Bharat Bhhagya Viddhaata Review: दहशत के बीच उम्मीद-इंसानियत की कहानी, पैसा वसूल है कंगना की 'भारत भाग्य विधाता'
Bharat Bhagya Vidhata Review: कंगना रनौत की फिल्म भारत भाग्य विधाता सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। 26/11 की अनसुनी कहानी को फिल्म बयां करती है। कैसी ...और पढ़ें

कंगना रनौत की 'भारत भाग्य विधाता' का पढ़ें रिव्यू
HighLights
26/11 मुंबई हमले पर आधारित नर्सों की कहानी
कंगना रनौत का सशक्त और प्रभावशाली अभिनय
मनोज तापड़िया का सधा हुआ निर्देशन
प्रियंका सिंह, मुंबई। बॉक्स ऑफिस पर आखिरकार वह फिल्म आ चुकी है, जिसका इंतजार पिछले काफी वक्त से किया जा रहा था। हम बात कर रहे हैं कंगना रनौत अभिनीत फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' (Bharat Bhhagya Viddhaata Review) की। अब कैसी है कंगना रनौत की यह फिल्म, आइए जानते हैं।
हम इम्पार्टेंट नहीं हैं, लेकिन हम जो करते हैं, वो इम्पार्टेंट हैं। सरकारी अस्पताल में एक नर्स की कही ये बात उस समय ज्यादा महसूस होती है, जब वह 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुई आतंकी हमले के दौरान कामा अस्पताल में अपनी जान पर खेलकर मरीजों की जान बचाती है। इसी पर आधारित है मनोज तापड़िया की लिखी और निर्देशित फिल्म भारत भाग्य विधाता।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' (Bharat Bhhagya Viddhaata) की कहानी शुरू होती है एक पुलिस स्टेशन से, जहां पुलिस वाला गीता गांधारे (Kangana Ranaut) से कहता है कि उसे उस आतंकवादी की पहचान करनी होगी, जिसने कामा अस्पताल में फाइरिंग की थी। घरवाले मना करते हैं, लेकिन गीता को वह दिन याद आता है, जब उसने नर्स के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने की कसम खाई थी।
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वहां से कहानी कामा अस्पताल में काम करने वाली नर्सों की जिंदगी में आती है, जहां जीवन की जिद्दोजेहद के बीच वह पूरी जिम्मेदारी से अपना काम करती हैं। 26 नवंबर की रात दो आतंकी कामा अस्पताल में भी घुसते हैं। उस दौरान कैसे वहां नाइट ड्यूटी पर मौजूद नर्सों ने लोगों की जान बचाई उस पर कहानी आगे बढ़ती है।
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कैसा है अभिनय?
फिल्म में कई कलाकार हैं, जिन्होंने अपने अभिनय के साथ न्याय किया है। वहीं सबसे पहले फिल्म की लीड एक्ट्रेस कंगना रनौत की बात करें तो अभिनेत्री एक बार फिर साबित करती हैं कि वह एक बेहद मंझी हुईं कलाकार हैं। नर्स के पेशे में जो ठहराव चाहिए, वह उनके रोल में दिखता है, सहकर्मियों के हक के लिए लड़ना, हंसते हुए लोगों के ताने सुनकर भी अपनी जिम्मेदारी निभाना और फिर हमले के बीच भी अपना कर्तव्य निभाना, हर फ्रेम में वह छाप छोड़ती हैं।
स्मिता तांबे और गिरिजा ओक गोडबोले अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं। मेट्रेंन के रोल में सुहिता थते और मेडिकल सुप्रिटेंडेट के रोल में आशा शेलार छोटी सी भूमिका में याद रह जाएंगी। रसिका आगाशे, प्रिया बेर्डे, ईशा डे भी नर्स के रोल में अपनी छाप छोड़ती हैं।
कैसा है फिल्म का निर्देशन?
