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    कैसी है भगवान जगन्नाथ की दिव्य रसोई, जहां चूल्हे भी लेते हैं 12 दिन का विश्राम? आलू-टमाटर पर है सख्त पाबंदी

    Updated: Sun, 12 Jul 2026 09:16 AM (IST)

    ओड़िशा से विस्तार पाकर महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा अब संपूर्ण भारतवर्ष में व्याप्त है। इस वर्ष 16 जुलाई से आरंभ इस दिव्य यात् ...और पढ़ें

    सदियों से कैसे सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है महाप्रभु की रथयात्रा (Image Source: AI-Generated)

    सदियों से कैसे सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है महाप्रभु की रथयात्रा (Image Source: AI-Generated)

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    सुजाता शिवेन, नई दिल्ली। वेद में देवी उषा और देव अग्नि के रथ का व्यवहार करने की बात सभी जानते हैं। वेद में कई तरह के रथ निर्माण की सूचना मिलती है। रथ की आकृति में कई मंदिर भी भारत में हैं। कोणार्क मंदिर और सीमाचल मंदिर के बायीं तरफ रथ के आकार का एक छोटा-सा मंदिर भी है। इन दोनों मंदिरों के निर्माता लांगुला नरसिंह देव हैं। इन्हें हम ‘पत्थर का रथ’ भी कह सकते हैं। दक्षिण भारत में भी रथ की परंपरा है। तिरुअनंतपुरम का त्यागराज मंदिर, सूचिंद्रम मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, श्रीरंगम मंदिर और सीमाचल के नृसिंह मंदिर में रथयात्रा की परंपरा है। सीमाचल मंदिर का रथ पूरे साल लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है। ओड़िशा में श्रीलिंगराज और जाजपुर की देवी बिरजा की रथ परंपरा भी बहुत प्राचीन है। इनमें से एक शैव परंपरा की रथयात्रा है तो दूसरी शाक्त परंपरा की रथयात्रा है।

    The Story of Lord Jagannath

    (Image Source: AI-Generated)

    स्कंदपुराण में वर्णन

    पूरे भारत में ओड़िशा का जगन्नाथ रथ-महोत्सव अनन्य और विश्व प्रसिद्ध है। श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में श्री जगन्नाथ का रथ महोत्सव प्राचीनकाल से संचालित हो रहा है, फिर भी इसके आरंभ का निर्दिष्ट वर्ष अभी तय नहीं हो पाया है। शास्त्र के अनुसार, ईसा पूर्व पहली सदी में इसका आरंभ होना माना जाता है, कारण एक रथ में श्रीचतुर्द्धाविग्रह को आड़मपंडम से, सिंहद्वार की तरफ पहली बार राजा इंद्रद्युम्न लाए थे। इसका वर्णन स्कंदपुराण में मिलता है। जर्मन शोधकर्ताओं के हालिया शोध से ज्ञात होता है कि यह पुराण ईसा पूर्व की पहली सदी से थोड़ा प्राचीन है। सनातनी विश्वास है कि महाप्रभु के आविर्भाव के समय से ही रथयात्रा का प्रचलन रहा है।

    ययाति का सौभाग्य

    इतिहास में इसके प्रचलन से संबंधित कई तरह के मत मिलते है। पंडित सदाशिव रथशर्मा ने ‘रथचकड़ा’ पोथी को पढ़कर इसका काल निर्णय किया है। यह पोथी पुरी के बड़ओड़िआ मठ में सुरक्षित थी, इस बात का उल्लेख उन्होंने ‘दारुब्रह्म की संस्कृति और युग-युग की घोषयात्रा श्रीगुंडिचा’ शीर्षक में किया है। श्री परमानंद अधिकारी ने इसका संपादन किया है। 1981 में कटक के न्यू स्टूडेंट स्टोर ने इसे प्रकाशित किया था। इस पोथी के रचनाकर हैं, भिखारी पट्टनायक। महाराजा ययाति के समय में यानी नवम सदी में महाप्रभु की रथयात्रा होने की बात इस पोथी में लिखी हुई है। पंडित मुरारी मिश्र का ‘अनर्घराघव’ नाटक भी नवम सदी की रचना है, ऐसा निर्धारित हुआ है। उसमें केवल पुरुषोत्तम की ‘यात्रा’ शब्द को पंडितों ने रथयात्रा के लाक्षणिक रूप में स्वीकार किया है। अगर दोनों ही बात को हम स्वीकार करते हैं तो नवम सदी में महाराजा ययाति के समय में भी महाप्रभु की रथयात्रा होती रही है।

