Gram Chikitsalay 2 Review: 'पकड़ौआ विवाह' से लेकर अंधविश्वास तक, गांव की कड़वी सच्चाई दिखाती सीरीज; आंखें खोल देगा क्लाइमैक्स
अमोल पाराशर की Gram Chikitsalay का सीजन 2 प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो चुका है। यहां पढ़ें रिव्यू- ...और पढ़ें
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ग्राम चिकित्सालय सीजन 2 रिव्यू
HighLights
ग्राम चिकित्सालय सीजन 2 रिव्यू
कैसी है अमोल पाराशर की सीरीज?
23 जून को प्राइम वीडियो पर हुई स्ट्रीम
एकता गुप्ता, नई दिल्ली। TVF की ज्यादातर सीरीज आम लोगों और उनकी समस्याओं से जुड़ी हुई होती है और इसीलिए दर्शक 'द वायरल फीवर' के किसी भी कंटेंट से उम्मीद लगाकार बैठते हैं। पंचायत जैसी सीरीज को दर्शकों का खूब प्यार मिला है और उसी की तरह एक और सीरीज बनाई गई 'ग्राम चिकित्सालय' जिसमें शहर का एक डॉक्टर सिटी लाइफ, बड़े हॉस्पिटल छोड़कर गांव में आता है और वहां के लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने का जिम्मा उठाता है।
एक बहुत ही सिंपल कहानी लेकिन भारत की सबसे बड़ी आबादी जो गांव में निवास करती है, से जुड़ी हुई है। ग्राम चिकित्सालय के पहले सीजन को काफी प्यार मिला और अब दूसरे सीजन ने भी प्राइम वीडियो (Prime Video) पर दस्तक दे दी है।

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कहानी
'ग्राम चिकित्सालय 2' (Gram Chikitsalay 2) की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां पहले सीजन की खत्म हुई थी। इस बार डॉ. प्रभात फिर से गांव वालों के मन में उनके लिए विश्वास पैदा करने के लिए जी जान लगा देते हैं। लेकिन गांव की पॉलीटिक्स और कुछ रसूखदारों की वजह से उनके क्लिनिक में दवाईयां तक नहीं पहुंच पातीं। इस समस्या का समाधान करने के लिए वे डॉ. गार्गी द्वारा बताई एक प्रतियोगिता की तैयार करने में लग जाते हैं जिसे जीतने के बाद उन्हें दवाईयों की कोई कमी नहीं होगी।
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इस प्रतियोगिता की तैयारी करते-करते वे कई तरह की बाधाओं का सामना करते हैं। जिसके बीच में पकड़ौआ विवाह, दूसरे डॉक्टरों की चालें, पॉलीटिशयन की दखलअंदाजी जैसी घटनाएं प्रभात को हैरान कर देती हैं। क्या प्रभात गांव वालों के लिए अपने क्लिनिक में दवाईयों का इंतजाम करने में सफल होते हैं? क्या वे प्रतियोगिता जीत पाते हैं? क्या वे गांव वालों का विश्वास जीत पाते हैं? इन सब सवालों के जवाब सीरीज देखने पर मिलेंगे।
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एक्टिंग
ग्राम चिकित्सालय की सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली चीज कलाकारों की एक्टिंग ही है। डॉ. प्रभात के रूप में अमोल पाराशर अपने कूल और शांत स्वभाव को बनाकर रखते हैं और अपनी मुख्य समस्या को सुलझाते हुए, आसपास हो रही छोटी-मोटी समस्याओं पर एनर्जी खर्च नहीं करते।
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अमोल ने डॉ. प्रभात को बखूबी पर्दे पर उतारा है जो जानता है कि उसने शहर ने छोड़कर गांव आने का फैसला है। जो हर समस्या के आगे घूटने नहीं टेकता बल्कि उनका सामना करता है वो भी अपना गुस्सा कंट्रोल में रखकर। अमोल के अलावा डॉ. गार्गी के रूप में आकांक्षा रंजन कपूर ने भी अपना रोल अच्छे से निभाया है। सिस्टम के साथ चलते हुए गार्गी, डॉ. प्रभात का भी बखूबी साथ देती है।
इनके अलावा बाकी कलाकारों ने भी अपना काम अच्छे से किया है। गांव के झोलाछाप डॉक्टर से लेकर, स्कूल जाते बच्चों तक ने अपने एक्टिंग में गंभीरता दिखाई है। गांव की महिलाओं से लेकर कंपाउंडर और साइड कैरेक्टर तक कहानी के साथ अच्छे तरीके से साध कर चलते हैं।
डायरेक्शन
ललितम तिवारी ने सीरीज के डायरेक्शन की डोर अच्छे से संभाली है। कलाकारों की कास्टिंग से लेकर, स्टोरीटेलिंग और भारतीय गांव की एक छवि पर्दे पर उतारने तक उन्होंने दर्शकों को कहानी से बांधे रखने और अपना विजन सही तरीके से दिखाने की पूरजोर कोशिश की है। गांव की पॉलीटिक्स, अंधविश्वास, झोलाछाप डॉक्टरों पर विश्वास, नएपन को अपनाने में हिचकिचाहट जैसी चीजे बेहद आसानी तरीके से दिखाई गई हैं।
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इसके अलावा डायरेक्टर ने इसे पंचायत से भी जोड़ दिया है। हो सकता है कि फ्यूचर में हमें डॉ. प्रभात और सचिव जी को एक साथ देखने का मौका मिले।
क्या है खास?
सीरीज को लंबा ना खींचते हुए 5 एपिसोड में खत्म किया गया है और ये एपिसोड भी एवरेज 30 मिनट हैं यानी ढाई घंटे में आप सीरीज को खत्म कर सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि इतने कम टाइम में स्टोरीटेलिंग पर कोई असर पड़ा हो, बल्कि कहानी सधी हुई और आखिरी तक बांधे रखती है।
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सीरीज गांव में फैले अंधविश्वास, कुप्रथा पकड़ौआ विवाह, मेल डॉक्टर से फीमेल प्रॉब्लम्स को बताने में हिचकिचाहट, नए डॉक्टर के आने से पुराने डॉक्टरों की जलन, घूसखोरी जैसी घटनाओं से सच उजागर करती है।
क्या है कमी?
एक्टिंग, डायरेक्शन, कहानी, स्टोरीटेलिंग सबकुछ सही होने के बाजवूद एक चीज जिसकी कमी खलती है वो है म्यूजिक। गांव के परिवेश को हूबहू दिखाने के साथ-साथ गांव के कल्चर को दिखाना भी एक जरूरी हिस्सा होता है जो सीरीज में मिसिंग हैं।
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वहीं कहानी के साथ-साथ बीच में थोड़ा रोमांस का तड़के की उम्मीद भी लोग लगाए बैठे थे। लेकिन डॉ. प्रभात और डॉ. गार्गी के बीच फॉर्मेलिटी और सिर्फ सिस्टम को लेकर हो रही बातचीत इसे थोड़ा रूखा बना देती है।
क्लाइमैक्स है सीरीज की जान
सीरीज की जान इसका क्लाइमैक्स है, इसके लिए पूरी सीरीज देखना व्यर्थ नहीं होगा।
फाइनल वर्डिक्ट
सिंपल और जमीन से जुड़ी सीरीज देखने वालों के लिए ग्राम चिकित्सालय 2 देखने लायक सीरीज है। इसमें आपको गांव से जुड़ी समस्याओं का सच देखने को मिलेगा। हालांकि 'पंचायत' जैसी उम्मीद लगाना निराश कर सकता है।
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