Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    Ikka Movie Review: तुरुप का पत्ता नहीं बन पाए Sunny Deol, इक्का में फीका 'रहमान डकैत' का जादू; पढ़ें रिव्यू

    By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
    Updated: Fri, 10 Jul 2026 02:04 PM (IST)

    सनी देओल और अक्षय खन्ना दोनों ही मंझे हुए कलाकार हैं, ऐसे में दर्शकों ने 'इक्का' से काफी उम्मीद लगाई थी। 'इक्का' अपने टाइटल के मुताबिक उम्मीदों पर नही ...और पढ़ें

    इक्का मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    इक्का मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। ताश के खेल में इक्का वह पत्ता होता है, जो सही समय पर पूरी बाजी पलटने की ताकत रखता है। इसलिए रूपक के तौर पर भी इक्का का मतलब सबसे दमदार, सबसे भरोसेमंद और निर्णायक खिलाड़ी से लगाया जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि फिल्‍म इक्का अपने नामानुसार असर छोड़ने में नाकाम रहती है। इसकी सबसे बड़ी वजह कमजोर लेखन, बिखरी पटकथा और फीका कोर्टरूम ड्रामा है।

    कैसे शुरू होती है 'इक्का' की कहानी?

    कहानी यूं है कि अर्जुन मेहरा (सनी देओल) मुंबई का सबसे नामचीन वकील है। उसे सब इक्‍का बुलाते हैं। दरअसल, जब सब को लगता है कि मुकदमा खत्‍म हो गया, तो वह अपना हुक्‍म का इक्‍का खेलकर केस का रुख बदल देता है। उसकी 13 साल की बेटी समायरा (दरिया बेदी) को एडवांस स्‍टेज का कैंसर होने का पता चलता है। इसी दौरान मशहूर उद्योगपति और आम चुनाव के उम्‍मीदवार हर्षवर्धन गौर (शिशिर शर्मा) के बेटे शौर्यमन गौर (अक्षय खन्‍ना) पर एक लड़की की हत्‍या की कोशिश का आरोप लगता है।

    अर्जुन शुरुआत में उसका मुकदमा लड़ने से मना कर देता है। अर्जुन की पत्‍नी अवंतिका (दीया मिर्जा) का पूर्व प्रेमी शौर्यमन होता है और समायरा उसकी बेटी होती है। अर्जुन इस बात से वाकिफ है। समायरा के लिए बोन मैरो हासिल करने की खातिर अर्जुन उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। अदालत में उसका सामना मदुरा बनर्जी (तिलोत्तमा शोम) से होता है। जाहिर तौर पर इतने बड़े वकील की हर जिरह और सुबूत के आगे वह हर बार कमजोर साबित होती है। अर्जुन मुकदमा जीत जाता है, लेकिन फिर अपना इक्‍का (Ikka Review) खेलता है।

    sunny

    इन सवालों के जवाब देने से चूक गई इक्का

    फिल्‍म की शुरुआत अर्जुन मेहरा द्वारा सुनसान सड़कों पर एक लग्‍जरी कार द्वारा फुटपाथ पर कार चढ़ाने का मामला सुनाने से होती है। कार का ड्राइवर अमीर बाप की बिगड़ी औलाद बताया जाता है। सभी जानते हैं कि यह मामला किस फिल्‍मी सितारे से जुड़ा है। ऐसे में अर्जुन के व्यक्तित्व को बताने के लिए यह मुकदमा ही क्‍यों जरूरी लगा यह लेखक-निर्देशक ही बता पाएंगे। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसके पात्रों का अधूरा चित्रण है।