    सात रथों की परंपरा

    पोथी में जो वर्णन हुआ है उसके हिसाब से श्रीमंदिर की ऊंचाई 48 हाथ थी। यद्यपि मांजला पंजी में ‘श्रीमंदिर’ शब्द की जगह ‘पटोल’ शब्द का व्यवहार किया गया है और 38 हाथ ऊंचाई का उल्लेख किया गया है। वह मंदिर छोटा था इसलिए सारे विग्रह उसी के अनुसार छोटे थे, इसलिए रथ की ऊंचाई 18 हाथ लिखी हुई है। उस समय सात रथों का निर्माण होता था। सिंहद्वार से श्रीविग्रह सभी तीन रथों में बलगंडि जाते थे। इन तीनों रथों के सामने एक छोटा रथ चलता था। इस रथ को भक्त नहीं बल्कि घोड़े खींचते थे। इसमें भक्त कई तरह के वाद्य बजाते थे। यह चारों रथ पहले बलगंठी मालिनी नदी के किनारे रुकते थे, फिर नदी पार करने के बाद विग्रह तीनों रथ में बैठकर श्रीगुंडिचा मंदिर जाते थे। नदी के दूसरे किनारे के तीनों रथ इंद्रद्युमपाटणा में बनाए जाते थे। यह जगह इंद्रद्युम तीर्थ नाम से कहीं जरूर थी, जो आज तक चिन्हित नहीं हो पाया है।

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    इंद्रद्युम कार्यशाला में

    इतिहास से पता चलता है कि इंद्रद्युम तीर्थ के उत्तर-पश्चिम से होकर एक नदी बहती थी। यातायात के लिए उस समय नदी का ही व्यवहार किया जाता था। नदी किनारे जो बस्ती या गांव थे उन्हें ‘पाटणा’ कहा जाता था। कई इलाको में नदी के किनारे ‘पाटणा’ नाम से गांव आज भी हैं। इंद्रद्युम पाटणा में चार चक्के वाले रथों का निर्माण किया जाता था। महाराजा प्रथम भानुदेव के समय में (1264 से 1278 तक) श्रीविग्रहों के लिए छह रथ की जगह तीन रथ होने की बात डॉ. हरेकृष्ण महताब ने अपने ओड़िशा इतिहास में लिखा है। घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ का निर्माण कब बंद हुआ, इसका तय समय पता नहीं चला है।

    मल्हार मठ का गौरव

    रथ के निर्माण में पहले सात नियोगी थे, उन्हें ‘सप्तरथकार’ सेवक कहा जाता था। वे थे, ‘गुणाकार’, ‘मुख्यरथाकार’, ‘लौहकार’, ‘छेकाकार’, ‘रूपकार’, ‘चित्रकार’ और ‘सूचिकार’। बाद के समय में रथ निर्माण की सुविधा के चलते यह सात नियोग 36 नियोग में परिवर्तित हो गए। रथ से उतरकर ‘चाप’, नाव में बैठकर, श्रीविग्रह बड़दांड जाते थे, इसलिये ‘रथ चापदलेइ’ नियोग की सृष्टि किया गया। तीन रथ बन जाने से फिर उनकी कोई जरूरत नहीं रह गई। यह चापदलेइ गजपति के नौसेना से थे। तत्कालीन समय में स्थलवाहिनी से ज्यादा नौवाहिनी की जरूरत रहती थी, जिन्हें मल्हार कहा जाता था। नौसेना के यह सैनिक बहुत ही बलशाली और लड़ाकू होते थे। रथयात्रा में उनकी आवश्यकता को देखते हुए पुरी के बड़दांड में मौसी मंदिर के निकट गजपति ने उन्हें जगह दी थी। पहले वह स्थान मल्हार मठ के नाम से जाना जाता था। बाद में ‘मलेइ मठ’ के नाम से जाना जाने लगा। यह मलेइ मठ पूरे ओड़िशा में मल्हारों के अध्यात्म का केंद्र बिंदु था। वहीं रहते हुए वे रथयात्रा के समय अपनी सेवा देते थे। बाद के दिनों में 36 नियोग में से कई नियोगों की सेवा बंद किए जाने की बात सामने आई।

