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    बिहार का नहीं है मशहूर भोजपुरी गाना फुलौरी बिना चटनी, दिलचस्प है बॉलीवुड में छाए इस गाने की कहानी

    Updated: Mon, 15 Jun 2026 11:47 AM (IST)

    आपने "फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी" गाना तो सुना ही होगा। यह सलमान खान की फिल्म दबंग 2 का भी हिस्सा बनी थी, लेकिन क्या आप जानते हैं इस गाने की शुरुआत कहा ...और पढ़ें

    कैसे बना फुलौरी बिना चटनी गाना? (Picture Courtesy: YouTube)

    कैसे बना फुलौरी बिना चटनी गाना? (Picture Courtesy: YouTube)

    HighLights

    1. 'फुलौरी बिना चटनी' गाने की जड़ें त्रिनिदाद में हैं

    2. यह गिरमिटिया मजदूरों के संघर्ष से जन्मा चटनी म्यूजिक है

    3. सुंदर पोपो ने 1970 के दशक में इसे लोकप्रिय बनाया

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सलमान खान की फिल्म दबंग 2 का गाना फुलौरी बिना चटनी तो आपने सुना ही होगा। यह गाना काफी हिट हुआ था और लोग इसे आज भी खूब पसंद करते हैं। ज्यादातर लोग मानते हैं कि ये सुपरहिट भोजपुरी गाना बिहार की देन है, लेकिन असल में यह बिहार का है ही नहीं।

    इस गाने का असली नाता एक कैरेबियन देश और गिरमिटिया मजदूर से जुड़ा है। आइए जानें इस मजेदार भोजपुरी गाने की कहानी। 

    कैसे हुआ चटनी म्यूजिक का जन्म?

    ये बात साल 1833 की है, जब ब्रिटिश साम्राज्य ने गुलामी प्रथा को खत्म किया और कैरेबियन देशों के गन्ने के खेतों में काम करने के लिए सस्ते मजदूरों की जरूरत पड़ी। उत्तर प्रदेश के अवध और बिहार के भोजपुरी इलाकों के गरीब किसान और कारीगर, जो खुद जमींदारी प्रथा और गरीबी से परेशान थे, अंग्रेजों के झांसे में आ गए और उन्होंने एक समौझेते या गिरमिट पर अंगूठा लगाया, जिससे वे गरमिटिया मजदूर कहलाए। 

    ये मजदूर जहाजों में भरकर सात समंदर पार त्रिनिदाद एंड टोबैगो, गुयाना और सूरीनाम जैसी जगहों पर ले जाए गए। वे अपने साथ कुछ नहीं ले जा सके, सिवाय अपनी यादों, अपनी भाषा और कुछ ढोलक और मंजीरा के। त्रिनिदाद के गन्ने के खेतों में दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद, शाम को ये मजदूर अपने घर की याद में लोकगीत गाते थे। इसी संघर्ष और सांस्कृतिक मिलन से कैरेबियन धरती पर एक नई संगीत शैली ने जन्म लिया, जिसे चटनी म्यूजिक कहा गया।

    वो शख्स जिसने गाने को दुनिया से मिलवाया

    समय के साथ, भोजपुरी लोकगीतों में कैरेबियन द्वीप की लोकल म्यूजिक सोका और कैलिप्सो का तड़का लगा। भाषा भी थोड़ी बदली और भोजपुरी शब्दों के बीच अंग्रेजी के शब्द जुड़ने लगे। 1970 के दशक में त्रिनिदाद के कलाकार सुंदर पोपो ने चटनी म्यूजिक शुरू किया।

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    उन्होंने पारंपरिक भोजपुरी गीतों को म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट्स के साथ मिलाकर रिकॉर्ड करना शुरू किया और साल 1970 में उन्होंने एक गाना गाया "फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी"। इस गाने में फुलौरी का मतलब पकौड़े जैसी एक डिश से है। यह गाना कैरेबियन देशों में काफी हिट हुआ और शादी-पार्टियों में इस गाने ने धूम मचा दी।

    भोजपुरी और बॉलीवुड में जादू

    यह गाना भले ही त्रिनिदाद में रीमिक्स हुआ था, लेकिन इसकी आत्मा बिल्कुल देसी थी। यह गाना भोजपुरी में सबसे पहले कल्पना पटवारी ने गाया और बाद में यह बॉलीवुड में आया।