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    Rajni Ki Baraat Review: दुल्हन लेकर गई बारात, सदमे में ससुराल; अच्छी कहानी में फीका है क्लाइमैक्स

    By Priyanka SinghEdited By: Tanya Arora
    Updated: Fri, 29 May 2026 12:24 PM (IST)

    उल्का गुप्ता की फिल्म 'रजनी की बारात' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म का कांसेप्ट अन्य मूवीज के मुकाबले काफी अलग और यूनिक है, लेकिन फिर भ ...और पढ़ें

    रजनी की बारात रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    रजनी की बारात रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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    प्रियंका सिंह, मुंबई। एक लड़की बारात लेकर अगर खुद लड़के के घर पहुंच जाए, तो वह पेपर पर पढ़ने में दमदार लगता है। फिल्म रजनी की बारात की कहानी भी इसी नई सोच पर बुनी गई है। हालांकि, पुरानी परंपराओं को तोड़ने की बात करती यह फिल्म इसे पर्दे पर दर्शाने में चूक जाती है।

    क्या है 'रजनी की बारात' की कहानी?

    फिल्म की कहानी शुरू होती है दरभंगा से, वहां रहने वाली स्कूल टीचर रजनी (उल्का गुप्ता) को रज्जन (कनिष्क विजय) से प्यार है। रजनी के पिता नहीं हैं, घर में उसकी दादी (जरीना वहाब) और मां (सुनीता रजवार) हैं। मां शादी को लेकर परेशान हैं। पंडित का कहना है कि रजनी की कुंडली में घर पर बारात आना नहीं लिखा है। रज्जन के पिता मल्खान सिंह (अश्‍वथ भट्ट) सख्त किस्म के दरोगा हैं, जो अपने बेटे की शादी बड़े घर की लड़की से करवाना चाहते हैं। रज्जन और रजनी के रिश्ते के बारे में एक दिन मल्खान को पता चल जाता है। आगे क्या होता है, उसके लिए फिल्म देखनी होगी।

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    अच्छे कांसेप्ट के बावजूद कमजोर है कहानी

    फिल्म में एक संवाद है कि हमारी रजनी एक नई शुरुआत करने जा रही है। फिल्म का यह कांसेप्ट वाकई आधुनिक है, रूढ़ीवादी विचारधारा और परंपराओं को तोड़ने का प्रयास भी करता है, जहां लड़की के घर बारात नहीं आती है, बल्कि वह खुद अपनी बारात लेकर निकलती है, लेकिन आदित्य अमन और अनुपम पुरोहित की लिखी पटकथा और संवाद इस दमदार कांसेप्ट को उसी अंदाज में दिखाने में कमजोर पड़ते हैं। हालांकि, आदित्य निर्देशित इस फिल्म की शुरुआत बढ़िया है, जहां मिथिलांचल के इतिहास, सीता माता के स्वंयवर का जिक्र है।

    अरूप मंडल की सिनेमैटोग्राफी दरभंगा की खूबसूरती को बखूबी दिखाती भी है। लेकिन एक प्वाइंट पर आकर कहानी बेहद धीमी हो जाती है। मन में कई सवाल भी उठते हैं कि दरभंगा की लड़की इतनी हिम्मती है, लड़का इतना डरा-सहमा सा क्यों है, वह अपने प्यार के लिए आवाज क्यों नहीं उठाता है। रजनी की बारात को लेकर जो मुहिम उसके दोस्त इंटरनेट मीडिया पर चलाते हैं, उन दृश्यों को भी जल्दबादी में निपटाया गया है।

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    एक छोटे से शहर में लड़की खुद अपनी बारात लेकर निकल रही है, लेकिन आस-पड़ोस, परिवार में कोई हलचल नहीं है। रजनी और उसकी दादी और मां के बीच के कई सीन अच्छे बने हैं। क्लाइमेक्स और बेहतर होता, तो जो संदेश आदित्य देना चाहते थे, वह असरदार होता। बिहार से कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां पार्क में बैठे प्रेमियों को पुलिस परेशान करती है, उन दृश्यों को भी मजेदार तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म में ऐसा कोई गीत नहीं जो फिल्म खत्म होने पर याद रह जाए।

    पूरी फिल्म को संभालती दिखीं ये एक्ट्रेस 

    अभिनय की बात करें तो उल्का गुप्ता छोटे शहर की साहसी लड़की रजनी के रोल में जंची हैं। सख्त पुलिस ऑफिसर और पिता के रोल में अश्‍वथ भट्ट स्क्रिप्ट के दायरों में काम करते हैं। आधुनिक विचारधारा वाली दादी के रोल में जरीना वहाब और बेटी की शादी व समाज की चिंता में डूबी सुनीता रजवार अपने अनुभव से फिल्म को संभालती हैं। रज्जन का रोल निभाने वाले कनिष्क विजय के सीन ही कमजोर हैं, ऐसे में उन्हें परफॉर्म करने का मौका नहीं मिला है।

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