थी 'मन्नत'; कल्ट गाने देने वाले संगीतकार का दर्दनाक था अंत!

    Updated: Mon, 08 Jun 2026 01:33 PM (IST)

    Old Bollywood Music Composer: हिंदी सिनेमा में एक ऐसे संगीतकार रहे, जिनके एक गीत ने पाकिस्तान में तहलका मचाया था। ...और पढ़ें

    वो संगीतकार जिसका दर्दनाक था अंत!

    वो संगीतकार जिसका दर्दनाक था अंत!

    HighLights

    1. सिनेमा के 'वसंत' की अनकही दास्तां

    2. पाकिस्तान भी जिनके गीत का हुआ मुरीद

    3. लिफ्ट में दम घुटने से गई थी जान

    एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई संगीतकार ऐसे हुए, जिन्होंने अपने करियर में कई यादगार और अनमोल तोहफे दिए। सिनेमा के एक ऐसे ही संगीतकार हुए, जिन्होंने दर्शकों को और श्रोताओं को वो संगीत परोसा, जिसके दम पर फिल्में तक हिट हुईं।

    यहांतक कि उनके संगीत की विरासत ऐसी रही कि लोगों ने उन्हें खूब प्यार दिया पर इनकी कहानी का अंत इतना दर्ददनाक था कि सुनने वाले की रूह तक कांप गई।

    कौन थे वो संगीतकार?

    आज जिस संगीतकार की हम बात कर रहे हैं, असल में वह कोई और नहीं बल्कि वसंत देसाई (Vasant Desai) थे। वही वसंत देसाई जिन्होंने 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' जैसा कल्ट गाना दिया। वसंत देसाई का जन्म 9 जून 1912 को महाराष्ट्र के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।

    उनका असली नाम आत्माराम देसाई था, लेकिन वसंत देसाई नाम से वह जाने गए। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत और अभिनय की तरफ था। उनके नाना भास्कर पारुलेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। ऐसे में भजन-कीर्तन से वह बचपन से ही रूबरू रहे और संगीत हमेशा उनके इर्द-गिर्द ही रहा। हालांकि, उनके पिता चाहते थे कि वह व्यापार या नौकरी करें। लेकिन संगीत की धुन उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही थी।

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    सिनेमा में आकर बनाई पहचान

    वसंत देसाई (Vasant Desai Songs) कभी संगीतकार नहीं बनना चाहते थे। असल में उनकी रुचि संगीत से ज्यादा अभिनय की तरफ थी। 1920 के दशक के आखिरी सालों में वह घर छोड़कर कोल्हापुर आ गए, जो उस समय कला का एक बड़ा केंद्र था। यहां वह मशहूर 'प्रभात फिल्म कंपनी' से जुड़ गए। बहुत कम लोग जानते हैं कि वसंत देसाई ने सिनेमा में कदम एक संगीतकार के रूप में नहीं, बल्कि एक अभिनेता और गायक के रूप में रखा था।

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    उन्होंने प्रभात फिल्म्स की मूक और शुरुआती बोलती फिल्मों जैसे 'अयोध्येचा राजा' और फिर कई छोटे-मोटे रोल किए और कोरस में गाया। मराठी सिनेमा से वो खूब जाने-पहचाने गए। बाद में उन्हें लगा कि शायद संगीत की उनकी असली पहचान है। इसके बाद उन्होंने उस्ताद आलम खान और उस्ताद इनायत खान से संगीत की शिक्षा ली।

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    वी.शांताराम संग जमी जोड़ी

    जब फिल्ममेकर वी. शांताराम (V. Shantaram) ने 'प्रभात फिल्म्स' छोड़कर अपनी नई कंपनी 'राजकमल कलामंदिर' बनाई, तो वह वसंत देसाई को अपने साथ ले आए। यहीं से वसंत देसाई के करियर का वह दौर शुरू हुआ जिसने उन्हें अमर बना दिया। साल 1943 में उन्होंने फिल्म शकुंतला में काम किया और सोलो म्यूजिक कंपोजर के तौर पर उनकी फिल्म उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई और फिल्म के गानों ने धूम मचा दी।

