63% स्टूडेंट्स रोज झेल रहे हैं स्ट्रेस, पढ़ाई से ज्यादा माता-पिता की उम्मीदों का बोझ बन रहा वजह
माता-पिता यह तो समझ रहे हैं कि बच्चे जाने-अनजाने जा रहे हैं तनाव के गर्त में, मगर आंकड़े बता रहे हैं कि इनमें से अधिकांश के तनाव की वजह हैं स्वयं माता ...और पढ़ें

उम्मीदों के बोझ से दब रहा बचपन (Image Source: AI-Generated)
आरती तिवारी, नई दिल्ली। परीक्षा की तैयारी में जुटे रिषभ की किताबें तो खुली हैं, मगर दिमाग बंद ही है। तैयारी पूरी है, रिवीजन का ट्रैक भी शेड्यूल के हिसाब से सही है, मगर मुस्कान गायब है। यह तनाव के लक्षण हैं। रिषभ के माता-पिता अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से बस यही कहते रहते हैं कि इस बार उनका लाडला पूरे परिवार में अब तक के सबसे ज्यादा अंक लाएगा। रिषभ मुस्कुरा तो देता है, मगर भीतर ही भीतर डर पल रहा है।
यह परीक्षा का डर नहीं, माता-पिता की उम्मीदों का डर है, जो उसने अपने कोचिंग वाले सर से साझा किया। प्रतिस्पर्धा का बढ़ता स्तर, कम समय में ज्यादा सीखने की जद्दोजहद और उस पर माता-पिता की उम्मीदों का बोझ... हालत यह है कि कक्षा में पढ़ने वाला हर दूसरा विद्यार्थी तनाव में जी रहा है। यह सिर्फ अनुमान नहीं बल्कि द स्टूडेंट सिंक इंडेक्स-2026 की रिपोर्ट बता रही है। कक्षा में बैठे हर 10 में से छह बच्चों को विषय या पाठ से संबंधित प्रश्न का कम और चिंता, तनाव या उम्मीदों का दबाव ज्यादा होता है।

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बढ़ता जा रहा ग्राफ
रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा में हर रोज 63 प्रतिशत विद्यार्थी तनाव में रहते हैं, जिनमें से 42 प्रतिशत ने माना है कि यह दबाव माता-पिता की उम्मीदों का भी है। मुश्किल यह है कि शिक्षक विद्यार्थियों के इस तनाव को पहचानते तो हैं, लेकिन पता होने के बाद भी वे इसमें विद्यार्थियों की ज्यादा मदद नहीं कर सकते, क्योंकि स्कूल काउंसलर या शिक्षक बच्चों को तो समझा सकते हैं, मगर माता-पिता को अपने इस व्यवहार पर स्वयं काम करना होता है।
कई बार तो वे इस बात को स्वीकार भी नहीं करते कि वे अनजाने में ही सही, बच्चों पर दबाव और तनाव का कारण बन रहे हैं। इसके कारण विद्यार्थी दबाव महसूस करते रहते हैं। आज जब हम समझ रहे हैं कि तनाव किस हद तक बच्चों को परेशान कर रहा है और यहां तक कि लोग बच्चों से ज्यादा से ज्यादा बात करने को लेकर सजग हैं, फिर भी इस तरह तनाव का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।

(Image Source: AI-Generated)
नंबरों की दौड़ में हारता बचपन
द स्टूडेंट सिंक इंडेक्स के हालिया आंकड़े केवल नंबर नहीं, बल्कि हमारी भावी पीढ़ी की चीख हैं। कक्षा में बैठे हर 10 में से छह बच्चों का तनावग्रस्त होना यह बताता है कि हमारे स्कूल ‘विद्या के मंदिर’ से ज्यादा ‘प्रतिस्पर्धा के कुरुक्षेत्र’ बनते जा रहे हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि लगभग आधे बच्चे (42%) अपने ही घर… में मानसिक सुरक्षा की जगह दबाव महसूस कर रहे हैं। हम बच्चों को एक ऐसा इन्वेस्टमेंट मान बैठे हैं जिससे हमें भविष्य में बेहतरीन रिटर्न चाहिए। जब तक घर और स्कूल का वातावरण ‘गलती करने की स्वतंत्रता’ नहीं देगा, तब तक तनाव का यह ग्राफ नीचे नहीं आएगा।
- तुलना के जाल से बचें। ऐसे वाक्य बच्चे के आत्मविश्वास के लिए जहर के समान हैं।
- क्या बच्चा अचानक चुप रहने लगा है? क्या उसकी भूख या नींद के पैटर्न में बदलाव आया है? क्या वह चिड़चिड़ा हो रहा है? ये तनाव के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।
- बच्चे के साथ घंटों बैठना जरूरी नहीं है, बल्कि आधा घंटा बिना मोबाइल के, पूरी एकाग्रता से उनके साथ बिताना कहीं ज्यादा प्रभावी है।
- यदि बच्चे ने कड़ी मेहनत की है, लेकिन नंबर कम आए हैं, तो भी उसकी मेहनत की तारीफ करें। उसे महसूस होना चाहिए कि आपका प्यार उसके ‘रिपोर्ट कार्ड’ का मोहताज नहीं है।
- दिन भर में कम से कम एक बार ऐसी बातचीत करें, जिसका पढ़ाई या स्कूल से कोई लेना-देना न हो। उनके शौक, उनके दोस्तों या उनकी किसी छोटी सी खुशी पर चर्चा करें।
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