    खबरें और भी

    15 साल पहले शौर्यमन की बार काउंसिल की सदस्यता क्यों रद हुई थी? अर्जुन और शौर्यमन के बीच तनातनी की वजह कहां से शुरू हुई? शौर्यमन उस लड़की से कैसे मिला जिसकी हत्‍या की कोशिश का आरोप उस पर लगा है? अल्थिया कौशल की लिखी कहानी और पटकथा इन अहम सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं देती। घटना वर्ली इलाके की है। वर्ली मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित और महंगे इलाकों में से एक है। ऐसे में शौर्यमन की गाड़ी किसी ऐसे रास्‍ते से अवश्‍य गुजरी होगी, जहां सीसीटीवी होगा ऐसे कई साधारण पहलुओं की ओर मदुरा और पुलिस का ध्‍यान न जाना खटकता है।

    sunny akshay

    शौर्यमन अपना मोबाइल भूल आया था, तो रात में किसके मोबाइल से बात कर रहा था, पुलिस आसानी से उसका पता लगा सकती थी। वहीं अदालत में पेश किए गए सबूत और गवाह भी न तो प्रभाव पैदा करते हैं और न ही कोर्टरूम ड्रामा में जरूरी तनाव और रोमांच पैदा कर पाते हैं। अर्जुन और शौर्यमैन के बीच तकरार के दृश्‍य भी प्रभावी नहीं बन पाए हैं। पीडि़ता की दोस्‍तों से पूछताछ भी बहुत सतही है। पीडि़त लड़की और उसके ब्‍वॉयफ्रेंड का रिश्‍ता भी सही से उजागर नहीं होता।

    शौर्यमन के बोन मैरो देते ही समायरा के ठीक होने की खबर बताती है कि लेखक और निर्देशक बहुत जल्‍दबाजी में हैं। अंत में अर्जुन अपनी आखिरी चाल चलकर बाजी पलटता जरूर है, लेकिन तब तक कहानी अपना असर और आकर्षण काफी हद तक खो चुकी होती है।

    फिल्म से नदारद हैं इमोशनल पहलू

    कहानी में भावनात्‍मक पहलू नदारद है। अदालत के बाहर नारी शक्ति पर होने वाले अन्‍याय के खिलाफ नारे हैं, बेटी को न्‍याय दिलाने के लिए मां की तड़प है, अर्जुन-अवंतिका की मजबूरी है, लेकिन कहीं पर भी किसी से सहानुभूति नहीं होती। भावनाओं का ज्‍वार नहीं उमड़ता।

    करीब 33 साल पहले दामिनी में सनी देओल (Sunny Deol) ने वकील गोविंद का यादगार किरदार निभाया था, जिसकी गूंज आज भी ‘तारीख पर तारीख’ जैसे संवादों के साथ सुनाई देती है। ऐसे में तीन दशक बाद उनके फिर से वकील की भूमिका में लौटने से दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं। हालांकि, कमजोर लेखन की वजह से उनका अभिनय उसे साध नहीं पाता है। दीया मिर्जा खूबसूरत लगी है, लेकिन उनका पात्र दमदार नहीं बन पाया है।

    _ - 2026-07-10T135401.457

    अक्षय खन्‍ना मंझे कलाकार हैं। फिल्‍म धुरंधर में उनकी अभिनय की चर्चा ठंडी नहीं पड़ी है, लेकिन कमजोर लेखन की वजह से उनकी भूमिका उतनी मारक नहीं बनी है। तिलोत्तमा शोम दी गई भूमिका साथ न्‍याय करती हैं। शौर्यमन की पत्‍नी (संजीदा शेख) की भूमिका भी अधूरी और अस्‍पष्‍ट है। कुल मिलाकर मंझे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद इक्का वह तुरुप का पत्ता साबित नहीं हो पाती, जो दर्शकों के पक्ष में बाजी पलट सके।

    यह भी पढ़ें- Ikka के सेट पर सनी देओल से पहले आने की जिद्द करते थे Akshaye Khanna, डायरेक्टर से कहा था- 'उन्हें मत बुलाना...'

    यह भी पढ़ें- 'आपको गले लगा लूं...' दीया मिर्जा ने Sunny Deol से Ikka के सेट पर पूछा सवाल, एक सीन की वजह से सता रहा ट्रोलिंग का डर