30 के बाद होली में हुड़दंग नहीं, क्यों चाहिए सुकून? साइकोलॉजिस्ट ने बताया कैसे बदल जाता है जश्न का तरीका
लेख बताता है कि 30 की उम्र के बाद होली का जश्न कैसे बदल जाता है। शोर-शराबे वाली मस्ती की जगह यह शांत, परिवार-केंद्रित त्योहार बन जाता है। नई जिम्मेदार ...और पढ़ें

30 की उम्र के बाद कैसे बदल जाती है होली? (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। याद है वो दौर, जब होली का मतलब मोहल्ले में हुड़दंग और पक्के रंगों की बेफिक्री होता था? लेकिन जिंदगी के कैलेंडर पर 30 का आंकड़ा आते ही, इस त्योहार के मायने बड़ी खामोशी से बदल जाते हैं। अब डीजे के शोर की जगह बालकनी में चाय-गुजिया के साथ अपनों की महफिल ज्यादा सुकून देती है।
रंगों को लेकर अब सबसे पहला सवाल यही होता है- "रंग ऑर्गेनिक तो है ना? स्किन खराब नहीं करनी और कल ऑफिस भी जाना है!" दरअसल, 30 की उम्र के बाद होली फीकी नहीं पड़ती; बस यह 'शोर-शराबे' से निकलकर 'सुकून और खूबसूरत यादों' में तब्दील हो जाती है। आइए सीनियर साइकोलॉजिस्ट मोनिका शर्मा से जानते हैं 30 साल की उम्र के बाद कैसे बदल जाते हैं होली के मायने-
शोर-शराबे से दूर शांति से सेलिब्रेशन
उम्र के तीसरे दशक में कदम रखते ही होली का शोर-शराबा अक्सर एक सुकून भरे जश्न में बदल जाता है। सड़क पर अजनबियों के साथ घंटों भाग-दौड़ और पानी से खेलने की जगह अब घर पर परिवार और खास दोस्तों के साथ वक्त बिताना ज्यादा पसंद आता है।
लोग साफ-सफाई की झंझट और अगले दिन की थकान से बचने के लिए सिर्फ ऑर्गेनिक गुलाल (सूखे रंग), मधुर संगीत और स्वादिष्ट पकवानों पर ध्यान देते हैं। अब हुड़दंग के बजाय अपनों के साथ 'क्वालिटी टाइम' बिताना ज्यादा अहम हो जाता है।
फ्लैट्स और सोसायटी के दायरे
करियर और जॉब के चलते शहरों के अपार्टमेंट्स में रहना अब आम हो गया है, जिसने होली मनाने के तरीके को काफी हद तक बदल दिया है। सोसायटी के अपने नियम होते हैं- जैसे पानी बर्बाद न करना, बालकनी से गुब्बारे न फेंकना या तेज डीजे न बजाना।
ऐसे में होली या तो अपने छोटे से फ्लैट तक सिमट जाती है या फिर सोसायटी के किसी व्यवस्थित और अनुशासित कार्यक्रम में तब्दील हो जाती है। अब खुलेआम सड़कों पर रंग फेंकने के बजाय लोग गेट-टुगेदर, कम्युनिटी लंच और बस रस्म के तौर पर रंग खेलने को प्राइयोरिटी देते हैं।
परिवार और नई जिम्मेदारियां
इस उम्र तक आते-आते शादी, बच्चे और माता-पिता की देखभाल जैसी जिम्मेदारियां जीवन का मुख्य हिस्सा बन जाती हैं। दोस्तों की टोली के साथ दिनभर बाहर रहने के बजाय, अब फोकस परिवार-केंद्रित रिवाजों पर आ जाता है।
घर पर मिलकर गुजिया बनाना, होलिका दहन की पूजा करना और बच्चों को सुरक्षित तरीके से त्योहार का महत्व समझाना प्राथमिकता बन जाती है। अपनी रोमांचक मस्ती से ज्यादा अब नई पीढ़ी के लिए खूबसूरत यादें संजोने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने पर जोर होता है।
त्वचा और सेहत की फिक्र
बढ़ती उम्र के साथ त्वचा और सेहत को लेकर जागरूकता भी बढ़ जाती है। टीनएज या 20 के दशक में केमिकल वाले पक्के रंगों की परवाह नहीं होती थी, लेकिन अब लोग एलर्जी, रैशेज या रूखेपन से बचने के लिए पूरी तरह से हर्बल और प्राकृतिक विकल्पों का ही चुनाव करते हैं।
रंग खेलने से पहले त्वचा पर तेल या मॉइस्चराइजर लगाना और बाद में जेंटल क्लींजर का इस्तेमाल करना अब रूटीन बन गया है। कई लोग तो स्किन को सुरक्षित रखने के लिए रंगों से पूरी तरह दूर रहकर सिर्फ लजीज व्यंजनों, बातचीत और फोटोग्राफी के जरिए त्योहार का मजा लेते हैं।
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