3000 हाथियों की मदद और 80 टन के पत्थर का कमाल! आखिर कैसे बिना सीमेंट-लोहे के 1000 सालों से खड़ा है यह मंदिर?
आज के समय में जहां कोई भी इमारत बिना सीमेंट और लोहे के खड़ी नहीं होती, वहीं यह मंदिर हजारों सालों से मजबूती से खड़ा है। ...और पढ़ें

बृहदेश्वर मंदिर का इतिहास (Image Source: Tamil Nadu Tourism)
HighLights
बिना सीमेंट या लोहे के 1000 साल से खड़ा
राजराज चोल प्रथम ने 1010 ई. में बनवाया था
216 फीट ऊंचा शिखर, 80 टन का कुंभम
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं देश की उस ऐतिहासिक इमारत के बारे में जिस बनाने के लिए न तो सीमेंट का इस्तेमाल किया गया और न ही लोहे का, इसके बावजूद 1000 सालों से यह मजबूती से खड़ी हुई है? सदियों से आंधी-तूफान और भूकंप जैसी आपदा झेलने वाली यह ऐतिहासिक इमारत धार्मिक महत्व भी उतना ही रखती है। हम बात कर रहे हैं बृहदेश्वर मंदिर की।
बृहदेश्वर मंदिर का इतिहास
दक्षिण भारत की द्रविड़ वास्तुकला का सबसे बहतरीन उदाहरण बृहदेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित है। इस मंदिर को राजराजेश्वरम के नाम से भी जाना जाता है। इसके निर्माण की बात करें तो साल 1010 ई. में राजराज चोल प्रथम ने इसे बनवाया था। माना जाता है कि बृहदेश्वर दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जिसका निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से हुआ है।
बृहदेश्वर मंदिर से जुड़ी खास बातें
मंदिर को बनाने में करीब 1.3 लाख वजन के ग्रेनाइट पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है।
इसकी 13 मंजिलों का गर्भ गृह बनाने के लिए 3000 से ज्यादा हाथियों की मदद ली गई थी।
पत्थरों को जोड़ने के लिए कैमिकल, सीमेंट या चूने का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बजाय पत्थरों के खांचों को आपस में फंसाकर इस विशाल मंदिर का निर्माण किया गया था।
मंदिर का शिखर करीब 216 फीट ऊंचा है, जिसपर 80 टन से ज्यादा वजन वाले पत्थर से बना एक कुंभम भी लगा हुआ है।
द्रविड़ वास्तुकला में बने इस मंदिर में देवी-देवताओं और खूबसूरत मूर्तियों की नक्काशी की गई है।
बृहदेश्वर मंदिर का रहस्य क्या है?
भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य इसका बिना किसी नींव के खड़ा होना है। मंदिर का दूसरा रहस्य यह कि इसके शिखर पर जो कुंभम लगाया गया था, वह एक ही पत्थर से बना था। ऐसे में सवाल यह है कि इतनी ऊंचाई पर इतने भारी पत्थर को कैसे लगाया गया होगा? कहा तो यह भी जाता है कि इस कुंभम की कोई परछाई नहीं बनती, यह साइंस इस बात को केवल मिथक करार देता है।
साइंस का मानना है कि क्योंकि यह मंदिर पिरामिड आकार में बना है, इसका निचला हिस्सा चौड़ा और ऊपरी हिस्सा चौड़ाई में बहुत कम है। इसी वजह से कुंभम की परछाई अपने ही आधार पर बनती है और नीचे दिखाई नहीं देती। इन सबके बावजूद भी यह सच नहीं बदलने वाला कि उस समय के शिल्पकार और उनकी इंजीनियरिंग कितनी महान थी।