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    Governor Review: दिवालिया की कगार पर था भारत, विदेश भेजना पड़ा सोना; आर्थिक संकट में हीरो बने 'गवर्नर' की कहानी

    By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
    Updated: Fri, 12 Jun 2026 10:59 AM (IST)

    1990-91 के भारतीय आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'गवर्नर' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। मूवी की कहानी उस समय पर है जब लगभग भारत का दिवालिया ...और पढ़ें

    गवर्नर मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    गवर्नर मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    HighLights

    1. मनोज बाजपेयी की 'गवर्नर' हुई सिनेमाघरों में रिलीज

    2. 1990 -91 में निकल सकता था भारत का दिवालिया

    3. 'गवर्नर' ने आर्थिक तंगी से निकलने में की थी मदद

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। साल 2022 में भारी विदेशी कर्ज, पर्यटन से आय में गिरावट, गलत आर्थिक नीतियों जैसे कारणों की वजहों से श्रीलंका अपनी आजादी के बाद के सबसे बड़े आर्थिक संकट में घिर गया था। परिणामस्‍वरूप पेट्रोल और डीज़ल के लिए कई-कई किलोमीटर लंबी कतारें, भोजन, गैस और दवाइयों की भारी कमी, महंगाई बहुत तेज़ी से बढ़ी। जनता के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के कारण राष्ट्रपति को देश छोड़ना पड़ा। आज भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवसस्‍था है, लेकिन साल 1990-91 में भारत को भी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा था।

    तत्‍कालीन आरबीआई गवर्नर एस. वेंकिटरमणन ने अपनी दूरदर्शिता से देश को उस संकट से निकालने में अहम भूमिका निभाई थी। वेंकिटरमणन साल 1985 से 1989 तक राजीव गांधी सरकार में वित्त सचिव रहे और बाद में साल 1990 से 1992 तक भारतीय रिजर्व बैंक के 18वें गवर्नर बने। उन्होंने उस समय पद संभाला जब भारत एक गहरे आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा था। यह फिल्‍म उन्‍हीं से प्रेरित है।

    क्या है मनोज बाजपेयी की 'गर्वनर' की कहानी?

    फिल्‍म की शुरुआत साल 2022 में श्रीलंका में आर्थिक संकट के हालातों को टीवी पर दिखाने से होती है। जनता आराजक हो चुकी है। फिर अदिति वर्मा (अदा शर्मा) अपने भतीजे को बताती है कि साल 1990 में भारत भी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुका था। इराक के कुवैत पर हमले के बाद कच्‍चे तेल की कीमतों में उछाल आता है। महंगाई, बेरोजगारी से जनता जूझ रही थी। तब मिस्‍टर गांधी की सिफारिश पर ए रमनन (मनोज बाजपेयी) को राष्‍ट्रीय बैंक आफ इंडिया (आरबीआइ) का गवर्नर नियुक्‍त किया जाता है।

    वह राजनीतिक दबाव, नौकरशाही प्रतिरोध और बढ़ती जनता की चिंताओं के बीच रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं। परिवार में उनकी पत्नी वंदिता (मधु) और आइएएस की तैयारी कर रही उनकी बेटी है। शुरुआत में उप-गवर्नर सी आर (नौशाद मोहम्मद कुंजू) उनकी नियुक्ति से खुश नहीं होता। बड़ी खबर की तलाश में रहने वाली अदिति लगातार रमनन की किसी गलती या चूक को पकड़ने की कोशिश में रहती है। आखिरकार प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मिलकर देश का सोना विदेश भेजा जाता है ताकि अत्यंत आवश्यक विदेशी मुद्रा जुटाई जा सके। इन कदमों से भारत अपनी तत्काल वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी कर सका।

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    हालांकि संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अंत में फिल्म पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार के आगमन और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण कार्यक्रम का भी उल्लेख करती है, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को मूल रूप से बदल दिया।

    सामाजिक-आर्थिक त्रासदी फिल्म में उभर कर आती है

    विपुल शाह द्वारा निर्मित यह फिल्‍म रमनन के प्रयासों के बारे में बात करती है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह न तो सरकार का महिमामंडन कर रही है न ही अपने मुख्य किरदार को असाधारण नायक के रूप में पेश करती है। निर्देशक चिन्मय दी मंडलेकर ने कहानी को उपदेशात्मक बनाने के बजाय यथार्थवादी रखा है, जिससे उस दौर की सामाजिक और आर्थिक त्रासदी स्वाभाविक रूप से दर्शकों के सामने उभरकर आती है।

    कहानी में यदि सरकार और केंद्रीय बैंक के शीर्ष अधिकारियों के बीच मतभेद, बहस और निर्णयों को लेकर होने वाले टकराव को अधिक गहराई से दिखाया जाता, तो फिल्म ज्‍यादा रोचक और प्रभावशाली बन सकती थी। फिल्‍म इस बात का जवाब नहीं देती कि भारत ऐसी नाजुक आर्थिक स्थिति में पहुंचा कैसे? क्या केवल एक अंतरराष्ट्रीय संघर्ष इसका कारण हो सकता है?

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    मनोज बाजपेयी-अदा शर्मा ने रोल में फूंकी पूरी जान

    कलाकारों में मनोज बाजपेयी मंझे कलाकार हैं। उन्‍होंने अपनी भूमिका को विश्‍वसनीय बनाने का पूरा प्रयास किया है, लेकिन फिल्‍म देखते हुए यह विचार आता है कि क्या वह एक तमिल नौकरशाह की भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प थे? वहीं अदा शर्मा तेज तर्रार पत्रकार की भूमिका में प्रभावशाली लगती हैं।

    नौशाद मोहम्मद कुंजू ने सीआर के किरदार में गरिमा और संयम का परिचय दिया है। मधु अपनी संक्षिप्‍त भूमिका में प्रभाव छोड़ती हैं। यदि फिल्म उस दौर के तनाव और संघर्ष को अधिक प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतार पाती, तो उसका असर कहीं अधिक सशक्त होता।

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