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    क्या हर वक्त खुश रहने का दबाव आपको अंदर से कर रहा है खोखला? जानिए 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' का सच

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 06:57 PM (IST)

    हर वक्त खुश रहने का दबाव, जिसे 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' कहते हैं, भावनाओं को दबाकर मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। ...और पढ़ें

    "हमेशा अच्छा सोचो" वाली सलाह आपको कर रही है बीमार! (Image Source: AI-Generated)

    "हमेशा अच्छा सोचो" वाली सलाह आपको कर रही है बीमार! (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। "रोने से क्या होगा?", "सब ठीक हो जाएगा", "हमेशा अच्छा सोचो!"- जब भी हम किसी मुश्किल दौर से गुजर रहे होते हैं, तो अक्सर लोग हमें यही सलाह देते हैं। सुनने में यह बातें बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन मनोवैज्ञानिकों की नजर में यह एक बेहद खतरनाक स्थिति है, जिसे 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' कहा जाता है। हर दर्द और तकलीफ पर सकारात्मकता का मरहम लगाना इंसान को मजबूत बनाने के बजाय उसे अंदर से बिल्कुल अकेला कर सकता है।

    आखिर क्या है यह 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी'?

    आसान शब्दों में कहें तो, अपनी सच्ची भावनाओं को स्वीकार करने के बजाय उन्हें जबरदस्ती छिपाने की कोशिश ही 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' है।

    आजकल सोशल मीडिया और हर हाल में 'मजबूत बने रहने' की सोच ने एक ऐसा माहौल बना दिया है, जहां लोग अपना दुख, डर या असफलता जाहिर करने से कतराते हैं। उन्हें लगने लगा है कि ऐसा करना उनकी बहुत बड़ी कमजोरी है। खुद को हर वक्त खुश और मजबूत दिखाने का यह भारी दबाव व्यक्ति के अंदर गिल्ट को और ज्यादा बढ़ा देता है।

    भावनाओं को दबाना है खतरनाक

    मनोवैज्ञानिक शोध भी इस बात की साफ पुष्टि करते हैं कि अपनी असली और नकारात्मक भावनाओं को छिपाना हमारे लिए बेहद हानिकारक है। बता दें, जो लोग अपनी भावनाओं को जबरदस्ती दबाने की कोशिश करते हैं, उनमें अचानक से घबराहट और चिंता का शिकार होने की संभावना बहुत अधिक होती है।

    सोशल मीडिया की 'परफेक्ट लाइफ' और बढ़ता तनाव

    अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन और कई अन्य शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की 'परफेक्ट जिंदगी' देखने से हम अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं। इससे हमारे अंदर कुछ छूट जाने की चिंता और खुद पर शक पैदा होने लगता है।

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    यदि कोई व्यक्ति लगातार अपनी नकारात्मक भावनाओं को दबाता है, तो उसका तनाव तेजी से बढ़ता है। इसका सीधा और बेहद खराब असर इंसान के रिश्तों और उसकी मानसिक सेहत पर पड़ता है।

    सच्ची मानसिक मजबूती क्या है?

    विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए अपने दुख को खुले दिल से स्वीकार करना बहुत जरूरी है। दुख की भावनाएं कभी गलत नहीं होती हैं। उन्हें दबाने के बजाय समझना और अपनाना हमें मानसिक रूप से लचीला बनाता है।

    असली मानसिक मजबूती का मतलब हर समय मुस्कुराना बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह मानना है कि इंसान होने के नाते कभी-कभी टूट जाना भी बहुत स्वाभाविक है।

    कैसे बचें इस टॉक्सिक पॉजिटिविटी से?

    इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए विशेषज्ञों ने कुछ अहम सुझाव दिए हैं:

    • दुख को कमजोरी न मानें: अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें और दुख को अपनी हार न समझें।
    • भरोसेमंद लोगों से बात करें: कठिन समय में ऑनलाइन दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने किसी भरोसेमंद व्यक्ति से खुलकर अपनी परेशानी साझा करें।
    • सलाह देने के बजाय सुनें: अगर आपके सामने कोई दुखी है, तो उसे "उम्मीद रखो" जैसी बातें कहने के बजाय, बस शांति से उसकी बातें सुनें।

    कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें सिर्फ 'सकारात्मक सोच' से बदला नहीं जा सकता है। इसलिए, अपने दुख को सिरे से खारिज कर देना सकारात्मकता नहीं है, बल्कि यह खुद को धोखा देना है।

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