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    क्या वाकई दोस्तों की जगह ले सकता है AI? अकेलापन दूर करने के लिए चैटबॉट्स से बातें करना कितना सही

    Updated: Sun, 03 Aug 2025 09:26 AM (IST)

    दुनियाभर में आज दोस्ती का दिन मनाया जा रहा है। बदलते समय के साथ अब दोस्ती का अंदाज भी बदल रहा है। वर्चुअल वर्ल्ड में हम जितने वाचाल हैं असली जिंदगी में उतने ही अकेले। स्थिति यह है कि अब हम दोस्ती भी एआई से कर रहे हैं और चटपटी बातों के लिए ताक रहे हैं चैटजीपीटी को। आज फ्रेंडशिप डे पर पढ़ें यह खास आर्टिकल।

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    स्मार्टफोन की दुनिया में इंसान अकेला क्यों? (Picture Credit- Freepik)

    मनीष त्रिपाठी, दिल्ली। इन दिनों हवाओं में दोस्ती की महक है और इंटरनेट मीडिया पर ऐसे संदेशों की बहार। मामला ट्रेंडिंग है, क्योंकि 30 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस था, वहीं आज तीन अगस्त को दुनिया के कई देशों सहित भारत मित्रता दिवस मतलब ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाएगा।

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    जाहिर है कि दिन दोस्ती को समर्पित है, लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि स्मार्टफोन में आंखें गड़ाए बैठी दुनिया में आखिर ‘दोस्त’ हैं कहां। इंटरनेट मीडिया पर फ्रेंड्स, फालोअर्स, सब्सक्राइबर्स पर इतराती दुनिया दरअसल बहुत तेजी से अकेली होती जा रही है। वर्चुअल वर्ल्ड में हम जितने वाचाल हैं, असली जिंदगी में इतने अकेले कि दो साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अकेलेपन को विश्वभर में स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा घोषित कर दिया।

    आबादी से भरे शहर अंदर ही अंदर वीरान हो रहे हैं और लोग भीड़ में भी अकेले। जश्न-पिकनिक-पार्टी में भी सिर्फ मजे नहीं होते, बल्कि बेतहाशा सेल्फी ली जाती हैं, रील बनती हैं। ऐसा लगता है कि तकनीक के सिवाय किसी के पास इंसान के साथ बोलने-बतियाने, देखने-सुनने का समय नहीं है। स्मार्टफोन में ही संसार बना लेने से उत्पन्न अंतर्मुखी भाव की वजह से आज स्थिति यह है कि अब हम दोस्ती भी एआई से कर रहे हैं और चटपटी बातों के लिए चैटजीपीटी को ताक रहे हैं!

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    बहुत बड़ा है अकेलेपन का बाजार

    जो अकेलापन आपको अंदर से खा जाता है, वही एक व्यवसाय मॉडल के रूप में कई कंपनियों के लिए सोने की खान साबित हो रहा है। यह कोरोनाकाल की तरह है, जब शारीरिक दूरी बनाए रखने की आवश्यकता-अनिवार्यता ने कई कम्युनिकेशन-एडुटेक कंपनियों को उफान पर ला दिया था। एआई चैटबॉट से लेकर सब्सक्रिप्शन प्लेटफार्मों तक, कंपनियां अब अकेलेपन को आय में बदलने के लिए उत्पाद डिजाइन कर रही हैं और वे इस प्रक्रिया में दुनियाभर से अरबों डालर कमा रही हैं।

    उदाहरण के लिए जरा डेटिंग एप्स की सफलता पर ध्यान दें, वे आपको सिर्फ किसी से संपर्क की आशा ही तो बेच रहे हैं और अगर वहां भी आप निराश-अकेले ही हैं तो चैटबॉट-एआई दोस्त किस दिन के लिए हैं? अभी तो रेप्लिका जैसे एप, फ्रेंड जैसे एआई पेंडेट और ग्रोक की एआई मित्रमंडली ही सामने आई है, अभी तो ह्यूमनायड्स का बेहतर होना और बर्दाश्त करने लायक बजट में आना बाकी है। अनुमान है कि अकेलेपन को भुनाने का यह बाजार वर्ष 2030 तक 140 अरब डालर (लगभग 12,259 अरब रुपये) तक पहुंच जाएगा।