    इसके बाद 1946 में डॉ. कोटनीस की अमर कहानी और फिर साल 1955 में जनक जनक पायल बाजे में काम किया। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस फिल्म का संगीत मील का पत्थर साबित हुआ। इसके लिए उन्हें बहुत सराहना मिली। साल 1959 में फिल्म नवरंग, जिसमें 'आधा है चंद्रमा रात आधी...' जैसे सदाबहार गाने खूब सुने गए।

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    पाकिस्तान में बजा वसंत देसाई का गीत

    साल 1957 की फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' के एक गीत ने वसंत देसाई के करियर को अलग ही पहचान दे डाली। इस फिल्म में संगीत वसंत देसाई ने ही दिया था। इस फिल्म का प्रार्थना गीत "ऐ मालिक तेरे बंदे हम...' (Ae Maalik Tere Bande Hum) आज भी भारत के हजारों स्कूलों और जेलों में सुबह की प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। यह गीत इतना पसंद किया जाता है कि इसे कई मौकों पर पाकिस्तान के स्कूलों में प्रार्थना के रूप में भी गाया जा चुका है।

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    इस गाने को लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar Songs) ने आवाज दी थी और इस गाने को पाकिस्तान में खूब सुना गया। यहां तक कि आज भी यह गाना वहां बजता है। इसके अलावा भी वसंत देसाई ने वी.शांताराम की कई फिल्मों में संगीत दिया। उनका संगीत कहानी में जान भर देता था।

    साल 1964 में आई फिल्म 'यादें' सिर्फ एक अभिनेता के ऊपर थी और फिल्म की कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द और अकेलेपन पर बेस्ड थी। फिल्म में वसंत देसाई का बैकग्राउंड म्यूजिक इतना कमाल था कि इसकी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त करता दिखा, जिसे दर्शकों ने भी खूब पसंद किया।

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    लता दीदी ने मांगी थी 'मन्नत'!

    कहा जाता है कि लता दीदी के साथ उनका बेहद सम्मानजनक रिश्ता रहा और लता दीदी ने एक बार उनके लिए मन्नत तक मांगी थी। दरअसल फिल्म 'जनक जनक पायल बाजे' के समय लता जी बहुत बीमार हो गई थीं। डॉक्टरों ने उन्हें गाने से मना किया था।

    लेकिन वसंत देसाई चाहते थे कि फिल्म का टाइटल ट्रैक सिर्फ लता जी ही गाएं। लता जी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने इस गाने को ठीक से गाने के लिए मन्नत मांगी थी, क्योंकि वह वसंत राव को निराश नहीं करना चाहती थीं। जब उन्होंने गाना रिकॉर्ड किया, तो वह एक ही टेक में परफेक्ट हुआ।

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    वसंत देसाई ने गूंज उठी शहनाई' (1959), 'गुड्डी' (1971) और ना जाने कितनी फिल्मों का संगीत सजाया। नाटकों का भी वह हिस्सा रहे लेकिन उनका अंत दर्दनाक रहा। दरअसल एक दफा साल 1975 के दिन 22 दिसंबर को वसंत देसाई एचएमवी स्टूडियो में एक खास रिकॉर्डिंग पूरी करके देर शाम मुंबई में अपने घर लौट रहे थे।

    वह बिल्डिंग की लिफ्ट में थे, इसी बीच लिफ्ट तकनीकी खराबी के चलते बंद हो गई। यहीं लिफ्ट में उनका दम घुट गया और उनकी मौत हो गई। इतने दर्दनाक अंत ने सभी को झकझोर दिया लेकिन वो अपने पीछे सिनेमा में संगीत की एक विरासत छोड़ गए।

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