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    एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी मेला, जहां सोना-चांदी नहीं; देवी को अपने वजन के बराबर 'गुड़' चढ़ाते हैं भक्त

    Updated: Fri, 13 Feb 2026 02:24 PM (IST)

    तेलंगाना के मुलुगु जिले में एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी मेला 'समक्का-सरलम्मा जतारा' लगता है। इसकी भव्यता और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को देखकर इसे 'तेलं ...और पढ़ें

    क्यों खास है 'समक्का-सरलम्मा जतारा', जिसे कहते हैं तेलंगाना का महाकुंभ? (Image Source: AI-Generated)

    क्यों खास है 'समक्का-सरलम्मा जतारा', जिसे कहते हैं तेलंगाना का महाकुंभ? (Image Source: AI-Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। तेलंगाना के मुलुगु जिले के घने जंगलों में आस्था का एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जो शायद ही कहीं और दिखे। हम बात कर रहे हैं मेदारम में आयोजित होने वाले 'समक्का-सरलम्मा जतारा' की। इसे एशिया का सबसे बड़ा आदिवासी मेला माना जाता है और इसकी भव्यता के कारण इसे 'तेलंगाना का महाकुंभ' भी कहा जाता है। इस बार यहां श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि करीब 2 करोड़ लोगों के पहुंचने का दावा किया गया है।

    Telangana Tribal Festival

    (Image Source: India Cine Hub) 

    यहां 'गुड़' ही है असली सोना

    आमतौर पर मंदिरों में लोग सोना-चांदी चढ़ाते हैं, लेकिन यहां परंपरा बिलकुल अलग और अनोखी है। यहां भक्त देवी को अपने वजन के बराबर 'गुड़' तोलकर चढ़ाते हैं। स्थानीय मान्यताओं में इस गुड़ को ही 'सोना' माना जाता है। भक्तों का ऐसा अटूट विश्वास है कि चढ़ाए गए इस प्रसादी गुड़ को अगर खेतों में डाला जाए, तो फसलें लहलहा उठती हैं और घर में बरकत आती है।

    वीर मां-बेटी की याद में उत्सव

    यह विशाल उत्सव 13वीं सदी की एक वीर मां और बेटी, 'समक्का' और 'सरलम्मा' की याद में मनाया जाता है। इन वीरांगनाओं ने अपने समाज के सम्मान और हक के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में उनके लिए गहरा सम्मान है, जो सड़कों पर लगे मीलों लंबे जाम और भीड़ के रूप में साफ दिखाई देता है।

    बांस के डंडों की पूजा और गन सैल्यूट

    इस मेले की एक और खास बात यहाँ की पूजा विधि है। यहां मंदिरों में कोई मूर्ति नहीं होती, बल्कि हल्दी और कुमकुम लगे बांस के डंडों को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इस मेले को 'स्टेट फेस्टिवल' का दर्जा प्राप्त है, यही वजह है कि पुलिस प्रशासन द्वारा इन प्रतीकों को 'गन सैल्यूट' दिया जाता है।

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    आस्था और संस्कृति का महासंगम

    मेले में आने वाले श्रद्धालु 'जम्पन्ना वग्गु' नदी में पवित्र स्नान करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। उत्सव के अंत में देवियों की वन की ओर विदाई होती है, जिसे 'वनप्रवेशम' कहा जाता है। समक्का-सरलम्मा जतारा केवल एक मेला नहीं, बल्कि यह करोड़ों लोगों के विश्वास, संस्कृति और खुशियों का एक सुंदर महासंगम है।

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