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    अनजाने में कही आप ही तो बच्चों को नहीं बना रहे 'जेंडर बायस्ड'? पेरेंट्स आज ही सुधार लें अपनी ये गलतियां

    Updated: Sun, 05 Jul 2026 04:05 PM (IST)

    माता-पिता अनजाने में अपनी बातों और व्यवहार से बच्चों में जेंडर बायस पैदा कर सकते हैं, जो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। ...और पढ़ें

    बच्चों को अनजाने में जेंडर बायसनेस तो नहीं सिखा रहे आप? (Picture Courtesy: Freepik)

    बच्चों को अनजाने में जेंडर बायसनेस तो नहीं सिखा रहे आप? (Picture Courtesy: Freepik)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन में हम जो भी सीखते हैं, वो हमारी पर्सनैलिटी का हिस्सा बन जाता है। इसलिए माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वो बच्चों के सामने कैसे बात कर रहे हैं, कैसा व्यवहार कर रहे हैं। कई बार अनजाने में पेरेंट्स कुछ ऐसी बातें या गलतियां कर बैठते हैं, जिनसे बच्चों के मन में जेंडर बायस आ सकता है। 

    इससे बच्चे सोचने लगते हैं कि लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग नियम होते हैं, जो आगे चलकर उनकी पर्सनैलिटी का हिस्सा बना जाता है। आइए जानें पेरेंटिंग से जुड़ी ऐसी ही कुछ गलतियों के बारे में, जो बच्चों के मन में जेंडर बायसनेस पैदा कर सकती हैं। 

    खिलौनों और रंगों को जेंडर के दायरे में बांधना

    बच्चों को हम रंगों से जोड़ देते हैं, जैसे लड़का है तो नीला रंग और लड़की है तो गुलाबी। ये उनके कपड़ों और खिलौनों में भी नजर आता है। लड़कों को कार, बंदूक या सुपरहीरो वाले खिलौने दिए जाते हैं, जबकि लड़कियों को गुड़िया और किचन सेट। इससे अनजाने में हम बच्चों के दिमाग में डाल देते हैं कि लड़के पिंक नहीं पहनते या लड़कियां की दुनिया सिर्फ घर संभालने के इर्द-गिर्द ही घूमनी चाहिए। 

    लड़के रोते नहीं जैसी बातों का इस्तेमाल

    अगर कोई छोटा लड़का गिर जाए या उसे चोट लग जाए, तो उसे चुप करवाने के लिए अक्सर माता-पिता कह देते हैं कि लड़के नहीं रोते, चुप हो जाओ या लड़कियों से कहा जाता है कि तुम किचन से पानी ले आओ, भाई से काम मत करवाओ। इससे बच्चों के मन में ये बातें घर कर जाती हैं। इससे लड़के इमोशनली मैच्योर नहीं हो पाते और लड़कियों के मन में आता है कि किचन का काम सिर्फ लड़कियों की जिम्मेदारी है। 

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    घर के कामों का जेंडर के हिसाब पर बंटवारा

    आज भी कई घरों में देखा जाता है कि बेटी से रसोई के कामों में हाथ बंटाने, चाय बनाने या मेहमानों को पानी देने के लिए कहा जाता है। वहीं, बेटों को बाजार से सामान लाने या बिजली का बिल भरने जैसे बाहरी काम सौंपे जाते हैं। इससे बच्चों के मन में ये बात बैठने लगती है कि लड़कियों के काम घर की चार दीवारी के अंदर ही है और लड़कों के घर के बाहर के। 

    अलग-अलग तारीफ

    हम अनजाने में लड़कियों और लड़कों की तारीफ अलग-अलग तरीकों से करते हैं। लड़कियों की तारीफ अक्सर उनकी सुंदरता या कपड़ों के लिए की जाती है और लड़कों की उनकी ताकत या शरारतों के लिए। इससे बच्चों के मन में यह भावना आ सकती है कि लड़कियों की सबसे बड़ी अचीवमेंट उनकी खूबसूरती ही है और लड़कों को डोमिनेंट और ताकतवर होना चाहिए। 

    सेफ्टी के अलग-अलग मायने

    कई पेरेंट्स लड़कों को देर शाम तक बाहर खेलने देते हैं या दोस्तों के घर अकेले जाने देते हैं, लेकिन लड़कियों के साथ रोक-टोक की जाती है। अगर वो कहीं बाहर जाती भी है, तो साथ में भाई को भेज दिया जाता है। इससे बच्चों के मन में भावना आती है कि लड़कियां कमजोर होती हैं और उन्हें लड़कों की सुरक्षा की जरूरत होती है।

    इसलिए माता-पिता को कोई भी बात कहने या करने से पहले सोचना चाहिए कि इसका उनके बच्चों के मन पर क्या असर पड़ रहा है।