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    रिटायरमेंट के बाद अचानक चिड़चिड़े या गुमसुम हो गए हैं पापा? एक्सपर्ट ने बताया क्यों बदल जाता है स्वभाव

    Updated: Sat, 20 Jun 2026 07:00 AM (IST)

    रिटायरमेंट के बाद पिता का चिड़चिड़ा या खामोश होना 'पोस्ट-रिटायरमेंट सिंड्रोम' का संकेत हो सकता है। आइए, डिटेल में समझते हैं इसके बारे में। ...और पढ़ें

    क्या आपके पापा भी रिटायरमेंट के बाद चिड़चिड़े हो गए हैं? (Image Source: AI-Generated)

    क्या आपके पापा भी रिटायरमेंट के बाद चिड़चिड़े हो गए हैं? (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। घर के जिस पिता ने ताउम्र एक मजबूत स्तंभ की तरह हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई, रिटायरमेंट के बाद अचानक वह घर के एक कोने में क्यों सिमट जाते हैं? आपने भी कई परिवारों में गौर किया होगा कि नौकरी से रिटायर होने के बाद पापा या तो बहुत खामोश हो जाते हैं, या फिर बात-बात पर गुस्सा करने लगते हैं।

    अक्सर परिवार और बच्चे इसे 'बढ़ती उम्र का असर' या 'स्वभाव में आया बदलाव' मानकर टाल देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह कोई सामान्य बात नहीं है। यह एक गहरी भावनात्मक और मानसिक स्थिति है जिसे 'पोस्ट-रिटायरमेंट सिंड्रोम' या एक 'साइलेंट प्रॉब्लम' कहा जाता है।

    इस साल, 21 जून को मनाए जा रहे Father's Day 2026 के मौके पर, आइए आकाश हेल्थकेयर की साइकियाट्रिस्ट डॉ. पवित्रा शंकर और पीएसआरआई अस्पताल की साइकोलॉजिस्ट व काउंसलर अर्पिता कोहली के नजरिए से समझते हैं कि ढलती उम्र में हमारे पिता किस मानसिक उथल-पुथल से गुजरते हैं।

    retirement depression in men

    (Image Source: AI-Generated) 

    आखिर क्यों बदल जाता है पिता का व्यवहार?

    पिता के इस बदलते स्वभाव के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपे होते हैं:

    पहचान और वजूद का खो जाना

    किसी भी पुरुष के लिए उसकी नौकरी सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं होती, बल्कि यह समाज में उसके सम्मान और पहचान का मुख्य आधार होती है। लगभग 30-35 सालों तक सुबह उठना, तैयार होकर ऑफिस जाना और वहां एक जिम्मेदार भूमिका निभाना उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाता है। रिटायरमेंट के अगले ही दिन जब यह दिनचर्या अचानक रुकती है, तो उन्हें लगता है कि परिवार और समाज में उनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। यह खालीपन अक्सर चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर आता है।

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    हाथ से कंट्रोल छिनने का डर

    अब तक घर के सारे बड़े फैसले और आर्थिक नियंत्रण पिता के हाथों में होता था, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर बच्चे बड़े होकर कमान अपने हाथों में ले लेते हैं। जब पापा को लगता है कि उनके बिना भी काम चल रहा है या उनसे सलाह नहीं ली जा रही, तो वे खुद को 'अप्रासंगिक' महसूस करने लगते हैं। इस खोते हुए कंट्रोल को वापस पाने की बेचैनी में वे घर की छोटी-छोटी बातों- जैसे पंखा खुला छोड़ना, रसोई के काम या बच्चों के आने-जाने के समय पर टोकना शुरू कर देते हैं। परिवार इसे अक्सर 'किचकिच' समझ बैठता है।

    खालीपन और दोस्तों से दूरी

    ऑफिस छूटने के साथ ही सहकर्मियों से रोज की मुलाकातें और चाय पर होने वाली चर्चाएं भी खत्म हो जाती हैं। पुरुषों में अक्सर महिलाओं की तरह अपनी भावनाओं को खुलकर जताने या बड़ा सोशल सर्कल बनाए रखने की आदत कम होती है। असीमित खाली समय और अकेलापन उन्हें अंदर से परेशान करता है। अपनी चिंताएं साझा न कर पाने के कारण वे डिप्रेशन या एंग्जायटी का शिकार होकर पूरी तरह अंतर्मुखी और चुप हो जाते हैं।

    बीमारियों का डर और शारीरिक कमजोरी

    बढ़ती उम्र के साथ शरीर भी साथ छोड़ने लगता है। बीपी, डायबिटीज, जोड़ों और घुटनों का दर्द, या देखने-सुनने की क्षमता में कमी जैसी समस्याएं घेरने लगती हैं। जो इंसान कल तक पूरे परिवार को संभालता था, उसे अब दूसरों पर निर्भर होने का डर सताने लगता है। अपनी कमज़ोरी को स्वीकार न कर पाने की यह हताशा ही उनके गुस्से का कारण बनती है।

    डिप्रेशन का संकेत भी हो सकता है यह बदलाव

    बुजुर्गों में डिप्रेशन हमेशा रोने या उदास रहने के रूप में सामने नहीं आता। कई बार उनका अधिक चुप रहना, उदासीन हो जाना, बात-बात पर गुस्सा करना या सामाजिक दूरी बना लेना भी मानसिक स्वास्थ्य विकारों का संकेत होता है। अगर यह बदलाव लंबे समय तक दिखे, तो इसे सिर्फ उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें।

    परिवार और बच्चे कैसे बनें उनका सहारा?

    इस फादर्स डे पर उन्हें महंगे गिफ्ट्स देने के बजाय उनके भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान दें। इन 4 तरीकों से आप उनका सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं:

    • उन्हें 'बेकार' महसूस न होने दें: प्रॉपर्टी, वित्तीय निवेश या पारिवारिक मामलों के बड़े फैसलों में उनकी सलाह जरूर लें। उन्हें यह एहसास दिलाएं कि उनका अनुभव आज भी घर के लिए सबसे अनमोल है।
    • एक नया रूटीन बनाने में मदद करें: उनके खाली समय को रचनात्मक तरीके से भरने के लिए उन्हें किसी नई हॉबी, मॉर्निंग वॉक ग्रुप या सामाजिक कार्यों से जुड़ने के लिए प्रेरित करें।
    • उनके गुस्से को दिल पर न लें: जब वे छोटी बातों पर गुस्सा करें, तो पलटकर बहस न करें। शांत रहें और समझें कि यह गुस्सा आप पर नहीं, बल्कि उनकी अपनी वर्तमान लाचारी पर है।
    • उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताएं: उनके पास बैठें और उनके ऑफिस के पुराने किस्से सुनें। एक पिता के लिए इससे बड़ी कोई खुशी नहीं होती कि उसका बड़ा बच्चा आज भी उसकी बातें सुनना चाहता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेने में भी संकोच न करें।

    रिटायरमेंट इंसान की पेशेवर जिंदगी का अंत हो सकता है, लेकिन पारिवारिक जिंदगी का नहीं। इस फादर्स डे पर अपने पिता की इस 'खामोश लड़ाई' को समझें। उन्हें पैसों की नहीं, आपके वक्त, सम्मान और इस भरोसे की जरूरत है कि- "पापा, आप कल भी हमारे हीरो थे, और आज भी हैं।"

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