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    क्या आपका बच्चा भी बिना फोन देखे खाना नहीं खाता? नई रिसर्च का ये अलर्ट हर माता-पिता को पढ़ना चाहिए

    Updated: Sun, 31 May 2026 03:26 PM (IST)

    बच्चों में मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल, उनके विकास में रुकावट डाल रहा है। इससे उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर पड़ता है। ...और पढ़ें

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    रोते बच्चे को शांत करने के लिए क्या आप भी थमा देते हैं मोबाइल? (Picture Courtesy: Freepik)

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में अगर कोई छोटा बच्चा रोने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए या खाने में नखरे करे, तो उसे शांत करने के लिए माता-पिता तुरंत उसके हाथ में फोन थमा देते हैं। यह तरीका भले ही बहुत आसान है, लेकिन उतना ही खतरनाक भी है। 

    दरअसल, हाल ही में हुई एक स्टडी में पता चला है कि कम उम्र में बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन थमा देना उनके विकास में एक बड़ी रुकावट बन रहा है। आइए समझें इस बारे में। 

    क्या कहती है रिसर्च?

    अमेरिका की एक जानी-मानी यूनिवर्सिटी सहित छह विश्वविद्यालयों के स्कॉलर्स की एक टीम ने 210 परिवारों पर एक स्टडी की। इस स्टडी में 9 महीने से लेकर 30 महीने तक के बच्चों के विकास पर नजर रखी गई।

    स्टडी के नतीजे बताते हैं कि जो बच्चे बार-बार मोबाइल या टैबलेट का इस्तेमाल करते हैं, आगे चलकर उनके व्यवहार में कई तरह की गंभीर समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। सबसे ज्यादा बुरा असर बच्चों के सेल्फ कंट्रोल पर पड़ता है।

    screen time effects

    (AI Generated Image)

    बातचीत की जगह स्क्रीन देना खतरनाक

    जब बच्चे परेशान होते हैं, तो कायदे से उनसे बातचीत करनी चाहिए और बातचीत के जरिए उन्हें शांत करना चाहिए, लेकिन इसकी जगह उन्हें स्क्रीन में उलझा दिया जाता है। एक्सपर्ट्स इसे डिस्प्लेसमेंट कहते हैं। बातचीत की इस कमी के कारण बच्चों में भविष्य में बड़ी परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।

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    फास्ट-फॉरवर्ड रील्स से कम हो रहा धैर्य

    आजकल के बच्चों को मोबाइल पर रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने की आदत हो चुकी है। यही नहीं, लंबी वीडियो को फास्ट-फॉरवर्ड करके देखने की आदत अब उनके रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही है। थेरेपिस्ट्स के मुताबिक, इस आदत की वजह से बच्चों के अंदर से धैर्य खत्म होता जा रहा है, जिसके नतीजे काफी गंभीर हैं। 

    इस आदत के कारण बच्चों की फोकस करने की क्षमता कम हो रही है,  वे बात-बात पर चिड़चिड़े हो रहे हैं, पढ़ाई-लिखाई में उनती रुचि कम हो रही है और जब उन्हें किसी की बात पूरी सुननी पड़ती है, तो वे बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं। 

    तय सीमा से दोगुना वक्त स्क्रीन पर बिता रहे हैं बच्चे

    एक दूसरे बड़े मेटा-विश्लेषण में, जो कि 2,857 बच्चों पर की गई 10 स्टडी पर आधारित था, बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस स्टडी के अनुसार, 0 से 5 साल तक के बच्चे रोजाना लगभग 2.22 घंटे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। 

    जबकि बच्चों के लिए सुरक्षित सीमा सिर्फ 1.2 घंटे तय की गई है। यानी बच्चे सुरक्षित लिमिट से दोगुने से भी ज्यादा वक्त स्क्रीन पर बिता रहे हैं।

    बच्चों की सेहत पर चौतरफा हमला

    रिपोर्ट्स और एक्सपर्ट्स के मुताबिक, स्क्रीन टाइम बढ़ने का खामियाजा बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से भुगतना पड़ रहा है। इससे बच्चों में ये गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं। बच्चों का बोलना और भाषा सीखना धीमा हो रहा है।

    उनकी मानसिक और बौद्धिक क्षमता पर असर पड़ रहा है। बच्चे समाज और लोगों से घुलना-मिलना नहीं सीख पा रहे हैं और मोटापा और नींद में गड़बड़ी की शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। इसलिए बच्चों के बेहतर भविष्य और उनके सही विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि उनके स्क्रीन टाइम को नियंत्रित किया जाए।