Toy Story 5 Review: फोन और टैबलेट के दौर में खिलौनों की पुकार, आज के बच्चों को आईना दिखाती है 'टॉय स्टोरी 5'
Toy Story 5 Review: एनिमेटेड एडवेंचर ड्रामा टॉय स्टोरी 5 सिनेमाघरों में आ चुकी है। फिल्म देखने से पहले इस कॉमेडी फिल्म का रिव्यू पढ़ें। ...और पढ़ें

टॉय स्टोरी 5 मूवी का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- एक्स

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। कभी गुड्डे-गुड़ियों की शादी कराते, तो कभी घंटों खिलौनों के साथ एक नई दुनिया बुनते बच्चों के हाथों में जब से फोन और टैबलेट आए हैं, तब से खिलौनों से उनका नाता बहुत कम हो गया है। बाहर निकलकर खेलना, असली दोस्त बनाना कितना अहम है, यह बेहद खूबसूरती से दिखाती है 31 वर्षों से चल रही एनिमेटेड एडवेंचर कॉमेडी टॉय स्टोरी सीरीज की पांचवीं फिल्म टॉय स्टोरी 5 (Toy Story 5)।
क्या है टॉय स्टोरी 5 की कहानी?
कहानी है बौनी (स्कार्लेट स्पीयर्स) की जो खिलौनों से तो खूब खेलती है, लेकिन दोस्त नहीं बना पाती है। उसके माता-पिता उसके लिए लिलीपैड (ग्रेटा ली) डिवाइस यानी टैबलेट ले आते हैं, जिस पर बौनी के डांस क्लास के दोस्त ऑनलाइन बनते हैं। बौनी अपने खिलौने से दूर हो जाती है।
उसकी काउगर्ल गुड़िया जेस्सी (जोन क्यूजेक) इस बात से परेशान है कि वह अब दोस्त नहीं बना पाएगी, न ही पहले की तरह खिलौनों से खेलेगी। बौनी को स्क्रीन से दूर करने के लिए जेस्सी क्या करती है, कहानी उस पर आगे बढ़ती है।
कैसा है स्क्रीनप्ले?
निर्देशक एंड्यू स्टैंटन की लिखी यह कहानी आज के दौर में बेहद जरूरी लगती है, जहां बच्चे वर्चुअल दुनिया का शिकार इस कद्र हो गए हैं कि बाहर निकलकर खेलना, दोस्त बनाना ये सब भूल चुके हैं। एंड्यू ने केना हैरिस के साथ मिलकर इस एनिमेटेड फिल्म की पटकथा गढ़ी है।
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उन्होंने कई ऐसे सीन बनाए हैं, जो उस दुनिया को दिखाता है, जिसके बारे में सोचना कठिन है, जैसे घर के किसी कोने में पड़े खिलौनों का निराश होना कि बच्चे अब उनसे खेलते नहीं, स्क्रीन को उन्होंने अपना नया दोस्त बना लिया है, असली दोस्तों की बजाय वर्चुअल दुनिया के दोस्त उन्हें खुशी दे रहे हैं।
कड़वी सच्चाई को रूबरू कराती है फिल्म
रात के एक दृश्य में घरों की बंद लाइटों में बच्चों की चादर के भीतर से आती लाइट में फोन पर नए दोस्त ढूंढ रहे या गेम खेल रहे बच्चे कैसे अपनों से ही दूर हो रहे हैं या साथ बैठे कई बच्चे आपस में बातें करने की बजाय अपने-अपने फोन में व्यस्त हैं, सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे उन्हें इस दुनिया से बाहर निकाला जाए।
तकनीक में नहीं छोड़ी कमी
सबसे अच्छी बात यह है कि एंड्र्यू ने कहानी में कहीं से भी तकनीक को कमतर दिखाने या उसकी जरूरतों पर सवाल नहीं उठाया है, बल्कि तकनीक कैसे बच्चों की मदद कर सकती है, इसका भी जिक्र किया है। गुड्डे-गुड़िया की शादी करवाना, उसमें कई तरह की कहानियां बुनना, सभी खिलौनों को मिलाकर बच्चे की उस कहानी और कल्पना का हिस्सा बना देने वाले भी दृश्य भी हैं, जब वाकई बच्चे बेजान खिलौनों के साथ खेलकर उनमें जान भर दिया करते थे। निर्जीव खिलौने जब बोलते हैं, तो उनके नजरिए से पूरी कहानी मजेदार लगती है।
कई तरह के खिलौनों और आज के तकनीक के लैस टैबलेट के बीच उन खिलौनों को देखना, जो बैटरी से चला करते थे, बच्चों को साफ-सफाई के बारे में सिखाया करते थे या फिर एक रूम से दूसरे रूम में बात करने वाले वॉकी टॉकी का जिक्र और उनका प्रयोग भी खूबसूरती से कहानी में किया गया है। घर से बाहर कर दिए खिलौने वूडी (टॉम हंक्स) का दूसरे खिलौने के लिए घर तलाशने वाले दृश्य दिल को छूते हैं।
फिल्म में जेस्सी जब बैटरी वाले गैजेट के बटन दबाकर उस पर गेम खेलती है, तो वह गैजेट उससे कहता की तुम बहुत अच्छा खेली, इस पर जेस्सी कहती है कि खेल? यह खेल नहीं है, यह तो गेम है। फिर वह उस दुनिया में ले जाती है कि असली खेल क्या होता है।
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कहां अटकी फिल्म?
हालांकि दूसरे हाफ में कहानी लंबी खिंची भी लगती है। कई खिलौनों के दृश्य ऐसे हैं, जो न भी होते, तो मुख्य कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। तकनीक से बच्चों का वास्ता कराते हुए भी माता-पिता कैसे बच्चों को उसके दुष्प्रभाव से दूर रख सकते हैं, उनका स्क्रीनटाइम कैसे कम किया जा सकता है, इस पर भी बात होनी चाहिए थी।
टॉम हंक्स, टीम एलन, जोन क्यूजेक जैसे अनुभवी कलाकारों की आवाज इस एनिमेटेड फिल्म में जान डालती है। ग्रेटा ली, स्कार्लेट स्पीयर्स समेत बाकी कलाकारों की डबिंग भी सराहनीय है।
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