    सामाजिक समरसता और समान अधिकार

    सूर्यवंश के शासन के समय रथ के निर्माण और रथ के सुपरिचालन के लिए 64 तरह के सेवकों की नियुक्ति हुई थी। भोई वंश के शासनकाल तक यह व्यवस्था बनी रही। बीते समय में ओड़िशा के पराधीन होने के बाद इसमें से 12 तरह की सेवाएं बंद हो गईं। पर इसमें एक बात गौर करने लायक है कि समाज के चारों वर्ण के लोग रथ निर्माण तथा रथयात्रा से जुड़े हुए थे और अभी भी हैं। दलित समाज के सात प्रकार के सेवक रथ निर्माण में सेवा करते थे और अभी भी कर रहे हैं। ‘रथयात्रा’ के ओड़िशा की ‘गणयात्रा’ में परिणित होने का मुख्य रहस्य था, सभी को समान अधिकार मिलना। सहयोग और साहचार्य की इस मानसिकता की सृष्टि करने में गजपतियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। रथयात्रा ने जातीय संहति की नींव रखी थी… जो महान परंपरा अब भी गौरवशाली रूप में जारी है।

    महाप्रभु की महारसोई

    महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की रसोई को सनातन संस्कृति की सबसे विशाल और पवित्रतम रसोई होने का गौरव प्राप्त है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद (अभड़ा) तैयार होता है। जगन्नाथ मंदिर के दक्षिण-पूर्वी प्रांगण में स्थित इस महा-रसोई में लगभग दो सौ चालीस चूल्हे अनवरत सक्रिय रहते हैं, जहां सैकड़ों ब्राह्मण रसोइए और उनके सहायक पूर्ण शुद्धता के साथ अपनी सेवाएं अर्पित करते हैं।
    इस परिसर में समस्त अन्न केवल मिट्टी के नूतन पात्रों में ही पकाया जाता है। यहां भोजन पकाने की जो पारंपरिक प्रविधि उपयोग में लाई जाती है, वह आधुनिक तापीय विज्ञान को भी चकित कर देती है। चूल्हे की पवित्र अग्नि पर एक के ऊपर एक, सात मिट्टी के बर्तनों को ऊर्ध्वाधर क्रम में स्थापित किया जाता है। सामान्य भौतिक नियमों के विपरीत, यहां आंच से सबसे दूर, यानी शीर्ष पर स्थित बर्तन का भोजन सबसे पहले पकता है और आंच के ठीक समीप स्थित सबसे नीचे का बर्तन सबसे अंत में सिद्ध होता है।

    जगन्नाथ जी के महाप्रसाद के दो मुख्य रूप हैं। प्रथम 'संखुड़ी', जिसके अंतर्गत सादा अन्न, घी-चावल, मीठी कनिका, अरहर की दाल और डालमा जैसे पके हुए पारंपरिक व्यंजन आते हैं; तथा दूसरा 'सुखिला', जिसमें चाशनी से युक्त परतदार खाजा और दूध की मलाई से निर्मित सरपुली जैसी शुष्क मिठाइयां सम्मिलित हैं। इस रसोई की पाक-विधि में प्याज-लहसुन का प्रयोग तो वर्जित है ही, साथ ही आलू, टमाटर, फूलगोभी और हरी मिर्च जैसी विदेशी मूल की वनस्पतियों का एक दाना भी इस रसोई की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। तीक्ष्णता के लिए केवल काली मिर्च और सोंठ का व्यवहार होता है, तथा जल केवल 'गंगा' व 'यमुना' नामक कुओं से लिया जाता है। मंदिर के उत्तर-पूर्व परिसर में आनंद बाजार में असंख्य भक्त इस महाप्रसाद का आनंद लेते हैं।

    हां, रथयात्रा के समय जब भगवान मुख्य मंदिर को त्यागकर रथ पर आसीन होते हैं, तब 12 दिनों तक महा-रसोई के चूल्हे विश्राम ले लेते हैं। रथयात्रा के दौरान महाप्रभु को केवल शुष्क और शीतल नैवेद्य अर्पित किया जाता है। तदनंतर, जब श्रीविग्रह अपनी मौसी के घर यानी श्री गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, तब वहां की अस्थाई रसोई सक्रिय होती है और पुनः उसी सप्त-हांडी की पारंपरिक विधि से गरम अभड़ा तैयार किया जाता है। रास्ते में मौसी मां के द्वार पर रथ रुकने पर महाप्रभु को विशेष रूप से पोड़ा पीठा का भोग लगाया जाता है।

    (लेखक श्री जगन्नाथ संस्कृति के सुप्रसिद्ध विद्वान हैं)

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