Indian Institute Of Zombies Review: नए आइडिया पर पुराना तड़का है कहानी, ऐसी कॉमेडी देख घूम जाएगा दिमाग
फिल्म 'आईआईजी: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जाम्बिज' एक नए कॉन्सेप्ट पर आधारित है, जहां टॉपर्स जाम्बी बनते हैं और बैकबेंचर्स शहर को बचाते हैं। ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, नई दिल्ली। हालीवुड में कई फिल्में जाम्बिज पर बनी हैं। भारतीय सिनेमा में इस जॉनर पर हिंदी में 'गो गोवा गान' और मराठी में 'झोंबिवली' जैसी इक्का-दुक्का फिल्में ही बनी हैं। एक प्रयास निर्देशक जोड़ी गगनजीत सिंह और आलोक द्विवेदी ने भी अपनी फिल्म आईआईजी : इंडियन इंस्टीट्यूट आफ जाम्बिज में किया है, लेकिन वह सफल नहीं होते हैं।
क्या है आईआईजी की कहानी?
कहानी शुरू होती है एक इंजीनियरिंग कालेज से जहां के टापर्स को डा. डरवेंद्र सिन्हा (मोहन कपूर) सुपरह्यूमन सीरम यह कहकर पिलाता है कि वह उन्हें जीवन को बदलने का मौका दे रहा है। वह पीकर सभी टॉपर्स जाम्बी बन जाते हैं। वहीं कालेज के बैकबेंचर्स (जो क्लास में सबसे पीछे बैठते हैं, पढ़ने में दिलचस्पी कम होती है) हग्गू (तनिष्क चौधरी), रैम्बो (सचिन कावेथम), रंजन राज (किताब शिवदासानी) और प्रोफेसर ब्रिगैंजा (अनुप्रिया गोयनका) पर जिम्मा आ जाता है कालेज के बाकी विद्यार्थियों के साथ अपने शहर और देश को बचाने का।

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बदल जाएगी बैकबैंचर्स की परिभाषा
कुंज सांघवी की लिखी कहानी का कान्सेप्ट नया है, जहां उन्होंने टॉपर्स को जाम्बिज और बैकबेंचर्स को लोगों का रखवाला बनाया है। लेकिन निराशजनक बात है कि वह इस दिलचस्प कान्सेप्ट को न कहानी में सही से ढाल पाए, न ही निर्देशक जोड़ी गगनजीत सिंह और आलोक द्विवेदी मिलकर इसे बना पाए हैं। टॉपर्स को जाम्बी बनाने का कारण नहीं समझ आया, क्योंकि वह कोई ऐसा अलग तौर-तरीका या बुद्धिमानी वाला पैंतरा नहीं आजमाते हैं, जिसकी उम्मीद फिल्मों में देखे गए दूसरे जाम्बी से नहीं की जाती है।

फिल्म कहां छोड़ती है सवाल?
इस फिल्म के टापर्स जाम्बिज को एक दरवाजा तक खोल नही पाते हैं, बस उससे टकराते रहते हैं। फिल्म में पुलिस का पक्ष बेहद कमजोर और बेवकूफाना है। जिस कामेडी की उम्मीद अपनी पटकथा और संवादों से हुसैन दलाल, अब्बास दलाल, सिद्धार्थ कुमार और हुसैन हरदावाल कर रहे थे, वह पूरी नहीं होती है। इतने बड़े इंजीनियरिंग कालेज में केवल एक प्रोफेसर का मसीहा बनकर आना भी सवाल खड़े करता है कि बाकी के प्रोफेसर्स कहां गए। महबूबा ओ महबूबा... गाने पर अनुप्रिया की बार-बार होती एंट्री कहानी में असर नहीं, खलल डालती है। क्लाइमेक्स में जाम्बी का खात्मा वाला सीन बी एस मधुकर की सिनेमैटोग्राफी के जरिए अच्छे बने हैं।
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बेहद कमजोर लिखे गए हैं पात्र
अभिनय की बात करें, तो दुनिया पर राज करने वाले का सपना देखने वाले शक्तिशाली व्यक्ति के अधूरे से रोल में मोहन कपूर का अनुभव काम आता है। अनुप्रिया गोयनका का पात्र बेहद कमजोर है, बैकग्राउंड म्यूजिक भी उनके लिए काम नहीं करता है। इतने अनुभवी कलाकारों के बीच सचिन कावेथम, रंजन राज, तनिष्क चौधरी, जेसी लीवर जैसे युवा कलाकार फिल्म की कमजोर कहानी को हर मोड़ पर अपने अभिनय से संभालने का प्रयास करते हैं।