Chand Mera Dil Review: दमदार था आइडिया, यूनिक थी Gen-Z की कहानी; फिर क्यों बिगड़ा अनन्या फिल्म का खेल?
अनन्या पांडे और लक्ष्य लालवानी की फिल्म 'चांद मेरा दिल' सिनेमाघरों में आ चुकी है। एक यूनिक स्टोरी के बाद भी Gen-Z की भावानाओं को दर्शाती यह फिल्म कहां ...और पढ़ें

चांद मेरा दिल रिव्यू/फोटो- Instagram

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। करण जौहर अपनी प्रोडक्शन हाउस तले बनी फिल्म 'चांद मेरा दिल' के जरिए एक बार फिर कॉलेज लाइफ की ओर लौटे हैं। इस बार कहानी का आधार इंजीनियरिंग कॉलेज है। हालांकि, यह कॉलेज पिछली फिल्मों की तरह ग्लैमरस, अमीर छात्र-छात्राओं से भरा हुआ नहीं है।
फिल्म की शुरुआत में एल्युमिनी मीट के दौरान प्रिंसिपल कहता है कि मुझे इसलिए गर्व नहीं है कि यहां पर इंजीनियर बहुत अच्छे बनते हैं, बल्कि इसलिए यहां पर दोस्त बहुत अच्छे बनते हैं। हालांकि, चांद मेरा दिल दोस्ती से ज्यादा प्रेम कहानी पर केंद्रित है, जिसकी वास्तविकता जेन जी (उस पीढ़ी को कहा जाता है जो साल 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है) से जुड़ी हैं।
कैसे शुरू होती है 'चांद मेरा दिल' की कहानी?
कहानी के आंरभ में ही वीडियो कॉल से पता चलता है कि अमेरिका की यूनिवर्सिटी में टॉप करने वाले आरव (लक्ष्य) का चांदनी (अनन्या पांडे) से अलगाव हो चुका है। डिग्री लेकर आरव हैदराबाद लौटता है। वहां से उसके अतीत की परतें खुलनी आरंभ होती हैं। इंजीनियरिंग कॉलेज में 21 साल की उम्र में आरव एल्युमिनी मीट में चांदनी को परफॉर्म करते देखकर पहली नजर में उसे अपना दिल दे बैठता है। रोजाना उसके ड्रेस के रंग से मैच करती शर्ट पहनने लगता है। धीरे-धीरे उनकी नजदीकियां बढ़ती है।
चांदनी ऐसे परिवार से आती है जिसने घेरलू हिंसा देखी है वही आरव के माता पिता को बच्चों से ज्यादा अपनी छवि की चिंता रहती है। प्यार की चाहत में दोनों अपने लिए खूबसूरत जिंदगी की तलाश में होते हैं। चांदनी के लिए आरव सिगरेट पीना तक छोड़ देता है। उनकी प्रेम कहानी में तब मोड़ आता है जब पता चलता है कि चांदनी मां बनने वाली है। वह गर्भपात कराने से मना कर देती है। दोनों परिवार के विरोध के बावजूद शादी करते हैं। माता-पिता बनने के साथ उन्हें जिंदगी की असली कठिनाइयां समझ आती है।
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पढ़ाई, नौकरी, बच्चे की परवरिश, आर्थिक तंगी आरव को तोड़ देती है। वह खुद को फंसा हुआ महसूस करता है। उसे लगता है कि जिंदगी की सारी योजनाएं एक रात में बिखर रही हैं। जबकि चांदनी को बेहतरीन प्लेसमेंट मिल गया है। इससे टकराव पैदा होना स्वाभाविक है। बात तलाक तक भी पहुंच जाती है। दोनों की जिंदगी क्या मोड़ लेगी कहानी इस संबंध में हैं।
कई फिल्मों को मेकर्स ने एक साथ किया मिक्स
करण जौहर निर्मित यह फिल्म बिना प्रमोशन बिना इंटरव्यू के सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। विवेक सोनी लिखित कहानी का आइडिया अच्छा है। युवा उम्र में प्यार की भावनाओं में बहकर उठाए कदम जिंदगी की दिशा और दशा कैसे बदल लेते हैं। फिल्म देखते हुए कहीं कहीं फिल्म थप्पड़, कहीं टू स्ट्टेस, तो कहीं अभिमान की यादें ताजा हो जाती हैं। शुरुआत में दोनों की प्रेम कहानी को स्थापित करने में सोनी काफी समय ले लेते हैं।
तुषार परांजपे, विवेक सोनी और अक्षत घिरडियाल लिखित स्क्रीनप्ले फिल्म में बाहरी परिस्थितियों से ज्यादा किरदारों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष और मानसिक उलझनों पर ध्यान दिया गया है। प्रेम और आत्मसम्मान के बीच टकराव प्रासंगिक लगता है, लेकिन प्रभावशाली नहीं बन पाया है। बीच-बीच में कुछ वनलाइनर हास्य पैदा कर जाते हैं।

उभर कर नहीं आई अनन्या-लक्ष्य की केमिस्ट्री
फिल्म की सबसे बड़ी कमी है अनन्या और लक्ष्य के बीच केमिस्ट्री का अभाव। दोनों के बीच रोमांस के सीन में कोई अहसास नहीं जगता है। कई मौकों पर पात्रों का व्यवहार बनावटी महसूस होता है। लॉजिक की कमी भी महसूस होती है। यह समझना मुश्किल है कि अकेली चांदनी ही उस रास्ते से आती-जाती है बाकी छात्र नहीं। कई जगह लगता है कि कहानी को बहुत सुविधानुसार बना दिया गया है। नई पीढ़ी की सोच, दिक्कतों और सपनों को सही तरीके से एक्सप्लोर नहीं किया गया है। कोचिंग क्लास में एक छात्र का आरव पर टिप्पणी करने का दृश्य जबरन ठूंसा लगता है। यह किसी पुराने जमाने की फिल्म का सीन लगता है।
फिल्म के अंत का पूर्वानुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं लगता है। सिनेमेटोग्राफर देबोजीत प्रसिद्ध स्थलों को बार बार दिखाकर स्मरण कराते हैं कि हम हैदराबाद में हैं। क्योंकि सिर्फ एक पात्र के उच्चारण से हैदराबाद का अहसास मिलता है। पिता की भूमिका में मनीष चौधरी के हिस्से में कुछ खास नहीं आया है। सहयोगी पात्रों को सही मायने में उभरने का मौका नहीं मिला है।