    किराए पर डिनर का साथी

    अकेलापन मिटाने और साथी की तलाश में भटकती दुनिया में इंटरनेट से इतर कई नए तरीके भी सामने आ रहे हैं। ‘दोस्त’ या ‘डिनर के साथी’ को किराए पर देने वाली सेवाएं विशेष रूप से जापान, कोरिया और अमेरिका में लोकप्रिय हो रही हैं। यह आनलाइन डेटिंग नहीं, आफलाइन फ्रेंडिंग है। यहां साथ बैठने की भी कीमत है, गले लगाने की भी और यह सब विशुद्ध रूप से मैत्रीपूर्ण ढंग से होता है, उससे अधिक कुछ भी नहीं। बढ़ते अकेलेपन ने पालतू पशु-पक्षियों की आर्थिकी को भी बढ़ावा दिया है। असली कुत्ता-बिल्ली हो या डिजिटल पेट्स, दुनियाभर में यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा है।

    अकेलेपन की राजधानी

    दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में 40 प्रतिशत लोग अकेले रहते हैं। यह समस्या विशेष रूप से युवा पीढ़ी में देखी जा रही है, जो तकनीकी प्रगति के बावजूद सामाजिक संपर्क की कमी का अनुभव कर रही है। इससे निपटने के लिए यहां सरकारी स्तर पर माइंड कन्वीनियंस स्टोर खोले जा रहे हैं, जहां मुफ्त खाना, किताब, खेल, मसाज और सबसे बढ़कर बोलने-बतियाने को आतुर इंसानों की मौजूदगी से दिमाग तरोताजा हो जाता है।

    अलग-थलग जापान

    जापान में अकेलापन एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। अकेलापन झेलती 42 प्रतिशत आबादी के साथ विश्व में नंबर एक देश होना यहां न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी प्रभाव डाल रहा है। इंटरनेट मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से लोग एक-दूसरे से जुड़े तो हुए हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में संबंधों की कमी महसूस की जा रही है। यह चैटबॉट-एआई फ्रेंड्स की सबसे ज्यादा मांग वाला देश है।

    कहां जा रहा है आपका क्वालिटी टाइम

    आज युवाओं की दुनिया में ‘मी टाइम’ का बहुत शोर है। इसी तरह महानगरों की भागती-दौड़ती जिंदगी में कामकाजी लोग ‘क्वालिटी टाइम’ और ‘पर्सनल स्पेस’ की बात करते हैं। मगर अंततः यह सब रास्ते अकेलेपन की कारपोरेट दुनिया में खुलते हैं। यहां दिया गया आपका हर मिनट डाटा/ विज्ञापन/मासिक शुल्क के रूप में सर्विस प्रोवाइडर के लिए मुनाफे की दस्तक बन जाता है।

    बात साफ है, अकेले लोग बढ़िया दाम चुकाने वाले ग्राहक होते हैं। वे ऑनलाइन ज्यादा समय बिताते हैं, मनोरंजन हो या डेटिंग-वे इंटरनेट प्लेटफार्म सेवाओं की सदस्यता ज्यादा लेते हैं और यहां तक कि आर्टिफिशियल एआई साथी के लिए भुगतान करने की ज्यादा संभावना से भरपूर होते हैं।

    अकेलेपन की सबसे अच्छी दवा

    अकेलेपन को डिप्रेशन, एंग्जायटी, हार्ट डिजीज, डायबिटीज और यहां तक कि जल्दी मौत की बढ़ती दरों से जोड़ा गया है। इस बीच, एआई ने एक नई दिशा में दोस्ती के अवसर प्रदान किए ,लेकिन सवाल घूम-फिर कर वही है कि क्या वर्चुअल रिलेशन वास्तव में वास्तविक संबंधों का विकल्प बन सकते हैं? अकेलेपन को दूर करने के लिए सबसे पहले हमें अपने सामाजिक कौशल को विकसित करने की आवश्यकता है। यह महत्वपूर्ण है कि हम आस-पास के लोगों के साथ संवाद करें और नए संबंध बनाने का प्रयास करें।

    अकेलेपन के प्रभावों को समझना और इसे दूर करने के लिए उपाय खोजना आवश्यक है। ध्यान करें, घूमें, बातें करें, सकारात्मक रहें। हमें यह समझना होगा कि अकेलापन केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह समाज के स्वास्थ्य और विकास के लिए भी खतरा है और इसका सबसे प्रभावी इलाज हैः जीते-जागते, हंसते-मुस्कुराते, वक्त-बेवक्त साथ खड़े होने वाले इंसानी दोस्त!

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