आज भी मिट्टी, गोबर और घास-फूस से बनते हैं कच्छ के 'भुंगा' घर, हैरान कर देगा परंपरा और तकनीक का ये अद्भुत मेल
आज हम कच्छ की इसी पुरानी जीवनशैली के बारे में बात करने वाले हैं, जिसका हिस्सा हैं ‘भुंगा’ घर। ...और पढ़ें

कच्छ के भुंगा घर (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गुजरात का कच्छ अपने सफेद रण की खूबसूरती के लिए लोकप्रिय है, यहां हर साल संक्राति के मौके पर मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है। पर बहुत कम लोग यहां की पारंपरिक जीवनशैली के बारे में जानते हैं। आज हम कच्छ की इसी पुरानी जीवनशैली के बारे में बात करने वाले हैं, जिसका हिस्सा हैं ‘भुंगा’ घर।
कच्छ के भुंगा घर
कच्छ में भुंगा शैली के घर होते हैं, ये पारंपरिक घर चिनाई मिट्टी के गारे और मिट्टी की ईंटों का इस्तेमाल कर तैयार किए जाते हैं यानी इन झोपड़ियों को बनाने के लिए मिट्टी, लकड़ी, गोबर और घास उपयोग में लाई जाती है।
दीवारें गोल
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन घरों की दीवारें चोकोर न होकर गोल होती हैं। साइंटिफिक नजरिए से बात करें तो ये गोल दीवारें एक आर्च की तरह काम करती हैं। दीवार बनाने के बाद इनपर मिट्टी और गोबर की लिपाई की जाती है।
मौसम के हिसाब से अनुकूल
अब क्योंकि ये मोटी सी मिट्टी और गोबर से बने हैं तो ये मौसम के हिसाब से भी अनुकूल हैं, इससे घर का तापमान एकदम संतुलित रहता है। ये सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे रहते हैं।
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घरों की छत चोटीदार
इन घरों की छत चोटीदार (कोनिकल) होती है जिसे सहारा देने के लिए घर के बिल्कुल बीच में लकड़ी के एक खंबे को खड़ा किया जाता है। छतों को बनाने के लिए घास-फूस और बांस का इस्तेमाल किया जाता है। इन छतों का वजन भी बहुत हल्का होता है। इन छतों को यहां रहने वाले लोग हर साल बदल देते हैं।
खिड़कियां सामान्य से नीचे
इसके अलावा, इन घरों की खिड़कियां सामान्य से नीचे बनाई जाती है ताकि पर्याप्त रोशनी मिल सके। हर घर में एक दरवाजे के साथ दो खिड़कियां सामान्य तौर पर बनाए जाने की परंपरा है।
रंगीन दीवारें
घरों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए दीवारों पर रंगीन चित्र बनाने के साथ ही शीशों का काम किया जाता है, और अंदर की तरफ सफेद मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे रोशनी ज्यादा बढ़े।
कच्छ में क्यों बनाते हैं भुंगा घर?
कच्छ देश का वो जिला है जो प्राकृतिक आपदाओं के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील है, इसमें भी भूकंप का खतरा यहां सबसे ज्यादा रहता है। बताते चलें कि कच्छ का ज्यादातर हिस्सा भारत के सबसे ज्यादा जोखिम वाले सीस्मिक जोन-V में आता है। सदियों से कच्छ ने भारी तबाही को झेला है, जहां एक तरफ साल 1819 में आए भूकंप में करीब 1500 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी तो वहीं, साल 2001 में जब कच्छ ने भूकंप के झटके झेले तो हजारों लोगों की जान चली गई।
भुंगा तकनीक करती है भूकंप से सुरक्षा
इसी वजह से कच्छ में सीमेंट के घर नहीं बल्कि गोबर और मिट्टी से भुंगा झोंपड़ियां बनाई जाती हैं। इसकी गोल दीवारें घर की सुरक्षा करती हैं क्योंकि भूकंप के समय दबाव किसी एक कोने में जमा होने के बजाय पूरी गोलाई में बराबर रूप से बंट जाता है। साथ ही, घास-फूस और हल्की लकड़ी से बनी ये छतें भूकंप के झटकों को झेलने में सक्षम होती हैं। जब तूफानी हवाएं आती हैं तो वो भी घर की दीवारों पर दबाव बढ़ाने के बजाय बगल से निकलकर चली जाती हैं।