मनोज तापड़िया (Manoj Tapadia) की लिखी और निर्देशित यह कहानी न केवल उस आतंकी हमले के जख्मों को कुरेद देती है, बल्कि अस्पताल के उन लोगों की अहमियत को भी समझा जाती है, जिस पर नजरें कम ही जाती हैं। गीता का पात्र कहता है कि इस यूनिफॉर्म की दो पैसे की इज्जत है क्या, कई दृश्यों में मनोज इसे दर्शाते हैं, जब मरीज के साथ मौजूद शख्स कहता है कि डॉक्टर को बुलाओ, तुम नर्स हो या फिर उन्हीं नर्स वाले के घरवालों का उनकी मेहनत देखकर भी यह कहना की गवर्नमेंट जॉब में इतनी मेहनत कौन करता है, डॉक्टर होती तो भी समझ आता, नर्स की जॉब करके इतना पंचायत क्यों कर रही हो।
बतौर निर्देशक पहली फिल्म होने के बावजूद वह कहीं से भी स्थापित कलाकारों के दबाव में आकर केवल उन्हीं के आसपास कहानी को नहीं रखते हैं। उन्होंने अपनी कहानी में हर पात्र को जगह दी है। सरकारी अस्पताल के काम करने के तरीकों, वहां की छोटी-छोटी बातों, जैसे मिनिस्टर के घर से फोन आते ही कि घर में दो नर्सों की जरुरत है वाली बात पर सभी नर्सों का पीछे हट जाना कि वहां वह घर के काम भी करवाते हैं या फिर बात-बात पर मेडिकल सुप्रिटेंडेंट का याद दिलाना की यह सरकारी अस्पताल है यहां प्रोसिजर और प्रोटोकॉल में हस्तक्षेप न करें।
तारीफ के काबिल हैं फिल्म की बारीकियां
हालांकि इस चक्कर में फिल्म असल मुद्दे तक आने में समय भी लेती है। लेकिन जब आती है, तो सोचने पर मजबूर करती है कि उस दिन उस अस्पताल का माहौल क्या होगा, जहां कई गर्भवती महिलाएं, कई गंभीर मरीज थे और उन्हें तेजी से सभी नर्सों ने मिलकर सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया होगा। इस हमले में पकड़ा गया आतंकी कसाब कामा अस्पताल में ही घुसा था, उन दृश्यों को देखकर दिल दहलता है, साथ ही नर्सों के अदम्य साहस और सूझबूझ को देखकर उन्हें सलाम करने का भी मन करता है।

अस्पताल के माहौल और कम जगह में शूट किए गए आतंकी हमले वाले दृश्यों को सिनेमैटोग्राफर अयान सिल बखूबी अपने कैमरे में कैद करते हैं। आर्ट डायरेक्शन की भी सराहना बनती है, जिन्होंने अस्पताल वाले सेट को वास्तविकता के करीब रखा। फिल्म का शीर्षक फिल्म की कहानी संग साथ न्याय करता है। अंत में उन सभी श्रमिकों का जिक्र भी है, जिन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में हम नजरअंदाज कर देते हैं।
अपना काम है बीमारी से लड़ना बीमार से नहीं, जो भी सांस ले रहा है, उसको हम बचाएंगे, जैसे संवाद तालियां बटोरते हैं। आतंकी हमले के दौरान क्या प्रोटोकॉल होता है, जैसे संवाद सोचने पर मजबूर करते हैं कि अगर आप उस स्थिति में होते, तो क्या करते? नब्ज नब्ज... गाना जिंदगी को जीने को खुशी से जीने को लेकर हौसला बढ़ता है।
फिल्म देखें या नहीं?
26/11 मुंबई हमलों (26/11 Mumbai Attack) पर इससे पहले भी कई सीरीज और फिल्में सामने आई हैं, लेकिन जिस कहानी का जिक्र किसी में नहीं किया गया वही कहानी कंगना रनौत की भारत भाग्य विधाता बताती है। फिल्म में सधे हुए डायरेक्शन से लेकर मजबूत लेखन, भावनात्मक गहराई और कंगना की कमाल की एक्टिंग तक, सबकुछ आपको नजर आएगा, जो इसे देखने लायक जरूर बनाते हैं।