Aakhri Sawal Review: RSS के 100 साल और वो 5 'अनसुलझे' सवाल, क्या Sanjay Dutt की फिल्म दे पाई जवाब?
संजय दत्त (Sanjay Dutt) स्टारर आखिरी सवाल (Aakhiri Sawal) 15 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यहां पढ़ें फिल्म का रिव्यू- ...और पढ़ें
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आखिरी सवाल मूवी रिव्यू

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने पर इस साल की शुरुआत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनी फिल्म शतक : संघ के सौ वर्ष फिल्म बनी थी। अब निर्माता निखिल नंदा आखिरी सवाल फिल्म लेकर आए हैं, जिसे वह गुरुदक्षिणा मानते हैं। यह फिल्म आरएसएस के सफर पर नहीं, बल्कि उन पांच प्रश्नों के उत्तर देती है, जो संघ पर प्रमुख रूप से उठाए गए थे।

क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म कहानी शुरू होती है साल 2018 में केरल में संघ के कार्यकर्ता की हत्या से। वहां से कहानी साल 2026 में आती है, जहां विक्की हेगड़े (नमाशी चक्रवर्ती) आरएसएस पर लिखी अपनी थिसेस के प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी (संजय दत्त) द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर गुस्से में है।
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तीन साल पहले उसने प्रोफेसर से आरएसएस पर थिसेस लिखने के लिए मदद मांगी थी, लेकिन वही अब इस संगठन को राष्ट्रविरोधी मानता है। वह प्रोफेसर से पांच प्रश्नों के उत्तर चाहता है, जिसके बाद वह इस थिसेस का स्वीकार करवाने की जिद छोड़ देगा। दोनों के बीच की बहस न्यूज चैनल तक पहुंच जाती है।
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आखिरी सवाल (Aakhri Sawal) रिव्यू-
उत्कर्ष नैथानी की लिखी यह कहानी बिना शोरशराबा और आरएसएस का महिमामंडन किए, एक शिष्य के अपने गुरु से संघ को लेकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर तथ्यों के साथ देती है, जिनके कारण वह हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है।
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कहानी आरएसएस के शुरुआती दिनों, जहां आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के साथ महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की मुलाकात और उनके कांग्रेस से हाथ न मिलाने के कारण, राममंदिर के लिए कारसेवकों का संघर्ष, नाथूराम गोडसे का महात्मा गांधी की हत्या करने से पहले ही संघ से अलग होने का सच जैसे कई मुद्दों को छूते हुए फिल्म आगे बढ़ती है।
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इसके बीच में बाबरी मस्जिद के ढांचे को किसने गिराया, उसे मस्जिद न कहकर ढांचा क्यों कहते हैं, क्या वह कारसेवकों का आंदोलन था या सोची-समझी साजिश, क्या संघ के लोग वाकई समाजसेवक हैं, क्या संघ के लोग खुद को बचाने के लिए अपनों की ही आहूति देकर विक्टिम कार्ड खेलते हैं, ऐसे कई प्रश्नों के जवाब भी मिलेंगे।
अतीत और वर्तमान में चलती कहानी के इन दृश्यों को निर्देशक अभिजीत बेहद संवेदनशीलता से लेकर आगे बढ़ते हैं। प्रश्नों के उत्तर देने के लिए विक्की और प्रोफेसर का आमने-सामने न्यूज चैनल के मंच पर होने का आइडिया काम करता है। हालांकि अभिजीत इसे वास्तविकता के और करीब रख सकते थे। मीडिया रूम में होने वाली बहस, संघ से विपक्ष के मतभेद वाले दृश्य और बेहतर बन सकते थे। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक मुद्दों की संवेदनशीलता को और गहराई से महसूस कराता है।
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इतिहास के पन्नों को खोलती फिल्म
फिल्म की खासियत इसके संवाद हैं। संघ पूरे सौ साल से मंदिर के एक ही आंदोलन से जुड़ा है, रामजन्म भूमि, और दो जगह है भाईचारे से मिलेगी तो लेंगे, नहीं तो उसके लिए आंदोलन करना पड़ा तो करेंगे..., तुम पांच सौ साल पहले की इमारत को गिराने का शोक मना रहे हो, उस आस्था का क्या जो हजारों साल से अपनी बारी का इंतजार कर रही थी..., जैसे कई संवाद बहस वाले सीन को दमदार बनाते हैं।
क्या है कोई कमी
फिल्म के सहनिर्माता संजय दत्त (Sanjay Dutt) प्रोफेसर और स्वयंसेवक के रोल में दमदार लगे हैं। नमाशी चक्रवर्ती के ज्यादातर सीन संजय के साथ ही हैं, जिसमें वह कहीं से भी कम नहीं लगते हैं। वामपंथी प्रोफेसर के रोल में समीरा रेड्डी का पात्र अधपका है। एंकर के छोटे से रोल में अमित साध प्रभावशाली लगे हैं। नीतू चंद्रा को और स्क्रीनस्पेस मिलना चाहिए था।
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फाइनल वर्डिक्ट
कुल मिलाकर बाबरी मस्जिद वाले मुद्दे को करीब जानना है तो फिल्म देखी जा सकती है।
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