पेरेंटिंग में थोड़ा 'आलसी' होना भी है जरूरी, जानिए कब करें बच्चे की मदद और कब रहें दूर
माता-पिता का बच्चों की हर छोटी समस्या तुरंत सुलझाना उन्हें आत्मनिर्भर बनने से रोकता है। 'लेजी पेरेंटिंग' बच्चों को स्वयं निर्णय लेने और गलतियों से सीख ...और पढ़ें

बच्चे को हारने दें ताकि वो जीतना सीखे (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अंबिका अग्रवाल, नई दिल्ली। चाहे स्कूल का प्रोजेक्ट हो या दोस्तों से झगड़ा, आज माता-पिता बच्चों की छोटी से छोटी मुश्किल खुद सुलझाने बैठ जाते हैं। आपकी यह आदत बच्चों को समस्याओं का सामना करने व आत्मनिर्भर बनाने से दूर कर देती है। पेरेंटिंग इन्फ्लूएंसर अंबिका अग्रवाल सलाह देती हैं कि अब समय है कि अपनाएं लेजी पैरेंटिंग। यानी बच्चों के हर काम में दखल देने के बजाय उन्हें स्वयं निर्णय लेने और गलतियों से सीखने का मौका देने का तरीका...
माता-पिता अपने बच्चों से बेइंतहा प्यार करते हैं, लेकिन इस प्यार के साथ एक अनजाना डर भी जुड़ गया है-डर बच्चे के पिछड़ने का, उसके दुखी होने का या उसका आत्मविश्वास टूटने का। नतीजा यह है कि बच्चा जैसे ही किसी छोटी-सी परेशानी में पड़ता है, माता-पिता तुरंत ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। इसे ही मनोविज्ञान में रेस्क्यू पेरेंटिंग कहा जाता है। हर बार जब आप बच्चे को उसकी परेशानी से बचाते हैं, तो अनजाने में उसे उसकी सीख से भी दूर कर देते हैं। कई बार वही छोटी-छोटी तकलीफें उसके व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव बनती हैं। जो बच्चा कभी हारता नहीं, वह जीतना भी नहीं सीखता। जो बच्चा कभी संघर्ष नहीं करता, वह स्वयं पर भरोसा करना भी नहीं सीख पाता। आत्मविश्वास तारीफ सुनने से नहीं बनता, बल्कि यह महसूस करने से बनता है कि मैं मुश्किलों का सामना करके उससे बाहर आ गया। बचपन कोई प्रतियोगिता नहीं है, जिसे हर हाल में जीतना है। यह वह समय है जहां बच्चों को धीरे-धीरे जीवन जीना सीखना होता है।
ऐसे पहचानें यह जाल
आपका सुरक्षा कवच बच्चे के इर्द-गिर्द ऐसा जाल बुन देता है, जिसके पार जाकर आत्मनिर्भरता हासिल करना बच्चे के लिए संभव ही नहीं हो पाता। अगर आपका बच्चा किसी भी परेशानी में पड़ते ही सबसे पहले आपकी ओर देखता है, खुद समाधान ढूंढने की कोशिश नहीं करता या अगर आप उसके बोलने से पहले ही उसकी समस्या का जवाब दे देते हैं। अगर स्कूल प्रोजेक्ट में बच्चे से ज्यादा आपकी मेहनत दिखाई देती है, दोस्तों के हर छोटे झगड़े में आपको हस्तक्षेप करने की जरूरत महसूस होती है या फिर आपको बच्चे की तकलीफ उससे ज्यादा परेशान करती है, तो यह रुककर सोचने का समय है। स्वयं से सिर्फ एक सवाल पूछिए, 'क्या बच्चे को वाकई आपकी मदद चाहिए या मुझे उसे संघर्ष करते हुए देखना मुश्किल लग रहा है?' कई बार हम बच्चे की नहीं, अपनी बेचैनी की मदद कर रहे होते हैं।
बन जाएं थोड़े आलसी
जरा सी परेशानी और तुरंत भागकर बच्चे के पास पहुंच गए। इस आदत को थोड़ा आलस से भरिए। यहां 'लेजी पेरेंटिंग' का मतलब लापरवाही बिल्कुल नहीं है। इसका मतलब है कि हम केवल वही काम करें, जो हमारा बच्चा अभी वास्तव में नहीं कर सकता। बाकी चीजों में उसे सीखने का अवसर दें। लेजी पेरेंटिंग भावनात्मक रूप से बहुत कठिन होती है। बच्चे को संघर्ष करते हुए देखना और बीच में न पड़ने के लिए बहुत धैर्य चाहिए। हमारा लक्ष्य बच्चों को इतना सक्षम बनाना होना चाहिए कि वे अपनी जिंदगी की मुश्किलों का सामना स्वयं कर सकें।
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थोड़ी देर से उठाएं कदम
शुरुआत बहुत छोटी हो सकती है। अगली बार जब बच्चा कहे, 'मुझसे नहीं होगा', तो तुरंत समाधान मत दीजिए। पहले उससे पूछिए, 'तुमने अब तक कितनी कोशिश की?' या 'एक बार और कोशिश करो'। दरअसल, कई बार बच्चों को हमारे समाधान की नहीं, भरोसे की जरूरत होती है। अगर स्कूल प्रोजेक्ट है, तो उसके लिए सामग्री जुटाइए, उसके साथ बैठिए, लेकिन प्रोजेक्ट उसका रहने दीजिए। अगर दोस्तों से झगड़ा हुआ है, तो पहले उसकी बात सुनिए, फिर पूछिए कि वह इसे कैसे सुलझाना चाहता है। बच्चे निर्णय लेना तभी सीखते हैं, जब उन्हें निर्णय लेने दिए जाते हैं। यहां एक बहुत आसान नियम है। जो काम बच्चा अपनी उम्र और समझ के अनुसार थोड़ी मेहनत से कर सकता है, वह उसे करने दीजिए। आपका काम केवल सही रास्ता दिखाना है।
जहां अनिवार्य है हस्तक्षेप
अगर बच्चा बुलिंग का शिकार हो रहा है, कोई उसका भावनात्मक या शारीरिक शोषण कर रहा है, उसकी सुरक्षा खतरे में है, वह लगातार उदास, डरा हुआ या मानसिक रूप से टूटता हुआ दिखाई दे रहा है या फिर समस्या उसकी उम्र और समझ से कहीं बड़ी है, तो माता-पिता का तुरंत साथ देना जरूरी है।
बच्चे को यह एहसास होना चाहिए कि उसे हर छोटी मुश्किल से बचाया नहीं जाएगा, लेकिन जब बात सुरक्षा, सम्मान या मानसिक स्वास्थ्य की होगी, तब माता-पिता सबसे पहले साथ खड़े होंगे। यही भरोसा बच्चे को जीवन भर सुरक्षित महसूस कराता है।