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    ‘राजा बेटा’ और ‘पापा की परी’...... कहीं बचपन का लाड-प्यार तो तबाह नहीं कर रहा शादीशुदा जिंदगी?

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 03:00 PM (IST)

    सोशल मीडिया पर यूं ही खिल्ली नहीं उड़ाई जाती, वाकई में परवरिश का पर्सनैलिटी पर फर्क पड़ता है। यही पर्सनैलिटी मैरिड लाइफ पर असर डालती है। ...और पढ़ें

    लाड-प्यार से बिगड़ सकती है शादीशुदा लाइफ (AI Generated)

    लाड-प्यार से बिगड़ सकती है शादीशुदा लाइफ (AI Generated)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय घरों में लड़कों और लड़कियों की परवरिश के लिए अलग तौर-तरीकों को अपनाया जाता है। इसी वजह से लड़कियों को पापा की परी और लड़कों को राजा बेटा या मम्माज बॉय कहना परिवारों में आम है। लेकिन समय के साथ ये शब्द पॉजिटिव की जगह नेगेटिव रूप लेते जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर इनपर बनते मीम्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज इसे हम रिलेशनशिप को सेंटर में रखकर बात करेंगे कि कहीं बचपन का दुलार कहीं शादीशुदा जिंदगी पर भारी तो नहीं पड़ रहा?

    जिम्मेदारी से भागना 

    बचपन में पेरेंट्स पर ज्यादा निर्भर रहने वाले लोग आगे चलकर जिम्मेदारी को समझ नहीं पाते हैं। जबकि शादी के बाद इसी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। लाड-प्यार में जब सब चीजें आसानी से मिल जाती है और सिर पर किसी चीज का बोझ नहीं रहता तो व्यक्ति फ्री रहने लगता है। फिर अचानक से जिम्मेदारी आने पर रिश्ते संभालने में दिक्कत होना लाजमी है। 

    छोटे या बड़े फैसले लेने में हिचकिचाहट 

    भारतीय घरों में परवरिश का सबसे नकारात्मक पहलू है बच्चों को फैसले न लेने देना, फिर चाहे वो पर्सनल लाइफ हो, करियर हो या पैसे से जुड़ा निर्णय। नतीजतन शादीशुदा जिंदगी में जाने पर कोई भी फैसला लेने का डर चीजें खराब कर सकता है। 

    पार्टनर की तुलना करना 

    ज्यादातर लोग अपने पार्टनर की तुलना करने लगते हैं, हम यहां एक्स से तुलना करने की नहीं कर रहे। दरअसल, हर लड़की चाहती है कि उसे अपने पिता जैसा जीवनसाथी मिले और हर लड़का अपनी पार्टनर में मां की छवि ढूंढता है। कई बार यह तुलना रिश्तों में कड़वाहट का कारण बनती है। 

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    सीमाएं न बना पाना 

    यह समस्या अक्सर पुरुषों के साथ होती है क्योंकि कई परिस्थितियों में वो पेरेंट्स और पत्नी के बीच संतुलन नहीं बिठा पाते। उनका बचपन पेरेंट्स के साथ बीता है तो उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता और पत्नी को इस समय सबसे ज्यादा साथ की जरूरत होती है जिससे वो नई फैमिली में घुल-मिल पाए। ऐसे में एक की तरफ भी पलड़ा भारी होता है तो इसका असर दूसरी तरफ पड़ता है। 

    इमोशनली मैच्योर न होना 

    जिन्होंने कभी बचपन में डांट नहीं खाई और अपनी चीजों से समझौता करना नहीं सीखा वो इमोशनली मैच्योर नहीं हो पाते। ऐसी स्थिति में पार्टनर को समझने के बजाय सब कुछ पेरेंट्स से शेयर करना पसंद करते हैं जो सिचुएशन और बिगाड़ देता है।